शंकर दत्त पाण्डेय, अल्मोड़ा








भारत विविध संस्कृतियों, परंपराओं और लोकपर्वों का देश है। उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध है। यहां वर्ष भर अनेक लोकपर्व मनाए जाते हैं, जिनमें सॉतू-आठू का विशेष स्थान है। यह पर्व मुख्य रूप से महिलाओं की आस्था, परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की मंगलकामना से जुड़ा हुआ है। यह कुमाऊँ की लोकसंस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक एकता का सुंदर प्रतीक है। (आगे पढ़िये)

सॉतू-आठू का पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। सप्तमी को सॉतू तथा अगले दिन अष्टमी को आठू कहा जाता है। इस अवसर पर विवाहित महिलाएँ और युवतियाँ व्रत रखती हैं तथा अपने परिवार की सुख-शांति, पति की दीर्घायु और बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। कई स्थानों पर अविवाहित कन्याएँ भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं। यह पर्व शिव-पार्वती को समर्पित माना जाता है। सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में यह पर्व ‘ग्वारा महोत्सव’ अथवा ‘ग्वारा मेला’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ मुखौटे बनाए जाते हैं। मुखौटा संस्कृति भी इस पर्व की विशिष्ट पहचान है, जो पूरे देश में अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान रखती है। पिथौरागढ़ जनपद में सतगढ़, कनालीछीना, सिरौली, पनखोली, डुंगरी, बसतड़ी, अस्कोट, बेरीनाग सहित अन्य स्थानों पर यह पर्व मनाया जाता है। इसी प्रकार चम्पावत जनपद में लोहाघाट और पाटी, बागेश्वर जनपद में पचार, किड़ई, पठक्यूरा, देवतोली, कांडा, दौफाड़, कपकोट, सतराली तथा अल्मोड़ा जनपद में द्वाराहाट, रानीखेत, चौखुटिया, सोमेश्वर, दन्या, लमगड़ा सहित अन्य स्थानों पर यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व के पीछे एक मार्मिक लोककथा भी प्रचलित है, जिसका वर्णन महिलाएँ मांगलिक गीतों के माध्यम से करती हैं। एक प्रचलित गाथा के अनुसार बीणभाट ब्राह्मण की सात संतानें थीं। उनका विवाह हो गया था, लेकिन उनकी वंशवृद्धि नहीं हुई। एक बार यजमानों का यज्ञ संपन्न कराकर लौटते समय ब्राह्मण को नदी में स्त्री रूप में पार्वती के दर्शन हुए। ब्राह्मण ने उनसे वंशवृद्धि का उपाय पूछा। तब पार्वती ने उन्हें सातों-आठों के व्रत का विधान बताया। इसलिए माताएँ इस दिन संतान की रक्षा हेतु सात गाँठयुक्त ठोरक (डोर) को संकल्प-सूत्र तथा दूबड़ा को स्मृति-सूत्र के रूप में धारण करती हैं। इस पर्व की तैयारी कई दिन पहले से आरंभ हो जाती है। घरों की साफ-सफाई की जाती है और पूजा के लिए आवश्यक सामग्री एकत्र की जाती है। सॉतू के दिन महिलाएँ प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं। वे पारंपरिक वेशभूषा धारण करती हैं और लोकरीति के अनुसार पूजा-अर्चना करती हैं। अष्टमी के दिन विशेष पूजा-अर्चना के बाद व्रत का समापन किया जाता है। इस अवसर पर घरों में पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं और परिवार के सभी सदस्य मिलकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। (आगे पढ़िये)
