NEET विवाद और 36 दिन के आंदोलन ने कैसे बदली तस्वीर
तो क्या आरएसएस प्रमुख के बयान के बाद दिया इस्तीफा !
पढ़िये धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफे में क्या लिखा
✍️ “राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पीछे कई कारण रहे—NEET विवाद, लगातार छात्र आंदोलन, NTA पर कार्रवाई और सरकार पर बढ़ता जनदबाव। हालांकि, इस्तीफे से कुछ घंटे पहले RSS प्रमुख मोहन भागवत द्वारा युवाओं और संवाद पर दिया गया संदेश भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना। विपक्ष और कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इसे सरकार के लिए एक नैतिक संकेत माना, लेकिन भाजपा या RSS ने आधिकारिक रूप से दोनों घटनाओं को जोड़कर कोई बयान नहीं दिया।”

नई दिल्ली। आखिरकार वही हुआ जिसकी पिछले कई हफ्तों से राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी। NEET पेपर लीक विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया, जबकि दूसरी ओर पिछले 36 दिनों से जंतर-मंतर पर आंदोलन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने भी सरकार के साथ सहमति बनने के बाद अपना धरना समाप्त करने की घोषणा कर दी। सरकार ने दावा किया कि आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों पर निर्णय लिया गया है, वहीं आंदोलनकारियों ने इसे अपनी जीत बताया।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक आंदोलन या विपक्ष के दबाव का परिणाम मानना अधूरा विश्लेषण होगा। घटनाओं की समय-श्रृंखला बताती है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की सार्वजनिक नाराजगी, भाजपा नेतृत्व पर बढ़ता नैतिक दबाव, NTA में लगातार कार्रवाई, और अंततः धर्मेंद्र प्रधान के आत्मस्पष्टीकरण वाले पत्र—इन सभी ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया, जिसमें भाजपा को अपना अब तक का सबसे कठिन राजनीतिक निर्णय लेना पड़ा।
12 साल में पहली बार विरोध के चलते मंत्री का इस्तीफा
2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद यह पहला अवसर है जब किसी केंद्रीय मंत्री को किसी बड़े जनआंदोलन और लगातार उठते राजनीतिक दबाव के बीच पद छोड़ना पड़ा। इससे पहले 2018 में विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने इस्तीफा दिया था, लेकिन वह मामला व्यक्तिगत आरोपों और मी-टू अभियान से जुड़ा था।
यानी मोदी सरकार की राजनीति में यह पहला उदाहरण है, जब किसी मंत्री को सीधे सार्वजनिक आंदोलन और परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच पद छोड़ना पड़ा।
दो पन्नों की चिट्ठी में बार-बार आया “युवाओं को भ्रमित करने” का जिक्र
इस्तीफे के साथ धर्मेंद्र प्रधान ने लगभग 575 शब्दों की दो पन्नों की चिट्ठी सार्वजनिक की।
पत्र में उन्होंने पिछले चार दशकों के अपने छात्र जीवन, शिक्षा सुधारों और NEET विवाद में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि सरकार ने परीक्षा रद्द करने, सीबीआई जांच कराने, दोबारा परीक्षा कराने तथा परीक्षा को ऑनलाइन (Computer Based Test) करने जैसे कई फैसले छात्रों के हित में लिए।
लेकिन इस पत्र की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उन्होंने दो अलग-अलग स्थानों पर “युवाओं को भ्रमित करने” की बात लिखी।
उन्होंने लिखा—
“कुछ छात्रों को गुमराह करने के लिए जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों ने बाधा डालने की कोशिश की, जिससे जन-असंतोष बढ़ा।”
आगे उन्होंने यह भी कहा—
“देश की युवाशक्ति को भ्रम के कारण मैं पीछे नहीं छोड़ सकता। युवा मेरा संकल्प हैं।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पत्र केवल इस्तीफे की औपचारिकता नहीं, बल्कि अपने पूरे कार्यकाल का बचाव और अपनी राजनीतिक भूमिका का स्पष्टीकरण भी था।
भागवत के बयान के बाद बदला पूरा घटनाक्रम
पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ शनिवार सुबह आया।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा—
“हम मनमानी करेंगे, शक्ति से सबके मालिक बनेंगे, ऐसा नहीं हो सकता।”
उन्होंने नई पीढ़ी के संदर्भ में कहा कि आज के युवा सवाल पूछते हैं। उन्हें आदेश देने के बजाय संवाद करना चाहिए और हर निर्णय का तर्क समझाना चाहिए।
