थालीधार में विकास के दावों की खुली पोल
प्रसव के बाद महिला को घर पहुंचाने के लिए ग्रामीणों ने तय किया पैदल सफर
CNE REPORTR, बागेश्वर। विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना फासला है, इसकी तस्वीर बागेश्वर के थालीधार क्षेत्र के सरण गांव में एक बार फिर सामने आई है। यहां सड़क आज भी ग्रामीणों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि एक अधूरा सपना बनी हुई है। हालात इतने गंभीर हैं कि बागेश्वर में डिलीवरी के बाद एक महिला को अपने घर तक पहुंचने के लिए करीब दो किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना पड़ा।
सरण गांव निवासी निशा पत्नी बीरेंद्र सिंह की बागेश्वर में डिलीवरी हुई। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उन्हें घर तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को सड़क से करीब दो किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। प्रसव के तुरंत बाद एक महिला को इस तरह पहाड़ी रास्ते पर पैदल ले जाना अपने आप में उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जो गांव-गांव सड़क पहुंचाने और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे करती रही है।
कागजों में सड़क, जमीन पर पगडंडी!
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने की समस्या कोई नई बात नहीं है। मरीज हों, गर्भवती महिलाएं हों, बुजुर्ग हों या छोटे बच्चे—हर किसी के लिए सड़क का अभाव रोजमर्रा की परेशानी बना हुआ है।
सबसे ज्यादा चिंता तब होती है जब गांव में कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए या अचानक चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़े। ऐसे समय में एंबुलेंस गांव के दरवाजे तक पहुंचेगी या नहीं, यह सवाल ही बेमानी हो जाता है। मरीज को पहले सड़क तक पहुंचाना पड़ता है और इसके लिए परिजनों व ग्रामीणों को कई किलोमीटर तक पैदल चलने की मजबूरी रहती है।
विडंबना यह है कि जिस दौर में सड़कें विकास की पहली सीढ़ी मानी जाती हैं, उसी दौर में थालीधार क्षेत्र के ग्रामीण सड़क के लिए धरने पर बैठे हैं।
53 दिन से धरना, फिर भी व्यवस्था की ‘नींद’ नहीं टूटी
सड़क निर्माण की मांग को लेकर ग्रामीणों का आंदोलन शनिवार को 53वें दिन भी जारी रहा। आंदोलन स्थल पर राजेंद्र सिंह दानू (43) और रमेश सिंह दानू (38) धरने पर बैठे।
आंदोलनकारियों का कहना है कि इतने लंबे समय से शांतिपूर्ण आंदोलन चलने के बावजूद शासन-प्रशासन की ओर से सड़क निर्माण को लेकर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है।
ग्रामीणों का सवाल सीधा है—आखिर अपनी बुनियादी जरूरत के लिए किसी गांव को कितने दिन धरने पर बैठना पड़ेगा?
क्या 53 दिन का धरना भी प्रशासन की नजर में पर्याप्त नहीं है? या फिर ग्रामीणों की समस्या तब तक गंभीर नहीं मानी जाएगी, जब तक कोई बड़ी दुर्घटना न हो जाए?
प्रसव के बाद दो किलोमीटर पैदल सफर ने खोल दी व्यवस्था की हकीकत
निशा को डिलीवरी के बाद घर तक पहुंचाने के लिए दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। यह महज एक महिला की परेशानी नहीं है। यह उस पूरे गांव की स्थिति का आईना है, जहां आज भी सड़क के अभाव में सामान्य जीवन असामान्य परिस्थितियों में जीने को मजबूर है।
जिस महिला को प्रसव के बाद आराम और देखभाल की जरूरत होती है, उसे घर तक पहुंचने के लिए पैदल रास्ता तय करना पड़ा। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि इसी रास्ते में किसी मरीज की हालत बिगड़ जाए तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
सरकारी फाइलों में सड़क की योजना हो सकती है, लेकिन ग्रामीणों के लिए सड़क तब मानी जाएगी जब वाहन उनके घर तक पहुंच सके।
सड़क सिर्फ आवागमन नहीं, जिंदगी और मौत के बीच का रास्ता भी
आंदोलनकारियों ने कहा कि सड़क को केवल आवागमन की सुविधा मानना भूल होगी। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क सीधे तौर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आपातकालीन सेवाओं से जुड़ी है।
गांव में सड़क न होने का अर्थ है कि बीमारी की स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने में अतिरिक्त समय लगेगा, गर्भवती महिला को कठिन रास्ते से गुजरना पड़ेगा और बुजुर्गों तथा बच्चों के लिए हर यात्रा चुनौती बन जाएगी।
ऐसे में निशा को डिलीवरी के बाद दो किलोमीटर पैदल घर पहुंचाए जाने की घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि दूर-दराज के गांवों में विकास की प्राथमिकताएं आखिर तय कौन करता है?
आंदोलनकारियों का ऐलान—सड़क नहीं तो आंदोलन भी नहीं रुकेगा
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि सड़क निर्माण की मांग पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा। उनका कहना है कि वे किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि ऐसी मूलभूत सुविधा चाहते हैं, जो आज के समय में किसी भी गांव के लिए आवश्यक है।
ग्रामीणों का आरोप है कि लंबे समय से आंदोलन के बावजूद शासन-प्रशासन की ओर से ठोस कार्रवाई न होना उनकी समस्या के प्रति गंभीरता की कमी को दर्शाता है।
अब सवाल यह नहीं है कि सड़क कब बनेगी; सवाल यह है कि ग्रामीणों को सड़क के लिए और कितने दिन अपनी आवाज सड़क पर बैठकर उठानी पड़ेगी।
धरने में ये लोग रहे मौजूद
शनिवार को धरना स्थल पर पूर्व कैप्टन एवं अध्यक्ष रतन सिंह दानू, संरक्षक चरण सिंह बघरी, संयोजक पूर्व कैप्टन महिमन सिंह दानू, सचिव करम सिंह दानू, उपाध्यक्ष शेर सिंह दानू, गजेंद्र सिंह धामी, मदन सिंह धामी, प्रताप सिंह, भूपाल सिंह, तारा देवी, पुष्पा देवी और मोहनी देवी समेत कई ग्रामीण मौजूद रहे।
ग्रामीणों ने एक स्वर में कहा कि सड़क निर्माण होने तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
थालीधार की यह तस्वीर व्यवस्था के लिए सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक आईना है—जिसमें विकास के दावों के सामने दो किलोमीटर की वह पगडंडी साफ दिखाई दे रही है, जिस पर प्रसव के बाद एक महिला को घर लौटना पड़ा।




