पंडित गोविंद बल्लभ पंत की जन्मभूमि से जुड़ी सड़कों की बदहाली
एडवोकेट कवीन्द्र पंत ने डीएम को सौंपा ज्ञापन
CNE REPORTER, अल्मोड़ा। विकास की बुनियादी जरूरतों में शामिल सड़क सुविधा को लेकर सरकारी दावों के बीच अल्मोड़ा जिले के हवालबाग विकासखंड की कई महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाएं वर्षों से अधर में लटकी हुई हैं। कहीं सड़क निर्माण शुरू हुए 13 वर्ष बीत चुके हैं, तो कहीं 11 साल बाद भी सड़क का एक हिस्सा अधूरा पड़ा है। कई मार्गों के लिए धनराशि स्वीकृत होने के बावजूद निर्माण और डामरीकरण की प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है।
इन सड़कों की बदहाल स्थिति को लेकर एडवोकेट कवीन्द्र पंत ने जिलाधिकारी अल्मोड़ा को ज्ञापन सौंपकर लंबे समय से अर्धनिर्मित एवं निर्माणाधीन मोटर मार्गों का निर्माण शीघ्र पूरा कराने तथा उनका डामरीकरण कराने की मांग की है। उन्होंने अपने पूर्व अनुरोध पत्र दिनांक 7 जुलाई 2026 का हवाला देते हुए कहा है कि उस समय जिन सड़कों की स्थिति प्रशासन के संज्ञान में लाई गई थी, उनमें अब तक कोई ठोस सुधारात्मक कार्य प्रारंभ नहीं हुआ है।

ज्ञापन में कवीन्द्र पंत ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई है कि संबंधित सड़कें उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री एवं भारत के पूर्व गृहमंत्री, महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के जन्मस्थान से जुड़ी हैं। ऐसे ऐतिहासिक क्षेत्र की सड़कें वर्षों तक निर्माणाधीन रहना न केवल क्षेत्रवासियों के लिए परेशानी का विषय है, बल्कि विकास व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
13 साल में भी पूरा नहीं हुआ 13 किलोमीटर का मार्ग
ज्ञापन में सबसे प्रमुख रूप से खूंट-धामस-मटेला-रेखलधार-चम्पा मोटर मार्ग (खूंट धामस बसर ज्योली मोटर मार्ग) का मामला उठाया गया है। इस मार्ग की कुल लंबाई 13 किलोमीटर है, जिसमें 9 किलोमीटर हिस्सा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधीन तथा शेष 4 किलोमीटर लोक निर्माण विभाग प्रांतीय खंड के अधीन है।
मार्ग के प्रथम चरण के निर्माण के लिए 257.87 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति के सापेक्ष निर्माण कार्य सितंबर 2013 में शुरू हुआ था। लेकिन निर्माण शुरू हुए करीब 13 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह सड़क पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क निर्माण की गति किस तरह लोगों की उम्मीदों को पीछे छोड़ रही है।
11 वर्ष बाद भी आधा किलोमीटर सड़क अधूरी
दूसरा मामला खूंट महारूद्रेश्वर मोटर मार्ग का है। लोक निर्माण विभाग प्रांतीय खंड के अधीन आने वाले इस 3 किलोमीटर लंबे मार्ग को 7 मार्च 2015 को स्वीकृति मिली थी।
ज्ञापन के अनुसार प्रथम चरण के लिए 17.55 लाख रुपये, नव निर्माण के लिए 174.20 लाख रुपये तथा डामरीकरण के लिए 125.24 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति हुई थी। इसके बावजूद पिछले करीब 11 वर्षों में केवल ढाई किलोमीटर सड़क ही निर्मित हो सकी है, जबकि शेष आधा किलोमीटर निर्माण अभी भी लंबित है।
और तो और, डामरीकरण के लिए स्वीकृत 125.24 लाख रुपये में से 104.13 लाख रुपये खर्च किए जाने के बावजूद सड़क का निर्माण और डामरीकरण अपेक्षित रूप से पूरा नहीं हो सका है। यह स्थिति सरकारी धन के उपयोग और परियोजनाओं की निगरानी को लेकर भी सवाल खड़े करती है।
2021 में शुरू हुआ काम, पांच साल बाद भी सड़क कच्ची
ज्ञापन में शीतलाखेत-स्याहीदेवी-बागीचा मोटर मार्ग की स्थिति भी उठाई गई है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अधीन इस मार्ग की स्वीकृत लंबाई 3.80 किलोमीटर है। इसे 11 जुलाई 2016 को स्वीकृति मिली थी।
प्रथम चरण में 117.13 लाख रुपये तथा नव निर्माण के लिए 86.90 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति के बाद सड़क का निर्माण वर्ष 2021 में शुरू हुआ। लेकिन कवीन्द्र पंत के अनुसार विभाग टेंडरिंग प्रक्रिया तक को समय पर पूरा नहीं कर पाया, जिसके कारण पांच वर्ष गुजर जाने के बाद भी सड़क कच्ची स्थिति में है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना कार्यालय से उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस मार्ग के डामरीकरण के लिए 8 जनवरी 2026 को ही 562.94 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति मिल चुकी है, लेकिन इसके बावजूद धरातल पर सड़क को पक्की सड़क का स्वरूप मिलने का इंतजार बना हुआ है।
महारूद्रेश्वर मंदिर तक सड़क निर्माण का भी उठाया मुद्दा
एडवोकेट कवीन्द्र पंत ने अपने ज्ञापन में केवल लंबित सड़कों को पूरा कराने की मांग ही नहीं की, बल्कि क्षेत्र की कनेक्टिविटी को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव तैयार कराने की मांग भी की है।
उन्होंने अनुरोध किया है कि खूंट-धामस-मटेला-रेखलधार-चम्पा मोटर मार्ग (खूंट धामस बसर ज्योली मोटर मार्ग) से ग्राम अघार, टकौली, कूलू होते हुए महारूद्रेश्वर मंदिर तक मोटर मार्ग निर्माण के लिए प्रस्ताव तैयार करने हेतु संबंधित सक्षम प्राधिकारी को आवश्यक निर्देश दिए जाएं।
जनता को कब मिलेगी गड्ढों और कच्ची राहों से निजात?
पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, पर्यटन और रोजमर्रा के जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। सड़कें अधूरी रहने का सीधा असर ग्रामीण आबादी पर पड़ता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर बच्चों के विद्यालय जाने और किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने तक हर गतिविधि प्रभावित होती है।
ऐसे में वर्षों पहले स्वीकृत परियोजनाओं का लंबी अवधि तक अधूरा रहना गंभीर जनहित का विषय है। खासकर तब, जब संबंधित मार्ग ऐतिहासिक महत्व वाले क्षेत्र को जोड़ते हों और कई परियोजनाओं के लिए करोड़ों रुपये की वित्तीय स्वीकृतियां पहले ही मिल चुकी हों।
कवीन्द्र पंत ने जिलाधिकारी से पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए संबंधित विभागों को आवश्यक निर्देश जारी करने और लंबित निर्माण कार्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा कराने तथा सड़कों का डामरीकरण सुनिश्चित कराने का अनुरोध किया है। अब देखना यह है कि वर्षों से इंतजार कर रहे ग्रामीणों को सरकारी फाइलों से निकलकर धरातल पर पक्की सड़क कब मिलती है।



