जिसे कृष्ण मिल गए, उसे फिर संसार से क्या मांगना?
विशेष आध्यात्मिक आलेख : हर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर हम भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं। मंदिर सजते हैं, झांकियां निकलती हैं, मुरली की धुन गूंजती है, “नंद के आनंद भयो” से वातावरण भर उठता है। आधी रात को शंख बजते हैं और हम कहते हैं—कृष्ण आ गए।
लेकिन क्या सचमुच कृष्ण हमारे भीतर आए?
यही प्रश्न इस जन्माष्टमी पर स्वयं से पूछने का है।
क्योंकि कृष्ण का जन्म केवल मथुरा के कारागार में नहीं हुआ था। कृष्ण का जन्म तब भी होता है, जब मनुष्य के भीतर अंधकार के बीच विवेक का दीप जलता है। जब लोभ पर संतोष विजय पाता है। जब अहंकार झुकता है। जब वासना के स्थान पर प्रेम जन्म लेता है। जब भय के बीच विश्वास खड़ा होता है।
कृष्ण का वास्तविक जन्म हमारे भीतर तब होता है, जब हम संसार से सब कुछ मांगना छोड़कर कृष्ण को मांगना शुरू कर देते हैं।
संसार को सब चाहिए, कृष्ण नहीं
मनुष्य की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं।
किसी को धन चाहिए, किसी को संपत्ति। किसी को जमीन चाहिए, किसी को आलीशान भवन। किसी को सत्ता चाहिए, किसी को प्रसिद्धि। किसी को भोग चाहिए, किसी को ऐशो-आराम के तमाम साधन।
जिसके पास एक घर है, उसे दूसरा चाहिए।
जिसके पास करोड़ है, उसे और करोड़ चाहिए।
जिसे सम्मान मिला, वह और सम्मान चाहता है।
और जिसे सब मिल गया, वह भी भीतर से पूछता रहता है—
“अब आगे क्या?”
यह “और” ही संसार का सबसे बड़ा आकर्षण है।
हम पूरी जिंदगी वस्तुएं जोड़ते रहते हैं, लेकिन अंत में पता चलता है कि वस्तुएं बढ़ती गईं और मन की शांति घटती गई।
हमने बहुत कुछ पा लिया, लेकिन स्वयं को नहीं पा सके।
शायद इसलिए कृष्ण हमारे जीवन में आते हैं और पूछते हैं—
“तुम मुझे चाहते हो या मेरी बनाई हुई दुनिया को?”
कृष्ण चाहिए तो फिर कुछ और क्यों चाहिए?
कल्पना कीजिए, किसी के सामने संसार की सारी संपत्ति रख दी जाए और दूसरी ओर स्वयं कृष्ण खड़े हों।
आप क्या चुनेंगे?
धन?
सोना?
जमीन?
महल?
यश?
या कृष्ण?
जिस दिन उत्तर भीतर से निकले—
“मुझे कृष्ण चाहिए।”
उसी दिन आध्यात्मिक यात्रा आरंभ होती है।
क्योंकि कृष्ण को मांगना किसी वस्तु को मांगना नहीं है।
कृष्ण को मांगना है—
शांति मांगना।
प्रेम मांगना।
सत्य मांगना।
समर्पण मांगना।
अपने भीतर लौटने का रास्ता मांगना।
और अंततः उस परम सत्ता की शरण मांगना, जिसके मिलने के बाद संसार की वस्तुएं अपनी जगह तो रहती हैं, लेकिन उनका मोह टूटने लगता है।
तब मन कहता है—
“नाथ, अब कुछु चाहूँ न…”
कृष्ण का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है
कृष्ण हमें संसार छोड़ने की शिक्षा नहीं देते।
वे तो स्वयं संसार के बीच खड़े होकर जीवन जीने का संदेश देते हैं।
वे अर्जुन से कहते हैं—कर्तव्य से मत भागो।
कर्म करो।
लेकिन कर्म के फल में आसक्ति मत रखो।
यही कृष्ण का अद्भुत दर्शन है।
हाथ कर्म में हों और मन कृष्ण में।
घर हो, परिवार हो, व्यवसाय हो, जिम्मेदारियां हों—सब हों।
लेकिन भीतर यह बोध बना रहे कि इनमें से कुछ भी स्थायी नहीं।
धन आएगा और चला जाएगा।
शरीर बदलेगा।
समय बदलेगा।
लोग बदलेंगे।
परिस्थितियां बदलेंगी।
लेकिन जो इन सब परिवर्तनों का साक्षी है, उसकी तलाश कभी समाप्त नहीं होती।
और वही तलाश अंततः कृष्ण तक पहुंचती है।
कृष्ण की सुंदरता में संसार क्यों फीका पड़ जाता है?
