घुसपैठियों को ‘रेड-कार्पेट’ नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर उठाए तीखे सवाल

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घुसपैठियों को 'रेड-कार्पेट' नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर उठाए तीखे सवाल
घुसपैठियों को 'रेड-कार्पेट' नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर उठाए तीखे सवाल

पूछा- ‘शरणार्थी घोषित करने का आदेश कहाँ?’

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले और भारतीय नागरिकों के लिए बनी सुविधाओं का लाभ उठाने की मांग करने वाले घुसपैठियों के खिलाफ मंगलवार को सख्त रुख अपनाया।


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शीर्ष अदालत ने रोहिंग्या लोगों को ‘शरणार्थी’ (Refugee) घोषित करने वाले किसी भी सरकारी आदेश पर भी सवाल उठाया।

कस्टडी से रोहिंग्याओं के गायब होने पर सुनवाई

यह कठोर टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। गौरतलब है कि याचिका में रोहिंग्या लोगों के पुलिस हिरासत (कस्टडी) से कथित तौर पर गायब होने का आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ता ने यह निर्देश देने की मांग की कि यदि कोई निर्वासन (Deportation) होता है, तो वह केवल उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाना चाहिए।

‘घुसपैठिए का स्वागत रेड-कार्पेट से क्यों?’

पीठ ने मौखिक रूप से एक बहुत ही मार्मिक प्रश्न पूछा, जिसने मामले के कानूनी और नैतिक पहलुओं को उजागर किया। पीठ ने कहा, “अगर कोई घुसपैठिया आता है, तो क्या हम उसका रेड-कार्पेट बिछाकर स्वागत करें और कहें कि हम तुम्हें सारी सुविधाएं देना चाहते हैं।”

इस संदर्भ में, अदालत ने घुसपैठ की प्रक्रिया पर भी टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि पहले व्यक्ति गैर-कानूनी तरीके से सीमा पार करता है, “फिर आप कहते हैं कि अब जब मैं आ गया हूं, तो आपके कानून मुझ पर भी लागू होने चाहिए और कहें कि मुझे खाना मिलना चाहिए, मुझे रहने की जगह मिलनी चाहिए, मेरे बच्चों को पढ़ाई मिलनी चाहिए। क्या हम कानून को इस तरह खींचना चाहते हैं?”

‘शरणार्थी’ एक कानूनी शब्द: सरकार का आदेश कहाँ?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘शरणार्थी’ एक सुस्थापित कानूनी शब्द (well-defined legal term) है। इसके अलावा, उन्हें शरणार्थी घोषित करने के लिए सरकार के पास एक निर्धारित प्राधिकरण (Authority) है।

याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि दिल्ली पुलिस ने इस साल मई में कुछ रोहिंग्याओं को पकड़ा था और उनका अभी तक पता नहीं चला है। तब जाकर, पीठ ने सीधा सवाल किया: “रोहिंग्याओं को शरणार्थी घोषित करने वाला भारत सरकार का आदेश कहाँ है?”

वकील ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि उनकी याचिका रोहिंग्याओं के लिए किसी ‘शरणार्थी स्टेटस’ की मांग नहीं कर रही है और न ही उन्हें देश से बाहर निकालने का विरोध कर रही है। फिर भी, पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि अगर किसी शरणार्थी का कोई वैध कानूनी स्टेटस नहीं है, और कोई गैर-कानूनी तरीके से घुसपैठ करता है, तो क्या उस व्यक्ति को यहाँ रखना जरूरी है?

बंदी प्रत्यक्षीकरण और प्रक्रिया का सवाल

पीठ ने कहा कि वकील गायब हुए लोगों को वापस लाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Writ of Habeas Corpus) की मांग कर रहे हैं। वकील ने जवाब में कहा कि निर्वासन कानून की तय प्रक्रिया के हिसाब से होना चाहिए और मौजूदा मामला हिरासत से गायब होने से जुड़ा है।

पीठ ने आगे बढ़कर देश के उत्तरी हिस्से में सीमा की संवेदनशीलता पर ज़ोर दिया और घुसपैठियों के देश में रहने के कानूनी कर्तव्यों पर भी सवाल उठाया।

भारतीय नागरिकों के हक पर ध्यान क्यों नहीं?

जब पीठ ने पूछा, “वापस भेजने में क्या दिक्कत है?”, तो वकील ने जवाब दिया कि उन्हें सिर्फ कानून के हिसाब से वापस भेजा जाना चाहिए।

इसके विपरीत, पीठ ने एक और महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि भारत में भी गरीब नागरिक हैं, जो लाभ और सुविधाओं के हकदार हैं, और सवाल किया कि उन पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता?

सॉलिसिटर जनरल की टिप्पणी और अगली सुनवाई

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अंत में कहा कि यह याचिका किसी प्रभावित व्यक्ति ने नहीं, बल्कि एक पीआईएल (PIL) याचिकाकर्ता ने दायर की है।

सभी दलीलें सुनने के बाद, पीठ ने फैसला किया कि इस मामले पर इसी प्रकार की अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ सुनवाई होगी।

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