मनराल जयंती पर​ विशेष : (जन्म 10 अगस्त 1940—अवसान 20 जून 2007) : हिंदी साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर बलवंत मनराल, कभी नही भूलेगा उत्तराखंड

उक्त आलेख महान साहित्यकार बलवंत मनराल के निधन के पश्चात सुप्रसिद्ध साहित्यकार व शिक्षाविद् स्व. डॉ. शेर सिंह बिष्ट, अल्मोड़ा की कलम से लिखा गया…

महान साहित्यकार बलवंत मनराल

उक्त आलेख महान साहित्यकार बलवंत मनराल के निधन के पश्चात सुप्रसिद्ध साहित्यकार व शिक्षाविद् स्व. डॉ. शेर सिंह बिष्ट, अल्मोड़ा की कलम से लिखा गया था। आज मनराल जयंती पर हम इस आलेख को पाठकों हेतु प्रकाशित कर रहे हैं।इस महत्वपूर्ण आलेख के रचनाकार प्रो. बिष्ट भी आज हमारे बीच नही हैं। हम उनको भी श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। — सं.

हिंदी साहित्य के साठोत्तरी कथाकारों में श्री बलवंत मनराल ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। वे उत्तराखंड के एक ऐसे संघर्षशील प्रतिभा संपन्न एवं स्वाभिमानी रचनाकार रहे हैं, जिनका नाम साहित्यकारों में आज भी बड़े आदर से लिया जाता है। उन्होंने कभी साहित्यिक गुटबंदी जनित उपेक्षा की परवाह नहीं की। यद्पि दिल्ली में रहते हुए उन्होंने अपना अधिकांश समय साहित्य सृजन में व्यतीत किया, परंतु हिंदी समीक्षकों को पटाने का काम कभी नहीं किया। वे शासकीय विद्यालय में अध्यापन कार्य के साथ-साथ स्वांतः सुखाय सृजनरत रहे।

साठ के दशक में बलवंत मनराल की पहचान एक उभरते कहानीकार के रूप में होने लगी थी। जब उस समय की प्रतिष्ठित ‘कहानी’ पत्रिका में उनकी कहानियां छपने लगीं। इसके बाद 20 जनवरी 1962 ईं. में जब ‘धर्मयुग’ में उनकी ‘धनुली’ कहानी छपी तो इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनकी एक पहचान बनने लगी। इसके बाद तो ‘कादम्बिनी’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘ज्ञानोदय’, ‘सरिता’, ‘स्वतंत्र भारत’, ‘साहित्य संदेश’, ‘धर्मयुग’, ‘मुक्ता’ आदि तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां, कविताऐं एवं लेख आदि निरंतर प्रकाशित होते रहे। देश की लगभग 50 पत्र—पत्रिकाओं में उनकी रचनाऐं प्रकाशित हुई हैं तथा कई रचनाओं का मराठी, गुजराती, पंजाबी एवं उर्दू आदि भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। कादम्बिनी की अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानी सर्वश्रेष्ठ चुनी गई। उनकी अब तक काव्य, कहानी, निबन्ध, आलोचना, हास्य-व्यंग्य आदि विधाओं से संबंधित छोटी-बड़ी लगभग 20 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें – ‘पहाड़ आगे : भीतर पहाड़’, ‘धीरो बैंणा धीरो’, ‘महानगर का आदमी’, ‘प्रचंड शौर्य का महासूर्य’, ‘खड़े-ठाड़े’, ‘उलट फेर’, ‘बिन पायों का पलंग’, ‘कैक्टस’, ‘अटल पहाड़ चलता है’, ‘कभी न होगा अंत’, ‘एक खून यह भी’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

बलवंत मनराल की रचनाओं में पहाड़ पूरी तरह रचा बसा है। ग्रामीण परिवेश से लेकर शहरी जीवन तक के परिदृश्य बड़ी जीवंतता के साथ उनकी रचनाओं में देखे जा सकते हैं। वे धरती के जीवन से जुड़े रचनाकार हैं। इस कारण उनकी रचनाओं में कल्पना की रंगीनी के बजाय जीवन का खुरदरा यथार्थ अधिक दिखाई देता है। वहां जीवन का भोगा हुआ यथार्थ भारतीय जीवन मूल्यों के आदर्शपरक मार्ग की ओर अग्रसर मिलेगा। उनकी रचनाओं में ग्रामीण एवं शहरी जीवन की जीवंतता एवं प्रमाणिकता का मुख्य कारण यह है कि उन्होंने इसे नजदीक से देखा और भोगा है।