कृष्ण की सुंदरता केवल उनके श्याम वर्ण, मोर मुकुट, पीतांबर और अधरों पर सजी मुरली की सुंदरता नहीं है।
उनकी सुंदरता उनके पूर्ण व्यक्तित्व में है।
वह परमात्मा हैं, फिर भी बालक हैं।
वह योगेश्वर हैं, फिर भी ग्वाल-बालों के सखा हैं।
वह विराट हैं, फिर भी यशोदा की ममता में बंध जाते हैं।
वह धर्म के रक्षक हैं, फिर भी प्रेम के आगे स्वयं को समर्पित कर देते हैं।
उनमें ज्ञान है तो प्रेम भी है।
नीति है तो करुणा भी है।
वीरता है तो माधुर्य भी है।
विराटता है तो सरलता भी है।
शायद इसी कारण कृष्ण को देखने के बाद मन किसी और सौंदर्य की तलाश नहीं करता।
क्योंकि बाहर की सुंदरता आंखों को आकर्षित करती है।
कृष्ण की सुंदरता आत्मा को आकर्षित करती है।
जन्माष्टमी का सबसे बड़ा प्रश्न
आज हम कृष्ण का जन्मोत्सव मनाएंगे।
लेकिन क्या हमने अपने भीतर के कंस को पहचाना?
कंस केवल मथुरा का अत्याचारी राजा नहीं है।
हमारे भीतर का क्रोध भी कंस है।
अहंकार भी कंस है।
लोभ भी कंस है।
वासना का अंधापन भी कंस है।
दूसरों के सुख से जलना भी कंस है।
हर समय स्वयं को सही साबित करने की जिद भी कंस है।
और जब इन सबके बीच भीतर कृष्ण जन्म लेते हैं, तो मनुष्य बदलना शुरू करता है।
इसलिए जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं—
अपने भीतर कृष्ण के जन्म का निमंत्रण है।
“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या”—पर संसार को छोड़ना क्यों नहीं?
वेदांत कहता है—
“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या।”
इसका अर्थ यह नहीं कि संसार अस्तित्वहीन है।
अर्थ यह है कि जो निरंतर बदल रहा है, उसे ही अंतिम और शाश्वत सत्य मान लेना भ्रम है।
आज जो अपना है, कल नहीं होगा।
आज जो सुंदर है, कल बदल जाएगा।
आज जो सत्ता में है, कल इतिहास बन जाएगा।
आज जो शरीर युवा है, कल वृद्ध होगा।
लेकिन मनुष्य इसी परिवर्तनशील संसार में स्थायित्व खोजता रहता है।
यही उसकी पीड़ा है।
कृष्ण उस पीड़ा से मुक्ति का रास्ता दिखाते हैं।
वे कहते हैं—संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर मत बैठने दो।
संसार का उपयोग करो, संसार को अपना स्वामी मत बनने दो।
जब ‘मेरा’ मिटता है, तब कृष्ण दिखाई देते हैं
हमारी सबसे बड़ी समस्या शायद संसार नहीं है।
समस्या है—“मेरा।”
मेरा धन।
मेरा घर।
मेरी जमीन।
मेरा पद।
मेरा सम्मान।
मेरा परिवार।
मेरा ज्ञान।
मेरा शरीर।
यह “मेरा” जितना बढ़ता जाता है, भय उतना बढ़ता जाता है।
क्योंकि जिसे हम अपना मान लेते हैं, उसे खोने का डर पैदा हो जाता है।
और जिस दिन मन कह देता है—
“कुछ भी मेरा नहीं, सब तुम्हारा है कृष्ण।”
उसी दिन भीतर एक अद्भुत हल्कापन जन्म लेता है।
