शिक्षक प्रशिक्षुओं के मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित रहा शोध
सीएनई रिपोर्टर, नैनीताल। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के डी.एस.बी. परिसर में शनिवार, 09 मई 2026 को शिक्षा शास्त्र विभाग के शोधार्थी चंचल कुमार की पीएच.डी. मौखिकी परीक्षा सफलतापूर्वक संपन्न हुई। इस शोध के माध्यम से वर्तमान समय में युवाओं, विशेषकर भविष्य के शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके आत्म-बोध की महत्ता को वैज्ञानिक दृष्टि से रेखांकित किया गया है।



चंचल कुमार ने अपना शोध कार्य एम.बी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हल्द्वानी के शिक्षक शिक्षा विभाग के प्रो. (डॉ.) टी. सी. पांडेय के कुशल निर्देशन में पूर्ण किया। उनके शोध का शीर्षक “शिक्षक प्रशिक्षुओं के मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्म-संकल्पना का शैक्षिक परिदृश्य में अध्ययन” था। यह विषय आज के प्रतिस्पर्धी और तकनीकी युग में अत्यंत प्रासंगिक माना जा रहा है।
शोध के निष्कर्षों में इस बात पर बल दिया गया है कि एक शिक्षक का मानसिक रूप से संतुलित और सकारात्मक होना राष्ट्र निर्माण के लिए अनिवार्य है। वर्तमान चुनौतियों के बीच यदि शिक्षक प्रशिक्षु मानसिक रूप से सुदृढ़ होंगे, तभी वे आने वाली पीढ़ी को बेहतर मार्गदर्शन दे पाएंगे। शोध में स्पष्ट किया गया कि स्वस्थ आत्म-संकल्पना विद्यार्थियों में न केवल आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता बढ़ाती है, बल्कि उनके सामाजिक समायोजन को भी मजबूती प्रदान करती है।
मौखिकी परीक्षा के दौरान बाह्य परीक्षक के रूप में दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति एवं गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय के डीन प्रो. धनंजय जोशी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुमाऊँ विश्वविद्यालय के डीन प्रो. अतुल जोशी द्वारा की गई। इस अवसर पर डॉ. मनीषा नारियाल, डॉ. विजय कुमार और डॉ. जीवन उपाध्याय सहित कई वरिष्ठ शिक्षक एवं शोधार्थी उपस्थित थे।
शिक्षा जगत में हर्ष की लहर
चंचल कुमार की इस उपलब्धि पर एम.बी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एन. एस. बैंकोटी ने उन्हें उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दीं। इसके साथ ही डॉ. अनीता जोशी, डॉ. शुभ्रा कांडपाल, डॉ. सविता भंडारी और डॉ. ललित मोहन जोशी सहित विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापकों ने शोधार्थी एवं उनके निर्देशक को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए बधाई प्रेषित की है।
शोध कार्य के अंत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली को अधिक संवेदनशील और जागरूक बनाने के लिए कई व्यावहारिक सुझाव भी दिए गए। शोधार्थी ने जोर दिया कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित न रखकर व्यक्तित्व विकास और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता से जोड़ने की आवश्यकता है।


