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सावधान : गम्भीर खतरे का संकेत है बंदरों की लगातार बढ़ती आबादी, 1960 के दशक में खदेड़े थे विदेश, 1995 तक रानीखेत में नही हुआ था पदार्पण, पढ़िये यह महत्वपूर्ण आलेख…..

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आज स्थानीय जीव विज्ञानी इस बात से चिंतित हैं कि पहाड़ों से अचानक गौरैया—चील—कव्वे—गिद्ध जैसी कई पक्षी प्रजातियां कहां विलुप्त हो रही हैं ? छोटे पंछी भी भी अब पूर्व की तरह बहुतायत संख्या में नही रहे। रानीखेत से लेखक आनंद अग्रवाल ने अपने आलेख में इस समस्या को प्रमुखता से उठाते हुए समसामयिक विश्लेषण किया है। साथ ही स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि बंदरों की बढ़ती संख्या न केवल इंसानों, ​बल्कि पक्षी जगत के लिए भी अत्यंत घातक है। उन्होंने अपने आलेख में ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए यह बताने का प्रयास किया है कि किस तरह से बंदरों की जमातों ने कई पक्षी प्रजातियों के आश्रय उजाड़ दिए हैं और भविष्य के लिए कितना बड़ा संकट पैदा होने जा रहा है। वहीं उन्होंने इस समस्या का समाधान भी सुझाया है। लीजिए, विस्तार से पढ़िये यह महत्वपूर्ण आलेख। — सं.

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वर्तमान में अनेक पक्षी—प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं अथवा बहुत ही कम संख्या में दिखाई दे रही हैं। कुछ पक्षी प्रजातियों के तो कभी—कभार ही दर्शन हो पा रहे हैं। अब मकर संक्रान्ति पर्व को ही ले लीजिए, कभी जहां इस पर्व पर सैकड़ों कव्वे एकत्रित हो जाते थे, अब ढूंढे नही मिलते हैं। घुघुते खाने को कव्वे मिलते ही नही हैं। अनेक विद्वान इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए यह बताते हैं कि तरह—तरह के टावर आज वातावरण में रेडियेशन फैला रहे हैं। आसमान में तारों का जाल फैल चुका है, जिनमें फंस कर यह जान गंवा रहे हैं। बावजूद इसके, मौजूदा साक्ष्य कुछ और ही बयां कर रहे हैं।

इन्होंने उजाड़ दिए पंछियों के आश्यिाने, खत्म कर दी नस्लें !
दरअसल, पुराने समय के मकानों में गौरेया जैसे पक्षियों को घर बनाने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाती थी। मकानों की दरारों में यह अपने घर ऐसी जगह बनाते थे, जहां पर इन्हें कोई खतरा नही होता था। चील—कौव्वे पेड़ों की सबसे ऊंची शाखा पर घर बनाते थे। अन्य चिड़ियों को भी घास—फूस की झोपड़ियों में घर बसाने की जगह मिल जाती थी। पुराने जमाने के मकानों के भीतर से इनकी चहचाहट सुनने लायक होती थी। अब चूंकी बंदरों की संख्या पहाड़ों में बहुत अधिक बढ़ चुकी है। इन्होंने भी इन चिड़ियों चील—कव्वों के घोंसले उजाड़ दिये हैं। इनकी पहुंच हर जगह है। नित्य समाचारों में बंदरों द्वारा खेती—बाड़ी को पहुंचाये जाने वाले नुकसान की ख़बरें आती रहती हैं, लेकिन सरकार जैसे कान में तेल डालकर सोई है। कभी किसी ने इस विकराल समस्या पर ध्यान देने की जरूरत नही समझी।

यह भी जानिए — 1960 में ब्रिटेन भेजे गये थे बंदर, 1995 तक रानीखेत में नही थे बंदर !
1960 के दशक में बंदरों को पकड़ कर ब्रिटेन भेजा गया था। 1995 तक रानीखेत में बंदर नही थे। उसके बाद धीरे—धीरे यहां बंदरों की आबादी बढ़ते चली गयी। आज लगभग एक लाख बंदर रानीखेत के आस—पास होंगे। जो नित्य पक्षियों के घोंसले तोड़ रहे हैं, खेती उजाड़ रहे हैं, लोगों को काट रहे हैं। एक सुझाव है कि इन उत्पाती बंदरों को सन् 1960 की तर्ज पर भारत से बाहर करते हुए चीन की सीमा पर खदेड़ दिया जाये।

जिला प्रशासन को लेना होगा फैसला, नजदीकी स्थानान्तरण समाधान नही !
जिला प्रशासन कई बार 500 रूपये प्रति बंदर के हिसाब से बंदर पकड़ने की कार्रवाई शुरू करवाता है। पिछले दिनों अल्मोड़ा में मथुरा से बंदर पकड़ने की टीम बुलाई गई थी। जिसका क्या नतीजा निकला यह कोई नही जानता है, लेकिन कुछ बंदर पकड़ यह लोग शहर से मात्र 10—20 किमी दूर जंगल में छोड़ आते हैं। जहां से यह बंदर आस—पास के गांवों को अपना निशाना बनाना शुरू कर देते हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या यह कोई बंदरों की समस्या का हल है कि हम अपने आस—पास के गांवों में बंदरों को छोड़ अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लें ? मैदानी भागों में रहने वाले लोगों ने बंदर पकड़ पहाड़ों में छोड़ दिए हैं। यह एक तरह का स्थानान्तरण है, समस्या का हल नही। कुछ समय पर जिला मुख्यालय अल्मोड़ा से बंदरों की नसबंदी की ख़बरें मीडिया के माध्यम से उजागर हुई थीं, लेकिन अब इस कार्रवाई का क्या हुआ इसका कुछ पता नही है।

1960 के बाद नही हुई कोई सार्थक पहल, बढ़ती संख्या बड़े खतरे का संकेत
1995 से पहले गांव का एक बूढ़ा व्यक्ति भी अपने खेतों में कुछ भी पैदा कर लेता था, लेकिन अब बंदरों के कारण यह सम्भव नही हो पा रहा है। तत्कालीन सरकार ने 1955 से 1960 तक जो हल इन बंदरों का ढूंढा था वह अब क्यों नही संभव है ? जितनी इनकी संख्या बढ़ेगी इंसानों पर हमले के मामले भी बढ़ते जायेंगे। झुंड में एकत्रित होने वाले बंदर बहुत खतरनाक हो सकते हैं। इनका स्वभाव है कि यदि एक बंदर किसी पर हमला बोले तो सभी एकसाथ आक्रमण कर देते हैं। अतएव बंदरों की बढ़ती संख्या भविष्य में एक बड़े संकट का संकेत है।

— आनंद अग्रवाल, सदर बाजार, रानीखेत (उत्तराखंड)

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Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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