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दृष्टिबाधित उम्मीदवार न्यायिक सेवाओं में नियुक्ति के लिए पात्र हैं – सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया कि दृष्टिबाधित उम्मीदवार न्यायिक सेवाओं के तहत पद के लिए चयन में भाग लेने के पात्र हैं। साथ ही कहा कि केवल विकलांगता के कारण किसी भी उम्मीदवार को विचार से वंचित नहीं किया जा सकता है।

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यह फैसला न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने सुनाया। पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि अधिकार आधारित दृष्टिकोण के लिए यह आवश्यक है कि दिव्यांग व्यक्तियों को न्यायिक सेवाओं के अवसरों की तलाश में किसी भी तरह के भेदभाव का सामना न करना पड़े। उन्होंने कहा कि समावेशी ढांचा प्रदान करने के लिए राज्य की ओर से सकारात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि किसी भी उम्मीदवार को केवल विकलांगता के आधार पर विचार से वंचित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कोई भी अप्रत्यक्ष भेदभाव जिसके परिणामस्वरूप दिव्यांग व्यक्तियों को बाहर रखा जाता है, चाहे वह कटऑफ के माध्यम से हो या प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण, वास्तविक समानता को बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा, ‘दृष्टिबाधित उम्मीदवार न्यायिक सेवाओं के तहत पद के लिए चयन में भाग लेने के लिए पात्र हैं और मध्य प्रदेश न्यायिक सेवाओं के नियम 6 (ए) को रद्द कर दिया गया है, क्योंकि यह न्यायिक सेवाओं में नियुक्ति के लिए दृष्टिबाधित और कम दृष्टि वाले उम्मीदवारों को वंचित करता है।’ पीठ ने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत दिव्यांग अभ्यर्थियों की पात्रता का आकलन करते समय उन्हें सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। न्यायमूर्ति महादेवन ने कहा कि न्यायालय ने इसे सबसे महत्वपूर्ण मामले के रूप में माना है। उन्होंने कहा, ‘हमने संवैधानिक ढांचे और संस्थागत विकलांगता न्यायशास्त्र पर भी बात की है।’

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि यह मेरे भाई न्यायमूर्ति महादेवन द्वारा लिखा गया एक ऐतिहासिक फैसला है और ‘मैं इसे खुली अदालत में कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं।’ सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सेवा परीक्षा (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम 1994 के नियम 6 ए के संबंध में एक स्वत: संज्ञान मामले में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष दिसंबर में फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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