यही समर्पण है।
यही भक्ति है।
यही शायद कृष्ण के निकट जाने का मार्ग है।
और फिर एक दिन…
एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब मनुष्य संसार के बीच बैठकर कहे—
अब मुझे किसी से आगे नहीं निकलना।
अब मुझे किसी को नीचा नहीं दिखाना।
अब मुझे हर चीज अपने नाम नहीं करनी।
अब मुझे संसार से प्रमाणपत्र नहीं चाहिए।
अब मुझे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध नहीं करनी।
अब मुझे केवल तुम्हारा स्मरण चाहिए।
तुम्हारी मुरली की धुन चाहिए।
तुम्हारे चरणों में स्थान चाहिए।
और तब हृदय की गहराइयों से एक आवाज उठे—
“नाथ, अब कुछु चाहूँ न…”
न धन।
न दौलत।
न वैभव।
न प्रसिद्धि।
न अहंकार।
न भोग।
न संसार से कोई शिकायत।
बस तुम।
क्योंकि—
तुम मिल गए तो सब मिल गया।
इस जन्माष्टमी पर कृष्ण को क्या भेंट करें?
कृष्ण को महंगे वस्त्रों की आवश्यकता नहीं।
उन्हें सोने-चांदी की आवश्यकता नहीं।
उन्हें बड़े-बड़े आयोजन की आवश्यकता नहीं।
शायद इस जन्माष्टमी पर उन्हें अपनी एक बुरी आदत दे दीजिए।
अपना थोड़ा-सा अहंकार दे दीजिए।
अपना थोड़ा-सा क्रोध दे दीजिए।
अपनी ईर्ष्या दे दीजिए।
अपनी लालच की गठरी उनके चरणों में रख दीजिए।
और उनसे केवल इतना कह दीजिए—
“कृष्ण, संसार मुझे बहुत कुछ देता रहा, लेकिन अब मुझे संसार से अधिक तुम्हारी आवश्यकता है। मुझे ऐसा बना दो कि तुम्हें पाने के बाद मेरी कोई इच्छा तुम्हारे ऊपर भारी न पड़े।”
शायद यही जन्माष्टमी की सबसे बड़ी पूजा होगी।
कृष्ण आएं तो भीतर आएं
आज मंदिरों में दीप जलेंगे।
लेकिन एक दीप अपने भीतर भी जलाइए।
आज झांकियां सजेंगी।
अपने हृदय को भी सजाइए।
आज कृष्ण का नाम लिया जाएगा।
अपने कर्मों में कृष्ण को उतारिए।
आज आधी रात को कृष्ण का जन्म होगा।
अपने भीतर के अंधकार में भी कृष्ण को जन्म लेने दीजिए।
क्योंकि जब भीतर कृष्ण जन्म लेते हैं, तब जीवन में धीरे-धीरे बहुत कुछ समाप्त होने लगता है—
लोभ समाप्त होता है।
अहंकार समाप्त होता है।
भय कमजोर होता है।
मोह ढीला पड़ता है।
और अंततः इच्छाओं का शोर शांत होने लगता है।
तब मनुष्य संसार में रहते हुए भी संसार से ऊपर उठने लगता है।
और उसके भीतर से एक ही प्रार्थना निकलती है—
“नाथ, अब कुछु चाहूँ न…”
हे कृष्ण!
इतना ही देना कि तुम्हारा नाम लेते समय मन निर्मल हो जाए।
इतना ही देना कि सुख में तुम्हें भूलूं नहीं और दुख में तुमसे रूठूं नहीं।
इतना ही देना कि संसार की भीड़ में भी तुम्हें पहचान सकूं।
और जब जीवन की अंतिम संध्या आए—
तब मेरे पास कुछ भी अपना कहने को न हो,
बस तुम हो…
और तुम्हारे चरणों में पड़ा हुआ यह मन हो।
**क्योंकि कृष्ण मिल जाएं,
तो फिर सचमुच—
कुछ और चाहने को शेष नहीं रहता।