सॉतू-आठू केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का भी पर्व है। इस अवसर पर महिलाएँ एक-दूसरे के घर जाती हैं, लोकगीत गाती हैं और अपनी लोकपरंपराओं का आदान-प्रदान करती हैं। गाँवों में सामूहिक पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों से आपसी प्रेम, सहयोग और भाईचारे की भावना मजबूत होती है तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का अवसर मिलता है। कुमाऊँ के लोकपर्व प्रकृति से गहरे जुड़े हुए हैं और सॉतू-आठू भी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। यह पर्व हमें परिवार के महत्व, मातृशक्ति के त्याग, पारस्परिक प्रेम और सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बावजूद इस पर्व की परंपरा आज भी कुमाऊँ के गाँवों और नगरों में श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। प्रवासी कुमाऊँनी परिवार भी जहाँ कहीं रहते हैं, वहाँ इस पर्व को मनाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखते हैं। (आगे पढ़िये)
एक किवदंती के अनुसार गौरा महेश्वर जी से कहती हैं—
“स्वामी, गड़ा दियो सुनुको डोरो,
मै उकू पहनुलो।”
तब महेश्वर गौरा से कहते हैं कि तुम काली हो, तुम्हारे ऊपर यह डोर अच्छी नहीं लगेगी। यह तो सुभद्रा, लक्ष्मी सहित अन्य देवियों पर ही अच्छी लगेगी। तब गौरा शालिग्राम के काले होने, धरती के काले होने आदि का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि यदि काले होने के कारण उन्हें यह डोर नहीं पहननी चाहिए, तो शालिग्राम और धरती का भी परित्याग करना होगा। इस बात को लेकर दोनों में मनमुटाव हो जाता है और महेश्वर घर से निकल जाते हैं। वे बारह वर्ष तक वापस नहीं लौटते। (आगे पढ़िये)
इस दौरान गौरा की स्थिति बहुत दयनीय हो जाती है। वह अपने वीरभाट को मायके भेजती है, लेकिन वीरभाट रास्ते में भटक जाता है। रास्ते में वह हिसालू, चीड़, केला और पद्म (पाया) सहित अन्य पेड़ों से रास्ता पूछता है। इनमें से केवल पद्म का पेड़ उसे रास्ता बताता है। तब वीरभाट हिसालू के पेड़ को श्राप देता है कि उसका फल आते ही झड़ जाएगा और उसमें कीड़े पड़ेंगे। चीड़ के पेड़ को श्राप देता है कि एक बार कटने के बाद वह दोबारा नहीं उगेगा। केले के पेड़ से कहता है कि उसका फल केवल एक बार आएगा। वहीं पद्म के पेड़ को आशीर्वाद देते हुए कहता है कि उसके पत्ते पूजा-अनुष्ठान में काम आएँगे और वह दोबारा पनपेगा। गौरा के मायके पहुँचकर वीरभाट वहाँ उसकी स्थिति का वर्णन करता है, लेकिन उस समय मायके में भी देने के लिए बहुत कुछ नहीं था। थोड़ी-सी सामग्री देकर उसे वापस लौटा दिया गया। तब गौरा स्वयं मायके जाती है। वहाँ उसकी माँ कहती है—तू इस समय क्यों आई? अभी तो तुझे देने के लिए कुछ भी नहीं है। वैसे भी जिस माह में तू आई है, वह ‘भूखा भादों’ के नाम से जाना जाता है। यदि ज्येष्ठ के महीने में आती तो गेहूँ की बालियाँ भूनकर उमी खाती और असौज में आती तो धान के सिरोले खाती। तू इस समय क्यों आई? (आगे पढ़िये)
इस पर गौरा नाराज हो जाती है और कहती है कि तुम्हारे धान के खेतों में पहाड़ ही पहाड़, मडुवे के खेतों में झड़ुआ, गायों में तुम्बर बछड़-बछड़, भैंसों में तुमर काट-काट, ब्यौराऊ में तुम्हर ढड़्व-ढूडू और बौजी में तुम्हर चेली-चेली हों। इसके बाद माँ गौरा को मनाती है और आशीर्वाद देती है—धान के खेत में धान-धान, मडुवे के खेत में बाल-बाल, गायों में तुम्हर बछड़ी-बछड़ी, भैंसों में तुम्हर थ्योरी, ब्यौराऊ में तुम्हर बिराई और बौजी में तुम्हर चेली-चेली हों। इस अवसर पर महिलाएँ गौरा-महेश्वर की मूर्तियाँ बनाने से पहले कन्याओं से आग्रह करते हुए गाती हैं—
ल्याओं चैलियों धतूरे को फुलौ।
ल्याओं चैलियों कुकड़माई को फूलौं।।
अन्नपूर्णा लाओं धतूरे को फूलौ।
लाओं पार्वती धतूरे को फूलौं।
लाओं सुभद्रा धतूरे को फूलौं।
तुम चैली को धतूरे को फूलौ प्यारी,
फूल न्हाति तो डंडी तोड़ लाओं।
डंडी ले न्हाति तो पत्त तोड़ लाओ।
