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मंथन: उत्तराखंड ने तय किया दो दशक का सफर;; कुर्सी दौड़ से नहीं, विकास की सच्ची सोच से ही राज्य बनेगा आत्मनिर्भर!

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सीएनई डेस्क, अल्मोड़ा
उत्तराखंड राज्य ने दो दशक का सफर तय कर लिया। बीस साल पहले जनता के बड़े बलिदान और संघर्ष के फलस्वरूप नये राज्य के रूप में उत्तराखंड जन्मा। इन बीस सालों ने तमाम उतार—चढ़ाव देख लिये हैं। विकास का ढोल बजता रहा है। सियासी उथल—पुथल और सियासी खेल चलते आ रहे हैं, लेकिन अलग राज्य की अवधारणा का सवाल आज भी सोचनीय ही बना है। राज्य स्थापना दिवस पर इस पर मंथन जरुरी हो जाता है। जिस सुनहरे भविष्य की आस में जनता ने संघर्ष किया, उसके​ लिए जनता आज भी लालायित ही है।
पहाड़ से रोजगार के कारण युवाओं का पलायन आज भी जारी ही है। साल—दर—साल प्राकृतिक आपदाओं की मार पड़ती रही है, इससे निपटने की ठोस इंतजाम नहीं। आवागमन महंगा हुआ, तो पर्वतीय राज्य के गांवों की यातायात सुविधा घिसी—पिटी हैं। पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य व शिक्षा आदि मूलभूत जरुरतों के राज्य के तमाम क्षेत्र कराह रहे हैं। बेरोजगारों की फौज खड़ी हो चुकी है। बेरोजगार रोजगार पाने को मोहताज हैं। हालत ये है कि हर चीज की जरुरत तब तक पूरी नहीं हो रही, जब तक लड़ाई नहीं लड़ी जाती। छोटी—छोटी की मांग को लेकर आंदोलन जैसा रुख अख्तियार करना मजबूरी हो गई है। वर्तमान में विश्वव्यापी कोरोना महामारी ने राज्य की अर्थव्यवस्था को झकझोरा है। एक तरफ ये स्थिति है ओर दूसरी ओर राजनीति और नौकरशाही अपना—अपना सिक्का जमाने में लगे हैं। राज्य में विकास भी हुआ, मगर अपेक्षित नहीं बल्कि अपूर्ण। प्रमुख राजनैतिक दल अपनी—अपनी नीतियों को सर्वोपरि रखते आई हैं। सरकारें विकास का ढिढोरा पीटते आगे निकल रही हैं। कोई उपलब्धियां गिनाते थक रहे हैं, तो कोई टांग ​खींचने में ताकत खो रहे हैं। मजेदार बात ये है कि ​सबकी जुबान में विकास ही है। मगर धरातल सबके सामने है।
यूं तो देवभूमि उत्तराखंड में पर्यटन, तीर्थाटन, जमीन, वन, पानी, कृषि व बागवानी आदि भरपूर साधन हैं। कमी मानी जा सकती है तो सिर्फ दृढ़ इच्छाशक्ति व ईमानदार ढंग से इन संभावनाओं पर काम करने की। मगर दो दशकों में शायद ऐसे प्रयासों में कमी रही होगी, तभी राज्य की जनता समस्याओं के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पाई या कल्पना के मुताबिक सुकून भरा राज्य आज भी सपना ही बना है। स्थापना दिवस पर ये सब मंथनीय व विचारणीय सवाल है। राज्य को सच व ईमानदारी से विकास के पंख लगाने हों, तो यह महज खुद का गुणगान करने या विकास की सिर्फ बात करने से नहीं होगा। केवल कुर्सी हथियाने और लाभ कमाने को ऐड़ी—चोटी के जोर से भी विकास संभव नहीं है। विकास को तभी संभव है, जब सोच में सिर्फ विकास हो और उस दिशा में सामूहिक रूप से ठोस कदम उठ सकें।

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