कमस्यार घाटी के गौरव
सीएनई रिपोर्टर, बागेश्वर। देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले और तीन ऐतिहासिक युद्धों के जीवंत गवाह रहे सूबेदार मेजर कृपाल सिंह रावत अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर से पूरी कमस्यार घाटी और बागेश्वर जनपद में शोक की लहर दौड़ गई है। वे न केवल एक अनुशासित सैनिक थे, बल्कि क्षेत्र की समस्याओं के लिए लड़ने वाले एक प्रखर आंदोलनकारी भी थे।


सूबेदार मेजर कृपाल सिंह रावत का जन्म चकना गांव (कोश्यारी गांव) के एक देशभक्त परिवार में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय आन सिंह रावत और माता पार्वती देवी ने उन्हें बचपन से ही राष्ट्र सेवा के संस्कार दिए। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा देवतोली से प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए बेरीनाग का रुख किया।
भारतीय सेना में पदार्पण और पहली तैनाती
वर्ष 1954 में कृपाल सिंह रावत का चयन भारतीय सेना में हुआ। कुमाऊं रेजीमेंट के केंद्र रानीखेत में कठिन प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, उन्हें पहली तैनाती के रूप में सामरिक दृष्टि से संवेदनशील बारामूला (कश्मीर) भेजा गया। यहीं से उनके गौरवशाली सैन्य सफर की शुरुआत हुई।
तीन ऐतिहासिक युद्धों में अदम्य साहस
रावत उन विरले सैनिकों में से थे जिन्होंने भारत के आधुनिक इतिहास के तीन सबसे महत्वपूर्ण युद्धों में अग्रिम मोर्चे पर रहकर देश की रक्षा की।
- 1962 का भारत-चीन युद्ध: उन्होंने ओलांग सेक्टर में विषम परिस्थितियों में दुश्मन का सामना किया।
- 1965 का भारत-पाक युद्ध: पंजाब के तरण तारण मोर्चे पर उन्होंने वीरता का परिचय दिया।
- 1971 का भारत-पाक युद्ध: सामा स्यालकोट सेक्टर में तैनात रहकर उन्होंने देश की जीत में अहम भूमिका निभाई। इन तीनों युद्धों के दौरान उन पर संचार व्यवस्था (वायरलेस) की अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी, जिसे उन्होंने पूरी कुशलता के साथ निभाया।
प्रधानमंत्री शास्त्री के साथ ‘हाई टी’ और सैन्य सम्मान
1965 के युद्ध में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया था। शास्त्री जी द्वारा वीर सैनिकों के लिए आयोजित ‘हाई टी’ कार्यक्रम में रावत भी शामिल थे, जो उनके जीवन की सबसे यादगार उपलब्धियों में से एक रही। पिछले वर्ष भी इंदौर में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में भारतीय सेना ने उन्हें उन जांबाज सैनिकों की सूची में सम्मानित किया था, जिन्होंने 1962, 1965 और 1971 के तीनों युद्ध लड़े थे।
क्षेत्रीय योगदान और ‘कमस्यार घाटी गौरव सम्मान’
सेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी रावत शांत नहीं बैठे। वे सामाजिक कार्यों और क्षेत्रीय आंदोलनों में हमेशा अगली पंक्ति में खड़े रहे। उनके इसी समर्पण को देखते हुए क्षेत्र की जनता ने उन्हें ‘कमस्यार घाटी गौरव सम्मान-2024’ से नवाजा था। यह सम्मान घाटी का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।
उनके निधन को अपूरणीय क्षति बताते हुए विभिन्न सामाजिक संगठनों, पूर्व सैनिक संगठनों और आंदोलनकारियों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सूबेदार मेजर कृपाल सिंह रावत के जाने से कमस्यार घाटी ने अपना एक मार्गदर्शक और सच्चा सपूत खो दिया है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति और सेवा की मिसाल बना रहेगा।