पत्त ले न्हाति तो जड़ ले आओं।
जड़ न्हाति तो मिट्टी को ले आओ।
इसके बाद महिलाएँ अपने खेतों में उपजे विभिन्न प्रकार के अनाजों और वनस्पतियों को लाकर गौरा और महेश्वर की मूर्तियाँ बनाती हैं। गौरा स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान से प्रार्थना करती हैं— (आगे पढ़िये)
पहला वर धर्म-कर्म का माँगू,
दूसरा वर माँगू सुहाग।
तीसरा वर माँगू गोदी भरी हुई,
और चौथा वर माँगू घर में भरी भकार।
जनपद पिथौरागढ़ में मुखौटों के रूप में बैलों की जोड़ी, हिरन, महाकाली आदि का प्रदर्शन किया जाता है। सतगढ़, कनालीछीना, सिरौली सहित अन्य स्थानों में झोड़ा और चांचरी का गायन शुरू होता है तथा युगल नृत्य भी किया जाता है।बागेश्वर जनपद के ग्राम पचार में यह पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। महिलाएँ इस अवसर पर पूर्व परंपराओं के अनुसार गाँव के एक परिवार में जाकर मूर्ति स्थापना और महिला संगीत का कार्यक्रम करती हैं। दूसरे दिन महिलाएँ स्थानीय देवी मंदिर में जाकर अनेक कार्यक्रम करती हैं, जो परिवार की समृद्धि के द्योतक माने जाते हैं। गौरा-महेश्वर की मूर्तियों के विसर्जन से पूर्व महिलाएँ उन्हें अपनी गोद में छोटे बालक की तरह सहलाती हुई ‘होलरी बावा, होलरी बावा’ सहित अनेक मांगलिक गीत गाती हैं। (आगे पढ़िये)
बिरुड़ पंचमी से अष्टमी के मध्य आयोजित होने वाला यह उत्सव धार्मिक और सामाजिक चिंतन से परिपूर्ण है। पुरुषों के यज्ञोपवीत की तरह स्त्रियों द्वारा डोर-दूबड़ा धारण करना हमारी धार्मिक धारणाओं और सांस्कृतिक पहचान को और अधिक मजबूत करता है। दूब को समृद्धि का सूचक माना जाता है और इसे गले में धारण किया जाता है। बिरुड़ा पंचमी में बीजों को भिगोना और अष्टमी को अंकुरित बीजों को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना स्वास्थ्य के प्रति सजगता को भी प्रकट करता है। वर्तमान में विलुप्त होती जा रही इन धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखने के लिए संस्कृति विभाग को ठोस पहल करनी होगी। साथ ही, प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री को भी इस दिशा में विशेष पहल करनी चाहिए। तभी ये पर्व और उनसे जुड़ी लोकपरंपराएँ आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुँच पाएँगी। इन त्योहारों के संबंध में अनेक स्थानों पर अलग-अलग परंपराएँ प्रचलित हैं और लोग अपने-अपने क्षेत्र की लोकरीति के अनुसार इनका आयोजन करते हैं। यही विविधता कुमाऊँ की लोकसंस्कृति को और अधिक समृद्ध बनाती है। (आगे पढ़िये)
सॉतू-आठू कुमाऊँ की समृद्ध लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। यह पर्व हमें अपनी परंपराओं का सम्मान करने, परिवार में प्रेम और एकता बनाए रखने तथा सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने की प्रेरणा देता है। ऐसे लोकपर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाते हैं और समाज में सौहार्द, अपनत्व तथा पारस्परिक सहयोग की भावना को बढ़ावा देते हैं। आज आवश्यकता है कि सॉतू-आठू जैसे लोकपर्वों से जुड़ी लोककथाओं, गीतों, अनुष्ठानों, मुखौटा परंपरा और स्थानीय रीति-रिवाजों का दस्तावेजीकरण किया जाए तथा नई पीढ़ी को इनसे जोड़ा जाए। लोकसंस्कृति तभी जीवित रह सकती है, जब वह केवल स्मृति का हिस्सा न रहकर सामुदायिक जीवन और व्यवहार का सक्रिय अंग बनी रहे। कुमाऊँ की यह अनमोल सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचे—यही इस लोकपर्व की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।


