पिरुल उत्पादों के जरिए सशक्तिकरण की नई पहल
सीएनई रिपोर्टर। वन विभाग और कर्तव्य फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में वनाग्नि की रोकथाम और वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक विशेष जागरूकता अभियान चलाया गया। इस कार्यक्रम के माध्यम से स्थानीय समुदाय से जंगलों को आग से बचाने और पर्यावरण व वन्यजीवों की सुरक्षा में सक्रिय सहयोग सुनिश्चित करने की अपील की गई।


जंगल जीव-जंतुओं का घर: वन विभाग का संदेश
कार्यक्रम के दौरान वन क्षेत्राधिकारी विजय चन्द्र भट्ट ने स्थानीय निवासियों को संबोधित करते हुए वनों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि:
- जंगल केवल पेड़ों का समूह मात्र नहीं हैं, बल्कि यह असंख्य जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास हैं।
- वनाग्नि न केवल वनस्पतियों को नष्ट करती है, बल्कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँचाती है।
- प्रत्येक नागरिक का यह नैतिक दायित्व है कि वे वन संरक्षण के प्रति जागरूक हों और वनाग्नि की घटनाओं को रोकने में प्रशासन का हाथ बटाएं।
पिरुल से स्वरोजगार और वनाग्नि पर नियंत्रण
गोष्ठी में आकर्षण का केंद्र भारती जीना द्वारा पिरुल (चीड़ की सूखी पत्तियां) से निर्मित उत्पाद रहे। उपस्थित जनसमूह और अतिथियों ने पिरुल से बनी हस्तशिल्प वस्तुओं की जमकर सराहना की। वक्ताओं ने इस पहल के तीन मुख्य लाभ गिनाए:
- वनाग्नि में कमी: पिरुल वनाग्नि का सबसे बड़ा कारक है। इसका उपयोग होने से जंगलों में आग लगने की घटनाओं में भारी गिरावट आएगी।
- महिला सशक्तिकरण: इस प्रकार के रचनात्मक कार्यों से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी।
- रोजगार सृजन: स्थानीय स्तर पर पिरुल आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन मिलने से आर्थिक समृद्धि आएगी।
जागरूकता अभियान में जिला पंचायत सदस्य व पूर्व ब्लॉक प्रमुख रामगढ़ पुष्पा नेगी, ग्राम प्रधान भीयालगांव दीपा देवी, ग्राम प्रधान चंदूलता और दान सिंह बतौर अतिथि शामिल हुए। सभी वक्ताओं ने वनों को बचाने के लिए सामुदायिक भागीदारी पर बल दिया।
वन विभाग की ओर से इस कार्यक्रम में वन क्षेत्राधिकारी के साथ बृजेश विश्वकर्मा (वन दरोगा), वीरपाल सिंह (वन रक्षक) और कुन्दन प्रसाद (बीट सहायक) भी मौजूद रहे, जिन्होंने ग्रामीणों को वनाग्नि नियंत्रण के तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी।