अपनी पत्नी श्रीमती सुधा मनराल व तीन पुत्रों आशीष, मनीष व दीपक के साथ बलवंत मनराल (दुर्लभ फाइल फोटो)

10 अगस्त 1940 ई. को कत्यूरी वंश के राजपूत घराने में माता श्रीमती गोविंदी देवी तथा पिता श्री शिवेंद्र सिंह मनराल के घर जन्मे बलवंत मनराल का प्रारम्भिक जीवन रानीखेत तथा अल्मोड़ा की हरी-भरी वादियों में बीता। रानीखेत कैंट की एक पाठशाला में दूसरी कक्षा तक की शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत उन्होंने राजकीय इंटर कालेज अल्मोड़ा से 1954 ई. में हाईस्कूल, रामजे इंटर कालेज अल्मोड़ा से 1958 ई. में इंटरमीडिएट, अल्मोड़ा डिग्री कालेज, आगरा विश्वविद्यालय से 1960 में बी.ए., 1962 में एम.ए. तथा 1963 ई. में बी.टी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तद्उपरांत दिल्ली के शासकीय विद्यालय में 1963 से 1989 तक अध्यापन कार्य करते रहे।

सम्मान समारोह: मुम्बई में ‘हिमाद्री उत्तराखंड गौरव अलंकरण 2005’ से सम्मानित होते बलवंत मनराल

25 अक्टूबर 1987 को ब्रेन हैम्रेज के कारण वे पक्षाघात की चपेट में आ गए। जिससे उनका स्पीच सैंटर क्षतिग्रस्त हो गया और चलना, फिरना, बोलना, लिखना सब बंद हो गया। इस कारण 25 वर्ष की शासकीय सेवा के उपरांत अगस्त 1989 को उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। बलवंत मनराल के संघर्षमय जीवन में उनकी पत्नी श्रीमती सुधा मनराल का बहुत बड़ा योगदान रहा। जून 1965 ई. में बलवंत मनराल का विवाह नैनीताल के तत्कालीन ट्रेजरी आफीसर श्री उमेद सिंह खाती की पुत्री सुधा खाती के साथ हुआ, जो विवाह से पूर्व एम.ए., अर्थ शास्त्र बी.टी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत राजकीय महिला इंटर कालेज पीलीभीत में अध्यापन कार्य करती थीं। विवाह के बाद नौकरी से त्यागपत्र देकर दिल्ली में ही शासकीय विद्यालय में टी.जी.टी. के रूप में शिक्षण कार्य करने लगी।

एक स्कूली कार्यक्रम में साहित्यकार बलवंत मनराल का अभिवादन

उत्तराखंड आंदोलन के दौरान जब मुजफ्फरनगर कांड हुआ तो बलवंत मनराल उससे अधिक व्यथित और आक्रोशित हो उठे और उन्होंने इस अत्याचार के विरोध में कलम की लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया तथा ‘कत्यूरी मानसरोवर’ पत्रिका के संपादन और प्रकाशन की योजना बनाई। पक्षाघात से अपंग हुए श्री मनराल ने इस महत्त कार्य में अपनी आहुति देने के लिए अपनी पत्नी श्रीमती सुधा मनराल से सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्ति से आठ वर्ष पूर्व ही स्वेच्छा से पद त्याग करवा दिया और दोनों दम्पत्ति उत्तराखंड आंदोलन को गति देने में जुट गए।

