HomeUttarakhandAlmoraमाता-पिता का साया छिना, अब अपंग भाई के इलाज की जिम्मेदारी…

माता-पिता का साया छिना, अब अपंग भाई के इलाज की जिम्मेदारी…

2024 में सहायता की संस्तुति, फिर भी नहीं मिली मदद

… अब फिर डीएम से लगाई गुहार

तीन हजार रुपये मासिक आय में कैसे चले इलाज?

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। किसी घर में जब बीमारी दस्तक देती है तो परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत बनता है। लेकिन सोचिए उस भाई की मजबूरी, जिसने पहले अपने माता-पिता को खो दिया और अब वर्षों से बिस्तर पर पड़े अपने छोटे भाई की जिंदगी बचाए रखने के लिए अकेला संघर्ष कर रहा है। भाई की दवा बंद न हो जाए, इलाज रुक न जाए और उसकी देखभाल में कोई कमी न रह जाए—इसी चिंता में देवेंद्र सिंह वर्षों से अपनी जिंदगी खपा रहे हैं।

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आर्थिक हालात ऐसे हैं कि हर महीने करीब 2,500 रुपये की दवाइयों का खर्च उठाना भी भारी पड़ रहा है। जबकि अत्यंत गरीब इस परिवार की मासिक आय ही मात्र 3000 रूपये है। वर्ष 2024 में मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से सहायता की उम्मीद जगी थी, पत्राचार भी हुआ, सहायता की संस्तुति भी की गई, लेकिन देवेंद्र का कहना है कि आज तक उन्हें आर्थिक सहायता नहीं मिल सकी। अब एक बार फिर उन्होंने जिलाधिकारी अल्मोड़ा के दरवाजे पर दस्तक दी है।

यह सिर्फ आर्थिक मदद मांगने की कहानी नहीं है। यह उस भाई की कहानी है, जिसने अपने हिस्से की जिंदगी से ज्यादा अपने दिव्यांग भाई की जिंदगी को महत्व दिया है।

2016 का वह हादसा, जिसने अशोक की पूरी जिंदगी बदल दी

अल्मोड़ा जिले के भैसियाछाना विकासखंड क्षेत्र के ग्राम बेलवालगांव/भानौलगांव निवासी अशोक सिंह वर्ष 2016 में दिल्ली में एक दुर्घटना का शिकार हो गए थे। देवेंद्र के अनुसार अशोक बस से गिर गए थे और उनके सिर में गंभीर चोट आई थी।

हादसे के बाद उन्हें दिल्ली के ट्रॉमा सेंटर में उपचार के लिए ले जाया गया। इलाज हुआ, लेकिन दुर्घटना के बाद अशोक की जिंदगी पहले जैसी नहीं रह सकी। वह दिव्यांग हो गए और उनकी दवा एवं उपचार का सिलसिला आज तक जारी है।

एक हादसे ने जहां अशोक से सामान्य जीवन छीन लिया, वहीं परिवार के सामने उनकी जिंदगी भर की देखभाल की जिम्मेदारी भी छोड़ दी।

जब माता-पिता भी चले गए, तो भाई ही बना भाई का सहारा

मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। परिवार ने अपने माता-पिता को भी खो दिया।

देवेंद्र के पिता स्वर्गीय चंदन सिंह का वर्ष 2020 में निधन हो गया। उनकी मां का निधन इससे पहले ही हो चुका था। माता-पिता के चले जाने के बाद दोनों भाइयों के सिर से वह साया भी उठ गया, जिसके सहारे मुश्किल समय काटा जा सकता था।

इसके बाद देवेंद्र ने अपने छोटे भाई अशोक को अकेला नहीं छोड़ा।

भाई की हालत ऐसी है कि उसे नियमित देखभाल की जरूरत पड़ती है। देवेंद्र के लिए सामान्य रोजगार करना भी आसान नहीं है, क्योंकि एक तरफ घर चलाने की चिंता है तो दूसरी तरफ अशोक की दवा, उपचार, भोजन और देखभाल की जिम्मेदारी।

जिस उम्र में इंसान अपने भविष्य के बारे में सोचता है, उस उम्र में देवेंद्र अपने भाई की अगली दवा और अगले इलाज की चिंता में जिंदगी गुजार रहे हैं।

तीन हजार रुपये मासिक आय में कैसे चले इलाज?

प्रशासनिक जांच में भी परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय पाई गई। जिलाधिकारी को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार परिवार की कुल मासिक आय करीब 3,000 रुपये है। परिवार की आय का मुख्य साधन कृषि और मेहनत-मजदूरी बताया गया है। इसके अलावा अशोक को राज्य सरकार की ओर से दिव्यांग पेंशन के रूप में करीब 3,000 रुपये मासिक मिलने का उल्लेख भी जांच रिपोर्ट में है। बावजूद इसके लंबे समय से चल रहे उपचार और देखभाल का खर्च परिवार के लिए भारी पड़ रहा है।

2024 में जगी थी सरकारी मदद की उम्मीद, लेकिन इंतजार आज तक जारी

देवेंद्र के हालिया पत्र में वर्ष 2024 में हुए सरकारी पत्राचार का उल्लेख किया गया है।

उन्होंने बताया है कि सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से पत्र संख्या 7881/15-CDC/मुख्यमंत्री उत्तराखंड, देहरादून विवेकाधीन कोष/2024-1025, दिनांक 26 सितंबर 2024 के माध्यम से मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से सहायता प्रदान किए जाने के संबंध में पत्राचार किया गया था।

उस समय शायद इस परिवार को लगा होगा कि अब भाई के इलाज का बोझ कुछ हल्का होगा। शायद दवाइयों की चिंता कुछ कम होगी। शायद अशोक का इलाज बेहतर ढंग से जारी रह सकेगा।

