HomeHealthसुशांत राजपूत आत्महत्या प्रकरण आवेश का नतीजा : डा. नेहा

सुशांत राजपूत आत्महत्या प्रकरण आवेश का नतीजा : डा. नेहा

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हल्द्वानी। मनोचिकित्सक डा. नेहा शर्मा ने कहा है कि फिल्म स्टार सुशांत सिंह राजपूत की आत्म हत्या को डिप्रेशन से जोड़ कर देखना बीमारी को ठीक से न समझने की तरह है। उनका कहना है कि इस बीमारी में इंसान निगेटिव थाटस के साथ जीता है लेकिन आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए आवेश की आवश्यकता होती है। उनका कहना है कि अवसाद को राजपूत की आत्महत्या की वजह नहीं कहा जाना चाहिए। डा. नेहा के अनुसार दरअसल कल्पनाओं की दुनिया में जीने वाले लोग कल्पना साकार न होने पर इस तरह के कदम उठा लेते हैं।

इसलिए वास्तविकता के धरातल पर जमे लोग असफलताओं के बावजूद आत्मघाती व्यवहार नहीं करते। उनका कहना है कि कुछ लोग वर्ष 2020 को भी खराब मान रहे हैं। जबकि यदि इसके सकारात्मक पहलुओं को देखा जाए तो भविष्य की दुनिया के लिए 2020 नए और चमकदार युग का सूत्रपात करने वाला वर्ष गिना जाएगा। इसी प्रकार कोरोना काल में भी लोग ​काम काज न चलने और लगातार लंबी होते जा रहे लॉक डाउन की वजह से अवसाद में जा रहे हैं। खाली बैठे उनके दिमाग में नकारात्मक विचार आते हैं, और वे स्वयं को भी पीड़ित मानने लगते हैं।

जबकि सकारात्मक नजरिए से देखा जाए तो कोरोना काल में पौष्टिक और घर का भोजन करने के बाद लोगों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है। इसका अर्थ है कि आने वाले समय में लोगों का स्वास्थ्य अच्छा होगा। इसी प्रकार कोरोना से निपटने के बाद जिंदगी जीने ढंग व जिंदगी और बेहतर होगी। उनका कहना है कि जिंनगदी में घटित होने वाले घटनाक्रम को सकारात्मकता के साथ देखना होगा। लोग इस घटना के बाद अपनी बीमारी को लेकर ज्यादा चिंतित हो रहे हैं।

उन्होंने डिप्रेशन के रोगियों को सलाह दी है कि वे इस तरह के घटनाक्रमों पर सकारात्मक सोच के साथ विचार करना चाहिए। नकारात्मकता दिमाग और सेहत दोनों के लिए कष्टकारी है। उनका कहना है कि 80 प्रतिशत आत्महत्या की घटनाएं पूर्व संकेत के बाद होती है। जिसका विचार लगभग 6 माह पूर्व आने लगता है। लेकिन इस पर नियंत्रण पाने की कोशिश में असफलता हाथ लगने पर आदमी आने आप को कमजोर महसूस करने लगता है और वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है। आत्महत्या के दौरान उसके चेहरे पर अजीब सी आभा देखने का मिलती है।

यह एक सोची समझी कोशिश होती है और एकदम से लिया गया निर्णय। जिसका खामियाजा परिवार के सदस्यों को भुगतना पड़ता है। डा. नेहा बताती हैं कि गुमसुम रहना या अकेले रहना आत्मविश्वास की कमी, नकारात्मक विचारों का आना, भावनात्मक रूप से कमजोर, चिड़चिड़ापन जैसे लक्षण आत्महत्या का कारण बनते हैं। ऐसे व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। इस तरह के लक्षण होने पर कुशल मनोरोग विशेषज्ञों द्वारा कांउसिलिंग करवा कर रोगी का उपचार कराना चाहिए। वे कहती हैं कि आत्महत्या अवचेतन मन की एक प्रक्रिया है। जिस साइकोथैरेपी से उपचारित किया जा सकता है।

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