चमत्कारी अक्षत: जहाँ गिरे 5 दाने, वहाँ बना माँ भगवती का मंदिर! बिजोरीझाल धाम की गाथा
- सुरेश उप्रेती सेवक (पुजारी) मां भगवती मंदिर
CNE REPORTER, बागेश्वर। कुमाऊं की शांत वादियों और प्राकृतिक सौंदर्य से सराबोर जनपद बागेश्वर का बिजोरीझाल क्षेत्र इन दिनों आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बना हुआ है। यहाँ स्थापित माँ भगवती का भव्य मंदिर न केवल स्थानीय निवासियों की अटूट श्रद्धा का आधार है, बल्कि अपनी पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक जीवंतता के कारण अब दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आकर्षण का मुख्य केंद्र बनता जा रहा है।

दिव्य उत्पत्ति का इतिहास: ‘अक्षत’ से मिली राह
मंदिर की स्थापना की गाथा किसी चमत्कार से कम नहीं है। जनश्रुतियों और पूर्वजों के कथनानुसार, सदियों पहले कपकोट के ऐठाण पोथिंग से ऐठानी परिवार यहाँ आकर धरैगैर में बसा था। मान्यता है कि परिवार की प्रथम बुजुर्ग महिला (आमा) के शरीर में स्वयं कपकोट ऐठाण की भगवती अवतरित हुई थीं।

देवी ने तब एक अलौकिक भविष्यवाणी की थी— “जहाँ अक्षत (चावल) के पांच दाने गिरेंगे, वहाँ मेरा मंदिर बनेगा और जहाँ तीन दाने मिलेंगे, वहाँ धुनी स्थापित होगी।” आश्चर्यजनक रूप से, ग्रामीणों को खोज के दौरान मंदिर स्थल से कुछ सौ मीटर की दूरी पर वे दाने प्राप्त हुए। इसी ईश्वरीय संकेत को शिरोधार्य करते हुए पूर्वजों ने यहाँ मंदिर और धुनी की स्थापना की।

परंपराओं का जीवंत रूप: नवरात्र और देव अवतार
बिजोरीझाल का यह मंदिर केवल एक ढांचा नहीं, बल्कि जीवित परंपराओं का संवाहक है। शारदीय नवरात्रों के दौरान यहाँ का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।
- अखंड ज्योति व भोग: नौ दिनों तक माँ के सम्मुख अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है और प्रतिदिन सात्विक भोग अर्पित किया जाता है।
- बैंस और सौपाती पूजन: नवरात्रों में विशेष अनुष्ठान होते हैं, जिनमें लाटू देव और छुरमल देव के ‘नर बदन’ (पश्वा) में अवतरण को देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ता है।
- सामूहिक उत्सव: यहाँ हरेला पर्व को केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामूहिक उल्लास के रूप में मनाया जाता है।
स्थापत्य और आध्यात्मिक परिवेश
समय के साथ मंदिर का स्वरूप भव्य हुआ है। पूर्व में स्वर्गीय दरबान सिंह ने ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर के सौंदर्यीकरण की नींव रखी थी। वर्तमान में मंदिर परिसर में माँ भगवती के साथ-साथ:
- देवी नन्दा
- देवी काली
- लाटू देव
- भैरव देव
की प्रतिमाएं विराजमान हैं, जो भक्तों को सुरक्षा और शांति का अनुभव कराती हैं।

जन-सहयोग से निखरा स्वरूप
मंदिर के मुख्य पुजारी सुरेश उप्रेती बताते हैं कि इस पावन धाम का वर्तमान स्वरूप स्थानीय जनता, प्रवासी ग्रामीणों, समाजसेवियों और क्षेत्र की बेटियों के सामूहिक अंशदान का प्रतिफल है। वे कहते हैं, “भक्तों द्वारा मंदिर में किया गया सहयोग असल में उनकी उन मनौतियों की पूर्णता का प्रतीक है, जो माँ ने पूरी की हैं।”
बिजोरीझाल की पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर आज न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का सेतु भी बन गया है।