एक कार्यक्रम में अपनी बात रखते साहित्यकार मनराल

पक्षाघात से पीड़ित बलवंत मनराल के लिए मुजफ्फरनगर कांड जीवन का टर्निंग प्वांइट सिद्ध हुआ। जो अभी तक बोल, लिख नहीं सकते थे और एक तरह से शून्य शय्याग्रस्त थे, एकाकए इस घटना से जागृत हो उठे और उनसे मन की पीड़ा एवं आक्रोश एक काव्यात्मक कृति की सृजना के रूप में सृजित हो गया। उस कृति का नाम है – ‘पहाड़ आगे : भीतर पहाड़’। 2 अक्टूबर 1994 ई. को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे में हुए घृणित गोली कांड से बलवंत मनराल किस तरह दु:खी थे। इस संबंध में उनका कहना था कि – ‘‘मुजफ्फरनगर कांड लोकतंत्र के इतिहास का एक बड़ा बदनुमा धब्बा है। भारतीय इतिहास के बर्बर ‘जलिया वाला बाग’ हत्याकांड से भी अधिक बदनुमा कांड मैं इसे मानता हूं।……..उस दौरान मैं अपनी अस्वस्थता के कारण परवश लिखने-पढ़ने में भी असमर्थ था। इस कांड ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया और मुझे लगने लगा कि मौत की लंबी अंधेरी सुरंग से मैं बाहर निकल आया हूं। मेरे अंदर प्रतिकार का भाव था। बंदूक की बात तो मैं नहीं कर सकता था, लेकिन कलम के साथ भी काम न कर सकने का बहुत दुःख मन में था। बहुत मुश्किल व श्रमसाध्य प्रयास द्वारा कविताऐं लिख डाली। इन्हीं कविताओं द्वारा मेरे काव्य ‘पहाड़ आगे : भीतर पहाड़’ का शुभारंभ हुआ। इसे आप टर्निंग प्वाइंट कह सकते हैं, लेकिन मैं इसे अपना नया जन्म मानता हूं।” — बलवंत मनराल व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ लेख रीना अग्रवाल, पृष्ठ 81, लघु शोध प्रबंध से

साहित्यसेवी मनराल का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते स्कूली बच्चे

उत्तराखंड आंदोलन को कुचलने के लिए जब तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खटीमा, मसूरी, नैनीताल तथा देहरादून की दर्दनाक घटनाओं के बाद मुजफ्फरनगर के घृणित कांड को अंजाम दिया गया तो बलवंत मनराल के भीतर का सोया पहाड़ उनके सम्मुख साकार रूप में उपस्थित हो गया। इस कांड के बाद की अपनी मनःस्थिति के बारे में वह बताते है – ‘‘इसी कांड के शर्मनाक दृश्य से मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुंची। पक्षाघात से भी अधिक तीव्र आघात पहुंचाया। मैं अपनी यातना को भूल गया। तब अंतर्मन ने विवश किया कि सरकारी अत्याचार ने मानों मुझे चुनौती दी है। लेखन, वाणी की असमर्थता में भी मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया। तीन रातों तक कई-कई पृष्ठ फाड़ते हुए मैं केवल एक ही पंक्ति लिख पाया। – ‘‘मैं मरण द्वार से वापस आया हूं। इसी पंक्ति ने मेरी बेचैनी के द्वार को कुछ समय के लिए विराम दिया। क्रोध, आवेश के पागलपन को शांत किया।’’
मरण द्वार से वापस लौटे बलवंत मनराल ने तत्कालीन आततायी सत्तासीनों को ललकारते हुए लिखा –
सत्ता श्रृगों, चेतो !
इतिहास को याद करो
जब भी जनाक्रोश –
संघर्ष का बिगुल बजाता है
मारे गए निरीहों की हड्डियों से वज्र बनता है
आसुरी दमन-तंत्र को – सिरकटा सा कर देता है
बड़े सत्ताकामी सिंहासनों को
धूल चटाता है।
— पहाड़ आगे : भीतर पहाड़, पृष्ठ 37 से

पत्नी सुधा मनराल के साथ बलवंत मनराल (दर्लभ फाइल फोटो)

और यह कलम का सिपाही अकेले के दम पर मैदान मार लेने की ख्वाहिश लेकर आक्रोश के उस चरम बिंदु पर पहुंच जाता है, जहां फांसी के फंदे की भी परवाह न करता हुआ सा आततायी के मुंह पर थूक देने का दुःसाहस कर डालता है –
आंखों में सारी घृणा भर,
चरित्रहीन सत्ता के मुंह पर थूक दूं
रामपुर तिराहे के पास
खून से सनी सड़क,
जनतंत्र को छल रहा है
समाजवाद का मसीहा !
— पृष्ठ 24, पहाड़ आगे भीतर पहाड़

