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भागीरथी अम्मा की कहानी : उम्र ने कहा—अब बहुत देर हो चुकी है… उन्होंने किताब खोलकर कहा—अभी तो शुरुआत है !

105 साल की उम्र में स्कूल की परीक्षा, गणित में पूरे 100 अंक

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कोल्लम (केरल)। जिंदगी में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़कर सिर्फ खुशी नहीं होती—वे भीतर तक झकझोर देती हैं। वे पूछती हैं कि जब 105 साल की उम्र में कोई महिला फिर से किताब खोल सकती है, परीक्षा दे सकती है और गणित में पूरे अंक ला सकती है, तो हम अपने सपनों के लिए “अब देर हो गई” का बहाना आखिर कब तक बनाएंगे?

केरल के कोल्लम जिले की भागीरथी अम्मा ऐसी ही एक असाधारण कहानी का नाम हैं।

बचपन में मां का निधन हुआ तो नौ वर्ष की उम्र में उनकी पढ़ाई छूट गई। छोटी उम्र में ही छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। जिंदगी आगे बढ़ी, विवाह हुआ, फिर कम उम्र में पति का निधन हो गया और छह बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर आ गई। शिक्षा का सपना कहीं पीछे छूट गया।

लेकिन सपना मरा नहीं।

दशकों बाद, जब उम्र 105 वर्ष हो चुकी थी, भागीरथी अम्मा ने वह किताब फिर खोल दी, जिसे जिंदगी ने उनसे बहुत पहले बंद करवा दिया था।

और फिर उन्होंने इतिहास रच दिया।


नौ साल की उम्र में छूटी पढ़ाई, 105 में फिर पकड़ी किताब

भागीरथी अम्मा का जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने लगभग नौ वर्ष की उम्र में तीसरी कक्षा के बाद औपचारिक पढ़ाई छोड़ दी थी।

कारण पढ़ाई में कमजोरी नहीं था।

कारण था—जिम्मेदारी।

उनकी मां के निधन के बाद उन्हें अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करनी पड़ी। जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाते हैं, उस उम्र में भागीरथी अम्मा परिवार संभालने लगीं। उनका अपना बचपन जिम्मेदारियों में बीत गया।

शायद तब उन्हें भी नहीं मालूम था कि एक दिन वही अधूरी पढ़ाई उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान बनेगी।


कम उम्र में विवाह, फिर पति का निधन—छह बच्चों की जिम्मेदारी

बाद के वर्षों में उनका विवाह हुआ। उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार उनके पति का निधन उनके जीवन के अपेक्षाकृत शुरुआती वर्षों में ही हो गया और उन्हें अकेले अपने छह बच्चों का पालन-पोषण करना पड़ा।

यहां भागीरथी अम्मा की कहानी केवल शिक्षा की कहानी नहीं रह जाती।

यह एक ऐसी महिला की कहानी बन जाती है जिसने जीवन के कई मोर्चों पर अकेले संघर्ष किया।

अपने बच्चों को बड़ा करना, परिवार को संभालना और जीवन की कठिनाइयों से जूझना—इन सबके बीच उनकी अपनी पढ़ाई पीछे छूट गई।

लेकिन पढ़ने की इच्छा उनके भीतर बनी रही।


पता—जहां से निकली देश को बदल देने वाली कहानी

भागीरथी अम्मा का संबंध प्राक्कुलम, त्रिक्करुवा ग्राम पंचायत, कोल्लम जिला, केरल से था। प्राक्कुलम कोल्लम क्षेत्र का एक गांव है।

केरल राज्य साक्षरता मिशन के अनुसार उनके परिवार में छह बच्चे और 16 पोते-पोतियां थे और वे पांचवीं पीढ़ी के वंशजों के साथ जीवन बिता रही थीं।


105 की उम्र में फिर बनीं विद्यार्थी

साल 2019।

उम्र—105 वर्ष।

भागीरथी अम्मा ने केरल राज्य साक्षरता मिशन के तहत चौथी कक्षा के समकक्ष (Level 4 equivalency) परीक्षा देने का फैसला किया।

यह सामान्य परीक्षा नहीं थी।

यह उस महिला की परीक्षा थी जिसने लगभग एक सदी पहले स्कूल छोड़ दिया था।

और उम्र?