लेकिन देवेंद्र के अनुसार वह मदद आज तक उनके हाथ नहीं पहुंची।

2024 की उम्मीद 2026 में भी इंतजार बनकर खड़ी है।

अब फिर डीएम से गुहार—भाई की दवा और इलाज के लिए मदद चाहिए

हाल ही में देवेंद्र ने जिलाधिकारी अल्मोड़ा को फिर पत्र लिखकर अपनी पीड़ा सामने रखी है।

उन्होंने कहा है कि माता-पिता दोनों के निधन के बाद विकलांग भाई की दवा, उपचार और देखभाल की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के ऊपर है। सीमित आर्थिक साधनों के कारण वह यह जिम्मेदारी ठीक से निभाने में बेहद कठिनाई महसूस कर रहे हैं।

उन्होंने जिलाधिकारी से अनुरोध किया है कि उनकी परिस्थितियों को देखते हुए मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष अथवा किसी अन्य उपयुक्त सरकारी सहायता योजना के अंतर्गत आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।

देवेंद्र की मजबूरी में छिपी है एक भाई की पूरी जिंदगी

देवेंद्र की कहानी पढ़कर सबसे ज्यादा जो बात सामने आती है, वह है—भाई के प्रति उसका समर्पण।

वर्षों से अशोक बीमारी और दिव्यांगता से जूझ रहे हैं। माता-पिता का साथ नहीं रहा। आर्थिक संकट लगातार बढ़ता गया। लेकिन देवेंद्र ने अपने भाई का साथ नहीं छोड़ा।

वह उसके लिए दवा लाते हैं, उपचार की चिंता करते हैं और उसकी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करते हैं।

लेकिन अब शायद उनकी अपनी मजबूरियां उनकी हिम्मत पर भारी पड़ने लगी हैं।

भाई की सेवा करने वाला यह हाथ अब मदद के लिए प्रशासन की ओर उठा है।

सवाल यह भी कि कब तक चलता रहेगा इंतजार?

वर्ष 2024 में सहायता के लिए पत्राचार हुआ। अब वर्ष 2026 में देवेंद्र फिर सहायता मांग रहे हैं।

इस बीच अशोक की बीमारी अपनी जगह है, दवाइयों का खर्च अपनी जगह है और परिवार की आर्थिक मजबूरी अपनी जगह।

जरूरतमंद परिवारों के लिए सरकारी सहायता की व्यवस्था इसलिए होती है कि संकट की घड़ी में उन्हें सहारा मिल सके। ऐसे में देवेंद्र के मामले में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि सहायता के लिए प्रक्रिया शुरू हुई थी, तो आर्थिक मदद अब तक परिवार तक क्यों नहीं पहुंची?

यह सवाल किसी पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि उस परिवार की पीड़ा समझने के लिए है जो आज भी मदद की उम्मीद लगाए बैठा है।

एक भाई की पुकार—मेरे भाई का इलाज रुकने मत दीजिए

देवेंद्र की मांग बहुत बड़ी नहीं है। वह किसी ऐशो-आराम की मांग नहीं कर रहे। उनकी सबसे बड़ी चिंता सिर्फ इतनी है कि उनके दिव्यांग भाई की दवा और उपचार जारी रह सके।

माता-पिता का साया खो चुके इन भाइयों के जीवन में अब एक-दूसरे के अलावा शायद कोई बड़ा सहारा नहीं है।

अशोक अपनी बीमारी के कारण खुद अपने लिए आवाज नहीं उठा सकते। इसलिए उनकी आवाज उनका भाई देवेंद्र बनकर प्रशासन तक पहुंच रहा है।

अब जरूरत इस बात की है कि यह आवाज सिर्फ एक सरकारी फाइल तक सीमित न रह जाए।

क्योंकि किसी जरूरतमंद के लिए समय पर मिली छोटी-सी आर्थिक मदद भी उसके लिए बहुत बड़ा सहारा बन सकती है।

आप भी बन सकते हैं अशोक के इलाज का सहारा

अशोक की जिंदगी लंबे समय से बीमारी और दिव्यांगता के बीच गुजर रही है। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि लगातार चल रहे उपचार और दवाइयों का खर्च आसानी से उठाया जा सके। ऐसे में यदि कोई संवेदनशील व्यक्ति इस परिवार की मदद करना चाहता है, तो वह सीधे अशोक सिंह के बैंक खाते में आर्थिक सहयोग भेज सकता है।

आर्थिक सहायता के लिए बैंक विवरण—

खाताधारक का नाम: ASHOK SINGH
अकाउंट नंबर: 36720793356
IFSC कोड: SBIN0008353
बैंक शाखा: Dhaulchhina (धौलछीना)
खाते का प्रकार: REGULAR SAVINGS BANK ACCOUNT

परिवार की ओर से उपलब्ध कराए गए बैंक विवरण का सत्यापन किया गया है। आर्थिक सहयोग करने वाले लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार मदद कर सकते हैं।

आपकी छोटी-सी मदद अशोक के लिए सिर्फ आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि उसके इलाज की एक और उम्मीद बन सकती है।

वर्षों से अपने भाई की सेवा में जुटे देवेंद्र को आज समाज और प्रशासन के सहयोग की जरूरत है। शायद किसी की छोटी-सी मदद से अशोक की दवा समय पर आ सके, शायद उसका उपचार आगे बढ़ सके और शायद देवेंद्र के कंधों पर वर्षों से रखा यह बोझ कुछ हल्का हो सके।

क्योंकि कभी-कभी किसी जरूरतमंद के जीवन में उम्मीद लौटाने के लिए बहुत बड़ी रकम नहीं, सिर्फ मदद के लिए बढ़ा एक हाथ ही काफी होता है।

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