बलवंत मनराल के मन की यह घृणा, वेदना एवं वितृष्णा अनायास ही नहीं उपजी थी। इस रामपुर तिराहा कांड ने पशुता की सभी हदें लांघ दी थीं। बर्बरता भी जैसे इस घृणित बर्बरता को देखकर शर्मिंदा हो उठी हो। बलवंत मनराल जैसे स्वाभिमानी एवं संवेदनशील रचनाकार के लिए यह सब असहनीय था। उनकी आवाज मानों पूरे उत्तराखंड की आवाज बनकर चीख-चीख कर पुकार रही हो –
”बलात्कार का शिकार
वह युवती
मेरी बहन या आपकी भाभी
पत्नी भी हो सकती है
अपहृत किशोरी
हममें से किसी की बेटी अवश्य है।”

और इस तरह के बर्बर एवं घृणित कांडों के बाद भी न्याय की गुहार करने पर अपराधी को सजा दिलाने के नाम पर जांच आयोग बिठाने का जो ड्रामा भारतीय लोकतंत्र में खेला जाता रहा है, उसकी नियति और नियत से बलवंत मनराल भली भांति परिचित थे। हमारी तथाकथित प्रजातांत्रिक सरकारें कितनी असंवेदनशील हो गई हैं, उसी पर तल्ख व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने से भी वे नहीं चूकते –
”रामपुर तिराहे के पास
खून से सनी सड़क
लाजवंती की टूटी चूड़ियां
खोजते हैं
जांच आयोग
विश्व का सबसे विशाल
प्रजातंत्र।”

इस प्रकार मनराल जी का ‘पहाड़ आगे : भीतर पहाड़’ काव्य उत्तराखंड आंदोलन का एक जीवंत ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। आहत पहाड़ की शौर्य कथा लिखने के लिए वे मरण द्वार से भी लौट आये थे। उन्हें अपनी कलम की ताकत पर अटूट विश्वास था, जो आग उगल सकती थी और आग के शोलों में आततायी को भस्मीभूत करने की क्षमता रखती थी। इसीलिए वे जनविरोधी सरकार को चुनौती देते हुए ललकारने का साहस भी जुटा पाते हैं –
”तुम्हें अस्वीकृत करने की
हमारी इस घोषणा को
अफवाह बनाकर टाल न देना
क्योंकि हम सभा-जुलूस नारे नहीं
कलम के सिपाही हैं…..
किसी भी हथियार से कभी नहीं मरते हम !”

कलम का यह सिपाही 20 जून 2007 को 3.35 बजे दिल्ली के एक अस्पताल में कैंसर से लड़ते हुए हम सबसे पार्थिव शरीर से विदा हो गया, परंतु अपनी लेखनी से स्वयं को अमर कर गया।

परिजनों सहित देव पूजन करते साहित्यकार मनराल

बलवंत मनराल का रचना संसार परिमाण की दृष्टि से बहुत भारी भरकम नहीं है, परंतु जितना भी है उत्तराखंड की माटी की खुशबू से सरोबार है। क्षेत्रीय पहचान से लेकर जातीय गौरव का शंखनाद उनकी रचनाओं में सुनाई देता है। उत्तराखंड की गौरव गाथा उनकी रग-रग में समाई हुई थी। वस्तुतः बलवंत मनराल का व्यक्तित्व स्वयं में एक पहाड़ के सदृश्य ही था। पहाड़ की तरह ही अपनी बात पर अटल रहने वाले, स्वभाव से भी पहाड़ की तरह ही खुरदरे, लेकिन पहाड़ के समान ही सरल, सहज एवं सीधे-सादे स्वभाव वाले घुर पहाड़ी थे। वज्र से भी कठोर और पुष्प से भी कोमल उनका स्वभाव था। वे भावुक प्रकृति के और किसी पर भी आसानी से भी विश्वास करने वाले एक नेक इंसान थे। वे अपनी धुन के पक्के थे, चाहे उसके लिए उन्हें कितनी ही कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े। उनका पारदर्शी व्यक्तित्व तमाम तरह की जटिलताओं से परे एक खुली किताब की तरह था। वे पक्के सिद्धांतवादी अपने उसूलों एवं जीवन मूल्यों से समझौता न करने वाले व्यक्ति थे, जिसे वर्तमान संदर्भों में एक तरह की अव्यवहारिकता भी कहा जा सकता है। परंतु वे हिंदी साहित्य के प्रति समर्पित रचनाकार थे। अन्य हिंदी साहित्यकारों की भांति साहित्यिक गुटबंदी एवं जोड़ तोड़ में उनका विश्वास नहीं था।