राजनीतिक हलकों में इस बयान को केवल शिक्षा व्यवस्था पर सामान्य टिप्पणी नहीं माना गया। क्योंकि भागवत के इस सार्वजनिक संदेश के कुछ ही घंटों बाद धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सामने आ गया।
भाजपा और संघ के रिश्तों को समझने वाले जानकार मानते हैं कि सरकार कई सप्ताह से आंदोलन और विपक्ष के दबाव के बावजूद अपने मंत्री के साथ खड़ी थी। ऐसे में संघ प्रमुख के इस सार्वजनिक संदेश ने राजनीतिक और नैतिक दबाव को निर्णायक रूप दे दिया।
यही कारण है कि अब राजनीतिक चर्चाओं में यह धारणा मजबूत हो रही है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पीछे कई कारण जरूर रहे, लेकिन अंतिम निर्णय में आरएसएस प्रमुख की नाराजगी निर्णायक साबित हुई।
NTA पर लगातार कार्रवाई ने भी बनाया दबाव
प्रधान के इस्तीफे से ठीक पहले केंद्र सरकार ने लगातार बड़े प्रशासनिक फैसले लिए।
- NTA के 47 अधिकारियों को बर्खास्त किया गया।
- उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की घोषणा हुई।
- शिक्षा मंत्रालय के दो वरिष्ठ सचिव बदले गए।
- परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों का रोडमैप तैयार किया गया।
इन फैसलों ने साफ संकेत दिया कि सरकार पूरे मामले को केवल राजनीतिक विवाद नहीं रहने देना चाहती थी।
36 दिन के आंदोलन के बाद खत्म हुआ धरना
इधर जंतर-मंतर पर पिछले 36 दिनों से प्रदर्शन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी ने शनिवार को आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की।
केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास तथा आशुतोष रांका ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि सरकार के साथ तीन दौर की बातचीत के बाद प्रमुख मांगों पर सहमति बनी है।
रांका ने दावा किया कि उनकी तीन प्रमुख मांगें स्वीकार कर ली गईं—
- धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा,
- आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेना,
- NEET पीड़ित परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा।
हालांकि इन दावों पर सरकार की ओर से विस्तृत आधिकारिक विवरण का इंतजार है।
अभिजीत दीपके बोले— “झुकती है दुनिया…”
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन स्थल पर जश्न मनाया गया।
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके ने कहा—
“वे कहते थे इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते। लेकिन झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा—
“कॉकरोच एक बार घुसता है तो निकलता नहीं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन केवल इस्तीफे तक सीमित नहीं था, बल्कि पीड़ित छात्रों को न्याय दिलाना उसका मुख्य उद्देश्य था।
सोनम वांगचुक ने बताया लोकतंत्र की जीत
सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अस्पताल से सोशल मीडिया पर लिखा कि यह लोकतंत्र, शांति, धैर्य और जनभागीदारी की जीत है। उन्होंने CJP और देशभर के युवाओं को बधाई देते हुए कहा कि यह नागरिक शक्ति का उदाहरण है।
कभी पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करने वाले धर्मेंद्र, आज उसी मुद्दे पर पद छोड़ गए
राजनीति का एक दिलचस्प संयोग भी इस घटनाक्रम में सामने आया।
1997 में ओडिशा में हुए एक पेपर लीक के खिलाफ धर्मेंद्र प्रधान स्वयं सड़क पर उतरे थे। उस आंदोलन में उन पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था और उन्हें गंभीर चोटें आई थीं।
करीब 29 वर्ष बाद वही नेता देश के सबसे बड़े पेपर लीक विवाद के कारण अपने पद से हटे।
अब आगे क्या?
NEET विवाद ने केवल परीक्षा प्रणाली ही नहीं, बल्कि सरकार की राजनीतिक कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा यह संकेत देता है कि जनदबाव, प्रशासनिक जवाबदेही और वैचारिक नेतृत्व—तीनों का प्रभाव लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण रहता है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश शायद वही है, जो धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पत्र में लिखा और जिसे मोहन भागवत ने अपने भाषण में अलग शब्दों में दोहराया—भारत का युवा केवल आश्वासन नहीं, जवाब और जवाबदेही चाहता है।



