वाह! घर न पहुंचे तो क्या गांव के स्कूल को तो महका दिया प्रवासियों ने

हल्द्वानी। उत्तराखंड के पंचायतों के क्वारेंटाइन सेंटरों में अव्यवस्थाओं की खबरों के बीच एक ऐसी खबर से आपको रूबरू कराते हैं जो इस तनाव भरे…

हल्द्वानी। उत्तराखंड के पंचायतों के क्वारेंटाइन सेंटरों में अव्यवस्थाओं की खबरों के बीच एक ऐसी खबर से आपको रूबरू कराते हैं जो इस तनाव भरे वातावरण में शीतल हवा के झोंके के समान है। जिसे पढ़कर आपको भी लगेगा कि कोरोनाकाल में प्रवासियों को अपना बोझ समझना हमारी सबसे बड़ी बेवकूफी है। जरूरत है बुरे वक्त में भी सकारात्मक विचारों की। यह कहानी है अल्मोड़ा जनपद के अंतरगत आने वाले प्राइमरी विद्यालय बजेला की। यहां फिलहाल दो प्रवासियों को क्वारेंटाइन किया गया है। पूरे 14 दिनों तक के लिए।

घर पहुंच कर भी घर की देहरी न लांघ पाए ये दोनों प्रवासी पूरन और चंदन धौलादेवी विकास खंड के बजेला प्राइमरी स्कूल में क्वारेंटाइन किए गए। 14 दिन बहुत होते हैं नकारात्मक सोच वाले के लिए व्यव्स्थाओं और जिम्मेदार लोगों को कोसने और सोशल मीडिया पर उन्हें गरियाने के लिए, लेकिन इन दोनों प्रवासियों ने अपनी रचनात्मकता को निखारने का निर्णय लिया। यहां हम बता दें कि बजेला प्राइमरी स्कूल के बच्चे हमेशा से ही चर्चा में रहते है। उन्होंने स्कूल को खूबसूरत ढंग से सजाया तो है ही वहां फूलों के पौधे रोप कर प्रकृति प्रेमी होने का सबूत भी दिया है।

कोरोना काल में स्कूल बंद होने के कारण बच्चों द्वारा रोपे गए पौधे सूखने लगे थे। स्कूल में साफ सफाई की व्यवस्था भी नहीं हो पा रही थी। ऐसे में क्वारेंटाइन सेंटर होने के कारण स्कूल खोला गया और चंदन और पूरन ने जब स्कूल के हाल देखे तो उन्होंने अपना खाली समय स्कूल के लिए कुछ करने में लगाने का निर्णय लिया। दोनों प्रवासियों ने स्कूल की साफ सफाई की। सूख रहे पौधों को पानी देना शुरू किया और आज स्कूल खूबसूरत फूलों से महकने लगा है। लगता ही नहीं कि स्कूल बच्चों के न आने से इतने दिनों से बंद था।

स्कूल के सहायक अध्यापक और इस पूरी परियोजना के कर्णधार सहायक अध्यापक भास्कर जोशी ने स्कूल का दौरा किया उनकी मेहनत के फूल ​खिलते देख उन्हें भी अचंभा हुआ। पूछने पर पूरन और चंदन ने उन्हें बताया कि दोनों ने मिल कर पौधों को पानी दिया और पौधों के बीच उग आई खरपतार को साफ कर दिया बस क्या था मर रहे पौधों को पुनर्जीवन मिल गया। दोनों प्रवासियों का यह शानदार प्रयास यर्थाथ रूप में घर वापसी से पहले ही फूल बन कर महकने लगा। दरअसल उत्तराखंड को ऐसे ही प्रवासियों की घर वापसी की जरूरत है। जो प्रदेश को अपने होने का सबूत दे सकें।

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