फालता से TMC उम्मीदवार जहांगीर खान ने वापस लिया नाम
भाजपा सीएम शुभेंदु अधिकारी की तारीफ कर छोड़ा मैदान
EVM विवाद के बाद 21 मई को होनी है री-पोलिंग
स्पेशल रिपोर्ट: अभिषेक के 'गढ़' में ढेर हुए उनके ही सिपहसालार; जहांगीर के मैदान छोड़ने के मायने
क्रोनोलॉजी: EVM विवाद के बाद 21 मई को होनी है री-पोलिंग, लेकिन उससे पहले ही TMC के ‘सिपहसालार’ ने मैदान छोड़ दिया है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के विजन की तारीफ की है।


कोलकाता/फालता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दावों, वादों और पलटवार का दौर तो आम है, लेकिन डायमंड हार्बर लोकसभा के तहत आने वाली फालता विधानसभा सीट पर जो हुआ, उसने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान कर दिया है। जिस सीट पर तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने हुंकार भरते हुए कहा था कि “भाजपा दस जन्मों में भी फालता सीट नहीं जीत पाएगी”, आज उसी सीट पर उनके सबसे भरोसेमंद और प्रभावशाली नेता जहांगीर खान वोटिंग से ठीक दो दिन पहले रणछोड़ साबित हुए हैं।
मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जहांगीर खान ने जो यू-टर्न लिया, उसने न सिर्फ फालता बल्कि पूरी TMC के शीर्ष नेतृत्व को बैकफुट पर धकेल दिया है।
EVM विवाद से शुरू हुआ ‘खेला’
दरअसल, फालता सीट पर दूसरे फेज यानी 29 अप्रैल को मतदान हुआ था। लेकिन वोटिंग के दौरान कई बूथों पर EVM में भाजपा के चुनाव चिह्न (कमल) के बटन पर सेलोटेप चिपकाए जाने की गंभीर शिकायतें आईं। मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग ने कड़ा रुख अपनाया और फालता में 21 मई को दोबारा वोटिंग (री-पोलिंग) कराने का आदेश दिया, जिसके नतीजे 24 मई को आने हैं। लेकिन इस री-पोलिंग से पहले ही फालता की स्क्रिप्ट पूरी तरह बदल गई।
शुभेंदु की तारीफ और जहांगीर का सरेंडर
चुनाव से हटने की घोषणा करते हुए जहांगीर खान के सुर पूरी तरह बदले हुए नजर आए। उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तारीफ के कसीदे पढ़ते हुए कहा:
“मैं फालता का बेटा हूं और चाहता हूं कि यहां शांति बनी रहे और यह तरक्की करे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी फालता के लिए स्पेशल पैकेज दे रहे हैं, इसीलिए मैं चुनाव से खुद को अलग कर रहा हूं।”
जहांगीर का यह बयान तृणमूल कांग्रेस के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है, क्योंकि शुभेंदु अधिकारी और अभिषेक बनर्जी के बीच की राजनीतिक अदावत किसी से छिपी नहीं है।
CM शुभेंदु का तंज- “पार्टी को पोलिंग एजेंट तक नहीं मिल रहे”
जहांगीर खान के इस आत्मसमर्पण पर चुटकी लेने में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी देर नहीं की। उन्होंने तंज कसते हुए कहा:
“उनके (जहांगीर) पास कोई दूसरा विकल्प बचा ही नहीं था। ज़मीनी हकीकत यह है कि उन्हें बूथ पर बैठने के लिए पोलिंग एजेंट तक नसीब नहीं हो रहे थे। हार के डर से उन्होंने चुनाव मैदान से भागने का फैसला किया है।”
फालता सीट का सियासी गणित और साख की लड़ाई
यह सीट सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि साख की वो लड़ाई थी जिसे खुद अभिषेक बनर्जी लीड कर रहे थे। नीचे दिए गए बिंदुओं से समझिए कि यह सीट इतनी अहम क्यों है:
- अभिषेक बनर्जी का गढ़: फालता सीट डायमंड हार्बर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है। यहां किसी भी तरह की कमजोरी सीधे अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाती है।
- बाहुबल बनाम सत्ता: जहांगीर खान को इस इलाके का ‘बाहुबली’ और ‘अजेय’ नेता माना जाता था। उनका इस तरह से पीछे हटना यह दिखाता है कि इलाके में भाजपा और सत्ताधारी खेमे का दबाव किस कदर बढ़ा है।
- 10 जन्मों का चैलेंज फेल: अभिषेक बनर्जी के ’10 जन्मों वाले चैलेंज’ को भाजपा ने वोटिंग से पहले ही ध्वस्त कर दिया है।
बैकफुट पर TMC: ‘निजी फैसला’ बताकर झाड़ा पल्ला
इस बड़े झटके के बाद तृणमूल कांग्रेस ने डैमेज कंट्रोल की कोशिशें शुरू कर दी हैं। पार्टी ने जहांगीर खान के इस फैसले से खुद को अलग कर लिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर जारी एक बयान में TMC ने कहा:
“जहांगीर खान का चुनाव से हटने का फैसला पूरी तरह से उनका निजी निर्णय है, पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है। 4 मई को चुनाव नतीजे आने के बाद से फालता में हमारे 100 से अधिक कार्यकर्ताओं को दुर्भावनापूर्ण तरीके से गिरफ्तार किया गया है। भारी दबाव और डराने की राजनीति के बावजूद हमारे कार्यकर्ता डटे हुए हैं, लेकिन कुछ लोग इस दबाव को झेल नहीं पाए और मैदान छोड़ गए। हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं।”
निष्कर्ष: बिना लड़े ही बाजी मार ले गई भाजपा?
21 मई को होने वाली दोबारा वोटिंग अब महज एक औपचारिकता बनकर रह गई है। मुख्य विपक्षी उम्मीदवार के मैदान छोड़ने के बाद भाजपा के लिए फालता का रास्ता पूरी तरह साफ दिख रहा है। अभिषेक बनर्जी के सबसे मजबूत किले में जहांगीर खान का यह सरेंडर बंगाल चुनाव के इतिहास में एक ऐसा टर्निंग पॉइंट बन गया है, जिसकी गूंज आने वाले कई सालों तक सुनाई देगी।


