पंचायत का कड़ा फैसला, अब बिना अनुमति नहीं मिलेगी एंट्री
CNE REPORTER, चंपावत: सोशल मीडिया की दुनिया में सनसनी और व्यूज बटोरने के लिए किसी भी जगह को ‘हॉन्टेड’ या भूतिया घोषित करने का ट्रेंड अब भारी पड़ने लगा है। उत्तराखंड के चंपावत जिले में स्थित स्वाला गांव ने सोशल मीडिया क्रिएटर्स और तथाकथित पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर्स के खिलाफ एक ऐतिहासिक और कड़ा कदम उठाया है। ग्राम पंचायत ने साफ कर दिया है कि उनके पैतृक गांव को अब अंधविश्वास के चश्मे से नहीं देखा जाएगा।
ग्राम पंचायत ने गांव के मुख्य प्रवेश मार्ग पर एक चेतावनी बोर्ड लगा दिया है। इसके तहत किसी भी यूट्यूबर, ब्लॉगर, न्यूज चैनल या सोशल मीडिया रील मेकर के गांव में प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। बोर्ड पर चेतावनी दी गई है कि यदि कोई भी व्यक्ति बिना पूर्व अनुमति के संदिग्ध वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी करते हुए पाया गया, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पंचायत का स्पष्ट संदेश है कि निजी स्वार्थ और टीआरपी के लिए गांव की छवि को धूमिल करने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा।

क्या है ‘भूतिया गांव’ की आड़ का सच?
पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया पर स्वाला गांव को लेकर तमाम झूठी और भ्रामक कहानियां फैलाई गईं। कुछ क्रिएटर्स ने रातों-रात वायरल होने के लिए यहां कथित पैरानॉर्मल गतिविधियों और भूतिया सायों के दावे किए। देश के कोने-कोने से लोग यहां सनसनीखेज कंटेंट की तलाश में पहुंचने लगे। ग्रामीणों का दर्द है कि इन झूठे वीडियो ने न सिर्फ गांव की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई, बल्कि स्थानीय लोगों को मानसिक रूप से भी असहज कर दिया।
दर्दनाक हादसे से जुड़ी हैं लोककथाएं
आखिर स्वाला गांव से इतनी डरावनी कहानियां क्यों जुड़ीं? इतिहास खंगालने पर साल 1952 की एक दुर्घटना सामने आती है, जब पीएसी के जवानों को ले जा रहा एक वाहन यहां दुर्घटना का शिकार हो गया था। इस हादसे के बाद फैली लोककथाओं को वक्त के साथ अतिशयोक्तिपूर्ण रहस्यों और भूतों की कहानियों में बदल दिया गया।
हालांकि, गांव के बुजुर्ग इन अंधविश्वासों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका साफ कहना है कि गांव के वीरान होने की वजह कोई रूहानी ताकत नहीं, बल्कि वर्षों तक सड़क, स्वास्थ्य और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव और भयानक पलायन था। सुविधाओं के अभाव में लोग मकान छोड़कर चले गए और धीरे-धीरे वे घर खंडहर में तब्दील हो गए।
अफवाहों से परे, संस्कृति से है पहचान
अब स्वाला की ग्राम पंचायत ने ठान लिया है कि वे अपने गांव को इंटरनेट के वर्चुअल भूतों के हवाले नहीं होने देंगे। गांव की असली पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक संघर्ष और यहां के मेहनती बाशिंदों से है। पंचायत के इस सख्त कदम के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि सनसनी फैलाने वालों पर लगाम लगेगी और गांव का असली, गौरवशाली इतिहास सामने आ सकेगा।