स्व. बालम सिंह जनौटी की पुण्य स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते मनराल। साथ में डाॅ. दिवा भट्ट एवं श्रीमती जनौटी

बलवंत मनराल के साहित्यिक अवदान का अभी तक सम्यक मूल्यांकन नहीं हो पाया है। हालांकि वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक सृजनरत रहे। उनकी साहित्यिक भूख अमिट थी और जिजीविषा अजेय। यही कारण है कि पक्षाघात से अस्वस्थ होने पर भी निरंतर जीवन संघर्ष करते हुए वे साहित्य सृजन से विरत नहीं हुए। साहित्य के प्रति उनका लगाव और समर्पण किस पराकाष्ठा तक था, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा पोषित संचालित राष्ट्रीय स्तर की ‘धर्मयुग’, ‘दिनमान’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी बड़ी-बड़ी पत्रिकाऐं दम तोड़ चुकी थीं, ऐसे में अपने पेंशन आदि के सीमित आर्थिक संसाधनों से ‘कत्यूरी मानसरोवर’ जैसी त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का अबाध् गति से संपादन, प्रकाशन करते चले जाना स्वयं में एक तरह का जुनून ही था, जिसके लिए उन्होंने न कभी सरकारी, गैर सरकारी संस्थाओं से आर्थिक सहायता ली, न विज्ञापनों का ही सहारा लिया और न ही किसी धनपति के आगे ही हाथ पसारे। ‘कत्यूरी मानसरोवर’ के माध्यम से उन्होंने स्थानीय रचनाकारों को भी एक मंच प्रदान किया, जिससे उनकी रचनात्मक प्रतिभा को विकसित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

लोकार्पण: ‘मेरी आवाज़ सुनो’ पुस्तक का लोकार्पण करते बलवंत मनराल। साथ में डाॅ. रमेश चंद्र पांडे राजन व हेमंत जोशी।

पिछले कुछ दशकों से अल्मोड़ा जैसी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक नगरी में एक तरह का साहित्यिक खालीपन सा आ गया था। ऐसे में उत्तराखंड आंदोलन से आंदोलित बलवंत मनराल का अपने दिल्ली स्थित आवास जनकपुरी से अप्रैल 1996 ई. से ‘कत्यूरी मानसरोवर’ का संपादन व प्रकाशन तथा बाद में अपने नृसिंहबाड़ी अल्मोड़ा स्थित आवास से उसका प्रकाशन करना एक तरह का वरदान सिद्ध हुआ। कत्यूरी मानसरोवर के अलावा वे अनियतकालिक ‘धर्मयुग’ पत्रिका का भी संपादन व प्रकाशन करते रहे। अपने अल्मोड़ा स्थित आवास में समय-समय पर विचार गोष्ठियों एवं कवि गोष्ठियों का आयोजन कर उन्होंने जैसे इस नगर की सोई हुई साहित्यिक चेतना को फिर से जगा दिया था। वे लोक मंगल कार्य साहित्य सृजन के पक्षधर थे, न कि मात्र लोक रंजक साहित्य के। इसके पीछे उनकी भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति गहरी आस्था सन्निहित थी।

वे आजीवन नैतिक मूल्यों के प्रबल हिमायती रहे तथा अनैतिकता, भ्रष्टाचार एवं अनाचार के प्रति अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे। वे ईमानदार, निडर, कर्मठ, साहसी एवं दृढ़ संकल्पशील व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर हो रहे गलत कार्यों एवं जन विरोधी नीतियों का हमेशा विरोध किया। उनमें सच को सच तथा झूठ को झूठ कहने का अदम्य साहस था। ऐसे सिद्धांतवादी, राष्ट्रवादी, भारतीय जीवन मूल्यों के पक्षधर, स्वस्थ पत्रकारिता के हिमायती एवं समर्पित साहित्यकार का हमारे बीच से एकाएक चला जाना स्वयं में अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। ऐसे साहित्य मनीषी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उत्तराखंड की जनता उनके बताये मार्ग का अनुसरण करे तथा उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का यथासंभव प्रयास करें।