पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए हरिनगर में जुटी भीड़

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पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए हरिनगर में जुटी भीड़
पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए हरिनगर में जुटी भीड़

ग्रामीणों ने लिया वनाग्नि और प्लास्टिक मुक्त गाँव का संकल्प


विशेष संवाददाता। थली बीट के अंतर्गत आने वाले ग्राम सभा हरिनगर में सोमवार को पर्यावरण संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से एक विशाल जागरूकता गोष्ठी एवं जनचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम आदिवासी वेलफेयर सोसाइटी और वन विभाग (उत्तरी गौला रेंज) के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित हुआ। इस गोष्ठी का मुख्य उद्देश्य स्थानीय ग्रामीणों को वनों के महत्व को समझाना, जंगलों को आग से बचाना और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले प्लास्टिक से मुक्ति दिलाना था।


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कार्यक्रम में मुख्य रूप से जंगलों के आस-पास रहने वाले ग्रामीणों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। उपस्थित अधिकारियों और विशेषज्ञों ने ग्रामीणों को वन्यजीवों के हमले से बचने के लिए आवश्यक सावधानियाँ और सुरक्षा उपायों की विस्तृत जानकारी दी। ग्रामीणों से अपील की गई कि वे अकेले या देर सवेर जंगलों में जाने से बचें और वन्यजीवों की गतिविधि दिखने पर तुरंत वन विभाग को सूचित करें।

सुलगते जंगलों को बचाने की मुहिम: वनाग्नि रोकथाम पर चर्चा

गर्मियों के मौसम में जंगलों में लगने वाली आग (वनाग्नि) एक गंभीर समस्या बनी हुई है। इस पर नियंत्रण पाने के लिए वक्ताओं ने आग लगने के कारणों और उसके भयानक दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला।

  • ग्रामीणों से विशेष अनुरोध किया गया कि वे जंगलों में जलती हुई बीड़ी-सिगरेट, माचिस या कोई भी ज्वलनशील वस्तु न फेंकें।
  • खेती के मलबे को जलाते समय विशेष सावधानी बरतने को कहा गया।
  • वनाग्नि की स्थिति में वन विभाग के साथ मिलकर तुरंत आग बुझाने में सहयोग करने की अपील की गई।

प्लास्टिक मुक्त अभियान: सिंगल यूज़ प्लास्टिक को ‘ना’

गोष्ठी में उपस्थित महिलाओं और ग्रामीणों को सिंगल यूज़ प्लास्टिक के घातक प्रभावों के बारे में जागरूक किया गया। वक्ताओं ने बताया कि प्लास्टिक न केवल हमारी भूमि को बंजर बना रहा है, बल्कि जंगली जानवरों के पेट में जाकर उनकी मौत का कारण भी बन रहा है। गाँव और आस-पास के वन क्षेत्रों को पूरी तरह स्वच्छ और प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए सभी ने मिलकर काम करने का भरोसा दिया।

पिरूल प्रबंधन: आपदा को अवसर में बदलने की सीख

उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ की सूखी पत्तियाँ (पिरूल) वनाग्नि का सबसे बड़ा कारण बनती हैं। कार्यक्रम में इस पिरूल के सही एकत्रीकरण और इसके विभिन्न व्यावसायिक उपयोगों पर विस्तृत जानकारी दी गई। ग्रामीणों को बताया गया कि पिरूल से:

  1. जैविक खाद बनाई जा सकती है।
  2. ऊर्जा और चारकोल उत्पादन किया जा सकता है।
  3. हस्तशिल्प के उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

पिरूल का यह उचित प्रबंधन न सिर्फ जंगलों को आग से बचाएगा, बल्कि ग्रामीणों के लिए रोजगार के नए साधन भी खोलेगा।


विशेषज्ञों और प्रबुद्ध जनों ने रखे विचार

वन आरक्षी श्री सुनील प्रसाद (वन विभाग):

“मानव और वन्यजीवों का सह-अस्तित्व तभी संभव है जब हम वनों का सम्मान करेंगे। वनाग्नि और प्लास्टिक हमारी सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिन्हें हम केवल जन-भागीदारी से ही हरा सकते हैं।”

श्री चंदन सिंह नयाल (पर्यावरण प्रेमी):

“प्रकृति का संरक्षण हमारे जीवन का आधार है। यदि आज हम अपने जल, जंगल और जमीन को स्वच्छ और सुरक्षित नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।”

डॉ. विक्रांत तिवारी (संरक्षक, आदिवासी वेलफेयर सोसाइटी):

“पर्यावरण संरक्षण में समाज और खासकर युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। युवाओं को आगे आकर इस बदलाव का नेतृत्व करना होगा।”


ग्रामीणों ने लिया सामूहिक संकल्प

इस महत्वपूर्ण गोष्ठी में हरिनगर के ग्राम प्रधान, हरिनगर वन पंचायत के सरपंच, महतोली गाँव के ग्राम प्रधान सहित फायर वॉचर हरीश, भास्कर और बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण व महिलाएँ उपस्थित रहीं।

कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने हाथ उठाकर यह सामूहिक संकल्प लिया कि वे वनों और पर्यावरण की रक्षा करेंगे, अपने गाँव को प्लास्टिक मुक्त बनाएंगे और वनाग्नि को रोकने में वन विभाग का कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करेंगे।

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