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हल्द्वानी : परंम्पराओं को दरकिनार कर ब्वारियों ने कंधा देकर किया सास को विदा

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गौलापार। हमारे समाज में आमतौर में कुरितियों व रूढ़ियों से सबसे ज्यादा प्रभावित महिलाएं ही होती हैं। कुरितियों के कारण अक्सर महिलाओं को प्रताड़ना का शिकार भी होना पड़ता है। महिलाएं इसे गलत समझते हुए बहुत कम उसके खिलाफ आवाज उठाती हैं, जिसके कारण वे शताब्दियों से कुरितियों का शिकार हैं। आज भी जब पूरा समाज वैचारिक तौर पर बहुत प्रगतिशील होने का दम्भ भरता है तब भी वह परम्पराओं के नाम पर महिलाओं को कई मामलों में आज भी पीछे धकेलने का काम करता है। ऐसी ही एक कुरितियों में परिवार में किसी की मौत होने पर महिलाओं का शमशान घाट न जाना भी है। यहां तक कि उन्हें अपने प्रियजन की अर्थी को कंधा देने से भी वंचित किया जाता हैं। पर जब महिलाएं हिम्मत दिखाकर ऐसी कुरितियों के खिलाफ अपने कदम बढ़ाती हैं तो हर कोई उस कदम को आगे बढ़ता हुआ देखता रहता है और चाहकर भी उसका विरोध नहीं कर पाता।

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कुछ ऐसा ही रविवार 3 जनवरी को गौलापार (हल्द्वानी) के तारानवाड़ गांव में देखने को मिला। यहां गांव की 84 साल की बुजुर्ग महिला बसन्ती रौतेला (पत्नी स्व. प्रेमसिंह रौतेला) का निधन हो गया। रानीबाग चित्रशिला घाट पर उनके पार्थिव शरीर को पोते नवीन रौतेला, योगेश रौतेला व भतीजे जगमोहन रौतेला ने अग्नि को समर्पित किया।

उससे पहले जब घर से उनकी अंतिम यात्रा निकली तो सारी रूढ़ीवादी परम्परा को तोड़ते हुए उनकी ब्वारियों रीता रौतेला व विमला रौतेला ने उन्हें गांव की सरहद तक लगभग एक किलोमीटर दूर तक कंधा देकर अंतिम विदाई दी। इतनी दूर तक ब्वारियों (महिलाओं) द्वारा पार्थिव शरीर को कंधा दिए जाने से महिलाओं ने रूढ़ीगत परम्परा को तोड़ा। इनमें से रीता रौतेला स्वर्गीय बसन्ती रौतेला के भतीजे जगमोहन रौतेला की पत्नी हैं तो विमला रौतेला उनके पोते योगेश रौतेला की पत्नी। दो पीढ़ियों की बहुओं ने जब अपनी सास व अम्मा सास के पार्थिव शरीर को कंधा दिया तो वह दृश्य महिलाओं के भावनात्मक तौर पर मजबूत होने का भी संदेश दे रहा था। दो बहुओं के इस पहल की गांव में चर्चा हो रही है।

आमतौर पर महिलाओं को इस सब से दूर ही रखा जाता है। इसका कारण शायद उनका ऐसे अवसरों पर भावनात्मक तौर पर बहुत भावुक होना है। पर अब बदलते समय के साथ महिलाएं भावनात्मक तौर पर खुद को मजबूत करने लगी हैं। यही कारण है अब बेटिया अंतिम संस्कार में पूरी भागीदारी करने लगी हैं। वे शमशान घाट जाने के साथ ही मुखाग्नि भी देने लगी हैं। उनकी इस पहल को समाज चुपचाप स्वीकार भी कर रहा है। इससे महिलाओं के अन्दर भावनात्मक मजबूती आने लगी है। जो कई मायनों में एक बेहतर पहल है।

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