105 साल।

उन्होंने परीक्षा दी और परिणाम ने पूरे देश को चौंका दिया।

उन्होंने 275 में 205 अंक हासिल किए—यानी लगभग 74.5 प्रतिशत। सबसे खास बात यह रही कि गणित में उन्हें पूरे 75 में 75 अंक मिले।

आज कई विद्यार्थी गणित का नाम सुनकर घबरा जाते हैं।

भागीरथी अम्मा ने 105 वर्ष की उम्र में गणित में पूरे अंक हासिल कर दिए।


उम्र ने शरीर को थकाया, हौसले को नहीं

उम्र अधिक होने के कारण उनके लिए लिखना आसान नहीं था। परीक्षा पूरी करने में उन्हें सामान्य परीक्षार्थियों की तुलना में अधिक समय लगा।

रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने परीक्षा के प्रश्नपत्रों को तीन दिनों में पूरा किया। उनकी उम्र और शारीरिक कठिनाइयों को देखते हुए परीक्षा घर पर आयोजित करने की व्यवस्था की गई थी।

लेकिन एक बात बिल्कुल साफ थी—

उनके हाथ थक सकते थे, आंखें थक सकती थीं, शरीर थक सकता था; पढ़ने की इच्छा नहीं थकी थी।

यही इच्छा उन्हें इतिहास में ले गई।


205 अंक और गणित में 100 प्रतिशत

भागीरथी अम्मा ने कुल 205/275 अंक हासिल किए।

उनका प्रदर्शन इस प्रकार बताया गया है:

  • कुल अंक: 275
  • प्राप्त अंक: 205
  • कुल प्रतिशत: लगभग 74.5%
  • गणित: 75/75
  • मलयालम: 50/75
  • ‘नम्मलुम नमुक्कु चुट्टुम’ यानी हमारे आसपास की दुनिया: 50/75
  • अंग्रेजी: 30/50

यानी जिस उम्र में अधिकांश लोग औपचारिक शिक्षा से दशकों पहले दूर हो चुके होते हैं, उस उम्र में भागीरथी अम्मा ने परीक्षा पास करने के साथ गणित में शत-प्रतिशत अंक हासिल किए।


उनका अगला सपना था—कक्षा 10 तक पढ़ना

सबसे ज्यादा प्रेरित करने वाली बात शायद उनका परीक्षा परिणाम भी नहीं था।

परीक्षा पास करने के बाद जब उनसे आगे की पढ़ाई के बारे में पूछा गया तो उनका सपना था कि वे Level 10 equivalency परीक्षा तक पढ़ाई जारी रखें।

यानी 105 साल की उम्र में भी उनका लक्ष्य “मैंने कर लिया” पर खत्म नहीं हुआ था।

उनके सामने अगला लक्ष्य था।

अगला अध्याय।

यही वह सोच है जो भागीरथी अम्मा को असाधारण बनाती है।



प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया सलाम

भागीरथी अम्मा की कहानी को राष्ट्रीय पहचान मिली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2020 में अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उनकी उपलब्धि का उल्लेख किया और उनकी सीखने की इच्छा को प्रेरणादायक बताया।

प्रधानमंत्री ने उनके उदाहरण के माध्यम से यह संदेश रखा कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए व्यक्ति के भीतर का विद्यार्थी कभी मरना नहीं चाहिए।

सोचिए—

जिस महिला की पढ़ाई नौ साल की उम्र में छूट गई थी, उसकी कहानी देश के प्रधानमंत्री के रेडियो कार्यक्रम तक पहुंची।

यह केवल परीक्षा में सफलता नहीं थी।

यह उस अधूरे सपने की राष्ट्रीय पहचान थी, जिसे जिंदगी ने लगभग एक सदी पहले दबा दिया था।


मिला देश का प्रतिष्ठित नारी शक्ति पुरस्कार

भागीरथी अम्मा को उनकी असाधारण उपलब्धि के लिए नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

केरल राज्य साक्षरता मिशन के अनुसार उन्हें 2019 के लिए नारी शक्ति पुरस्कार मिला और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा सम्मानित किए जाने वाले पुरस्कार समारोह से उनका नाम जुड़ा। स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वह समारोह में स्वयं उपस्थित नहीं हो सकीं।

इस सम्मान ने यह संदेश दिया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और शिक्षा का अधिकार जीवन के किसी एक पड़ाव तक सीमित नहीं है।


