‘अहं’ से ‘अच्युत’ की ओर: पूर्ण शरणागति का परम मार्ग
जानिए, श्रीरामचरितमानस और भज गोविन्दम् का परम संदेश
मानव जीवन अनंत संभावनाओं का उत्सव है, लेकिन आज की भागदौड़ और चकाचौंध में हम अक्सर जीवन के मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं। श्रीरामचरितमानस के बालकांड का एक अत्यंत पावन प्रसंग हमें जीवन जीने की कला और अध्यात्म की सर्वोच्च पराकाष्ठा से परिचित कराता है।

जब महर्षि विश्वामित्र, राजा दशरथ के महल से भगवान राम और लक्ष्मण को उनके यज्ञ की रक्षा के लिए ले जाने के बाद पुनः विदा मांगते हैं, तब प्रेम, कृतज्ञता और भक्ति में लीन होकर राजा दशरथ कहते हैं:
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥ जय राम—श्री राम जय—जय सियाराम।।
अर्थ: “हे नाथ! यह सारी संपदा (राज्य, वैभव) आपकी ही है। मैं स्वयं, मेरी पत्नी और मेरे पुत्र— हम सब आपके सेवक हैं।”
यह केवल एक राजा के वचन नहीं हैं, बल्कि यह जीव की शिव के प्रति ‘पूर्ण शरणागति’ (Total Surrender) का उद्घोष है। आइए, इस पावन चौपाई के प्रकाश में मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्य को समझें।
1. आत्मा की भूख और जीवन का मूल उद्देश्य
जैसे इस भौतिक शरीर की अपनी भूख है— इसे भोजन चाहिए, समाज में प्रेम चाहिए, और रहने के लिए सुख-संपदा चाहिए; ठीक उसी प्रकार हमारी आत्मा की भी एक गहरी भूख-प्यास है। शरीर नश्वर है, इसलिए इसकी भूख अस्थाई है। परंतु आत्मा अजर-अमर है, इसलिए इसकी प्यास केवल ‘परमात्मा’ में विलीन होकर ही शांत हो सकती है।
विचार कीजिए, क्या हम इस धरा पर केवल धन-वैभव जोड़ने, विवाह करने, नौकरी करने, संतानोत्पत्ति करने और एक दिन चुपचाप मर जाने के लिए आए हैं? यदि ऐसा है, तो पशु जीवन और मानव जीवन में क्या अंतर रह गया?
हमारे समस्त वेद, उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता गवाही देते हैं कि मनुष्यादि का यह दुर्लभ जीवन केवल और केवल ‘मोक्ष’ (मुक्ति) की प्राप्ति के लिए हुआ है। आत्मा का अंतिम लक्ष्य जन्म-मरण के इस अंतहीन चक्र से मुक्त होना है।
2. ‘पुनरपि जननं…’ : संसार चक्र की कड़वी सच्चाई
महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य जी ने अपने सुप्रसिद्ध स्तोत्र ‘भज गोविन्दम्’ के २१वें श्लोक में संसार की इस विवशता का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है:
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्। इह संसारे बहुदुस्तारे कृपया पारे पाहि मुरारे॥
भावार्थ: बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना और बार-बार माता के गर्भ में शयन करना— यह चक्र अत्यंत कष्टदायी और कठिन है। आदि शंकराचार्य जी समझाते हैं कि यह माया रूपी भवसागर बहुत दुस्तर है। इससे पार पाने का एकमात्र उपाय है— ‘गोविंद की भक्ति’। जब तक हम ईश्वर के नाम का आश्रय नहीं लेंगे, तब तक वासनाओं के धागे हमें बार-बार इस मृत्युलोक में खींच लाते रहेंगे।
3. कर्म का त्याग नहीं, ‘अहंकार’ का त्याग
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: यदि संसार नश्वर है, तो क्या हम सब अकर्मण्य या निष्क्रिय हो जाएं? क्या अपने कर्तव्यों को छोड़ दें?
नहीं, कदापि नहीं! भगवान श्रीकृष्ण गीता में कर्मयोग का संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि तुम्हें संसार में रहते हुए निरंतर कर्म करना है, लेकिन उन कर्मों के फल की आसक्ति को छोड़ देना है।
“कर्म करो, पर उसे परमात्मा को समर्पित कर दो।”
जब आप सुबह उठकर यह भाव रखते हैं कि “हे प्रभु! यह शरीर आपका है, यह परिवार आपका है, यह व्यवसाय आपका है, मैं तो केवल आपका एक निमित्त (सेवकु) हूँ।”— तो आपका हर कर्म ‘पूजा’ बन जाता है। यदि जीवन के अंतिम क्षण में हमारी एक भी भौतिक कामना शेष रह गई, तो वही कामना अगले जन्म का कारण बनेगी। इसलिए, सब कुछ प्रभु को सौंपकर जिएं।
4. यह शरीर भी एक ‘लिबास’ है
ज़रा सोचिए, जिस शरीर को संवारने में हम अपना पूरा जीवन लगा देते हैं, क्या वह हमारा है? नहीं! यह तो मात्र पंचतत्वों से बना एक वस्त्र (लिबास) है, जिसे आत्मा एक निश्चित समय के बाद बदल देती है। जब यह शरीर ही हमारा नहीं है, तो इस शरीर से जुड़ी कोई भी नाशवान चीज़— चाहे वह धन हो, पद हो या मकान— हमारी कैसे हो सकती है?
नाशवान वस्तुओं पर अपना मालिकाना हक जताना ही दुखों का मूल कारण है।
🌟 ‘सर्वस्व समर्पण’ ही परम शांति है !
राजा दशरथ का यह कथन “मैं सेवकु समेत सुत नारी” हमें सिखाता है कि गृहस्थ जीवन और मानवीय जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाते हुए भी, मानसिक रूप से अपना सर्वस्व परमात्मा के चरणों में सौंप देना ही सच्ची शरणागति है।
जब हम ‘मेरा-मुझको’ का भाव छोड़कर ‘तेरा-तुझको अर्पण’ का मार्ग चुन लेते हैं, तब जीवन से चिंता, भय और तनाव सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। आइए, आज से हम भी अपने जीवन की बागडोर उस परमपिता परमेश्वर के हाथों में सौंप दें और हर परिस्थिति में आनंदित रहकर गाएं:
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥ जय राम—श्री राम जय—जय सियाराम।।


