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पति-पत्नी में सुलह की गुंजाइश नहीं बची तो सुप्रीम कोर्ट करेगा तलाक मंजूर

सुप्रीम कोर्ट को शादी रद्द करने का अधिकार, 5 जजों की संविधान पीठ का बड़ा फैसला

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने सोमवार को तलाक को लेकर अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर पति-पत्नी का रिश्ता इतना खराब हो चुका है कि अब सुलह की गुंजाइश ही न बची हो, तो कोर्ट भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत तलाक को मंजूरी दे सकता है। इसके लिए उन्हें फैमिली कोर्ट नहीं जाना होगा और न ही 6 महीने का इंतजार अनिवार्य नहीं होगा।

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कोर्ट ने कहा कि उसने वे फैक्टर्स तय किए हैं, जिनके आधार पर शादी को सुलह की संभावना से परे माना जा सकेगा। इसके साथ ही कोर्ट यह भी सुनिश्चित करेगा कि पति-पत्नी के बीच बराबरी कैसे रहेगी। इसमें मैंटेनेंस, एलिमोनी और बच्चों की कस्टडी शामिल है। कोर्ट ने यह आदेश 20 सितंबर 2022 को ही सुरक्षित रख लिया था।

6 महीने का समय हटाने को लेकर सुनवाई कर रही थी बेंच

जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, ए. एस ओका, विक्रम नाथ और जे. के महेश्वरी की संवैधानिक बेंच जिस मुद्दे के तहत सुनवाई कर रही थी, वह था कि हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए अनिवार्य किया गया 6 महीने का समय हटाया जा सकता है या नहीं।

हालांकि सुनवाई के दौरान संवैधानिक बेंच ने इस मुद्दे पर सुनवाई करना तय किया कि शादी अगर पूरी तरह टूट चुकी है तो क्या इसे तलाक देने का आधार माना जा सकता है या नहीं। इसे लेकर कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर दंपती के तलाक के पिछले फैसले में जो भी शर्तें रखी गई हैं, अगर वे पूरी होती हैं तो आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए 6 महीने का इंतजार करना जरूरी नहीं होगा।

सितंबर 2022 में हुई थी मामले की सुनवाई, पढ़िए जजों ने क्या तर्क दिए…

इंदिरा जयसिंह, कपिल सिब्बल, वी गिरी, दुष्यंत दवे और मीनाक्षी अरोड़ा जैसी सीनियर जजों को इस मामले में न्याय मित्र बनाया गया था।

इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया था कि पूरी तरह खत्म हो चुके शादी के रिश्तों को संविधान के आर्टिकल 142 के तहत निरस्त किया जाना चाहिए। जस्टिस दवे ने इसके विरोध में तर्क दिया कि जब संसद ने ऐसे मामलों को तलाक का आधार नहीं माना है तो कोर्ट को इसकी अनुमति नहीं देनी चाहिए।

वी गिरी ने कहा कि पूरी तरह टूट चुकी शादियों को क्रूरता का आधार माना जा सकता है। कोर्ट इसमें मानसिक क्रूरता को भी शामिल करता है। सिब्बल ने कहा कि मेंटेनेंस और कस्टडी तय करने की प्रक्रिया को तलाक की प्रक्रिया से इतर रखना चाहिए, ताकि महिला व पुरुष को आत्महत्या करने से बचाया जा सके।

जस्टिस अरोड़ा ने कहा कि आर्टिकल 142 के तहत अपने विशेषाधिकार को लागू करते ही सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक कानूनों से दायरे से बाहर आ जाता है। यह आर्टिकल न्याय, बराबरी और अच्छी नीयत वाले विचारों का साकार करता है।

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