उनकी जिंदगी में सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, कविता और संगीत भी था

भागीरथी अम्मा केवल पढ़ाई में रुचि रखने वाली महिला नहीं थीं।

रिपोर्टों में उन्हें कविता और संगीत पसंद करने वाली बताया गया है। एक मुलाकात के दौरान उन्होंने प्रसिद्ध मलयालम कवि चंगम्पुझा की कविता की पंक्तियां भी सुनाईं।

यह तस्वीर उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू दिखाती है।

एक तरफ 105 वर्ष की उम्र में गणित के सवाल हल करने वाली विद्यार्थी—

और दूसरी तरफ कविता और संगीत में रुचि रखने वाली संवेदनशील महिला।


फिर आया वह दिन, जब कहानी थम गई—लेकिन संदेश नहीं

भागीरथी अम्मा का निधन 22 जुलाई 2021 को 107 वर्ष की उम्र में हुआ। परिवार से मिली जानकारी के अनुसार उनकी मृत्यु उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनके घर पर हुई।

उनका शरीर चला गया।

लेकिन उनकी कहानी नहीं गई।

क्योंकि कुछ लोग अपनी जिंदगी जीते हैं और कुछ लोग अपनी जिंदगी के बाद भी दूसरों को जीने की वजह दे जाते हैं।

भागीरथी अम्मा उन्हीं लोगों में से थीं।


भागीरथी अम्मा की जिंदगी का सबसे बड़ा सबक क्या है?

उनकी कहानी को केवल “105 साल की महिला ने परीक्षा पास की” कह देना उनके साथ अन्याय होगा।

उनकी असली कहानी इससे कहीं बड़ी है।

उन्होंने हमें कम से कम पांच बातें सिखाईं—

1. सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती

अगर कोई सपना 10 साल की उम्र में पूरा नहीं हुआ तो इसका मतलब यह नहीं कि वह 50, 70 या 100 साल की उम्र में भी पूरा नहीं हो सकता।

2. परिस्थितियां रास्ता रोक सकती हैं, मंजिल नहीं

भागीरथी अम्मा की पढ़ाई इसलिए नहीं छूटी कि वह पढ़ना नहीं चाहती थीं। परिवार की परिस्थितियों ने उन्हें स्कूल से दूर किया।

3. उम्र शरीर की होती है, जिज्ञासा की नहीं

105 वर्ष की उम्र में उन्होंने फिर विद्यार्थी बनने का निर्णय लिया।

4. लक्ष्य पूरा होने के बाद अगला लक्ष्य जरूरी है

चौथी कक्षा की परीक्षा पास करने के बाद भी उनकी नजर Level 10 पर थी।

5. सबसे बड़ी जीत दूसरों से नहीं, अपने पुराने डर से होती है

उनकी असली जीत परीक्षा में 205 अंक नहीं थी।

उनकी असली जीत थी—उस सपने को फिर से उठाना, जिसे उन्होंने लगभग एक सदी पहले मजबूरी में छोड़ दिया था।


आज अगर भागीरथी अम्मा हमारे सामने होतीं…

शायद वह हमसे कोई बड़ी-बड़ी बात नहीं कहतीं।

शायद वह बस एक किताब खोलतीं।

पन्ना पलटतीं।

और कहतीं—

“अगर मैं 105 साल की उम्र में फिर से पढ़ सकती हूं, तो तुम क्यों नहीं?”

यही सवाल आज हर उस व्यक्ति के सामने खड़ा है जो कहता है—

“अब बहुत देर हो गई है।”

नौकरी के लिए।

पढ़ाई के लिए।

नया काम शुरू करने के लिए।

अपना हुनर सीखने के लिए।

किसी सपने को पूरा करने के लिए।

या फिर जिंदगी को नए सिरे से जीने के लिए।

भागीरथी अम्मा की जिंदगी उस बहाने का जवाब है।


आखिरी पंक्ति जो इतिहास में दर्ज होनी चाहिए

उम्र ने उनसे कहा—अब बहुत देर हो चुकी है।
उन्होंने किताब खोलकर जवाब दिया—अभी तो शुरुआत है।

भागीरथी अम्मा चली गईं, लेकिन अपने पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गईं, जिसका जवाब हर पीढ़ी को देना होगा—

“अगर सपना अभी भी जिंदा है, तो फिर शुरुआत करने में देर किस बात की?”

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Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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