कॉर्बेट में ‘परमिट माफिया’ का खेल? मात्र 120 सेकंड में ढिकाला हाउसफुल

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कॉर्बेट में 'परमिट माफिया' का खेल
कॉर्बेट में 'परमिट माफिया' का खेल

बुकिंग स्कैम की गूंज से हिला प्रशासन!

CNE REPORTER, रामनगर: प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में बाघों का दीदार करना अब आम पर्यटकों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। जिस तेजी से रेलवे की तत्काल टिकटें गायब होती हैं, उससे भी कहीं ज्यादा रफ्तार से कॉर्बेट के ढिकाला जोन की बुकिंग ‘उड़’ रही है। ताजा मामले ने पूरे पर्यटन जगत को सन्न कर दिया है—महज 2 मिनट (120 सेकंड) के भीतर ढिकाला के सभी कमरे बुक हो गए। इस “सुपरफास्ट” बुकिंग ने दाल में कुछ काला होने के बजाय, पूरी दाल ही काली होने का संदेह पैदा कर दिया है।


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डिजिटल सेंधमारी या चमत्कार? सवालों के घेरे में सिस्टम

नियमों के मुताबिक, हर रविवार सुबह 10 बजे आगामी 45 दिनों के लिए ऑनलाइन पोर्टल खोला जाता है। पर्यटकों का आरोप है कि जैसे ही घड़ी की सुइयों ने 10 बजाए, सिस्टम ‘हैंग’ हुआ और जब तक पेज खुला, तब तक ‘हाउसफुल’ का बोर्ड लग चुका था।

स्थानीय पर्यटन कारोबारियों का गणित सीधा है: एक बुकिंग के लिए नाम, उम्र, आधार नंबर, कमरों का चयन, कैप्चा कोड और ओटीपी (OTP) जैसी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अमन खान जैसे अनुभवी कारोबारियों का तर्क है कि कोई भी इंसान 120 सेकंड में इतनी जटिल प्रविष्टियाँ पूरी नहीं कर सकता। आशंका जताई जा रही है कि यहाँ ‘सॉफ्टवेयर बॉट्स’ या ‘ऑटोमेटेड स्क्रिप्ट्स’ के जरिए सेंधमारी की गई है।

33 हजार का स्टे… 4 लाख की ब्लैक मार्केटिंग!

इस कथित धांधली के पीछे का आर्थिक गणित चौंकाने वाला है। सूत्रों और स्थानीय कारोबारियों के अनुसार:

  • असली कीमत: ढिकाला में 3 दिनों के स्टे का आधिकारिक खर्च लगभग 30,000 से 33,000 रुपये है।
  • ब्लैक मार्केट रेट: इसी परमिट को ‘वीआईपी कोटा’ या सेटिंग के नाम पर 3 से 4 लाख रुपये तक में बेचा जा रहा है।
  • सफारी परमिट: सामान्य सफारी जिसकी कीमत 3-10 हजार रुपये है, उसे 40 हजार रुपये तक में ठिकाने लगाया जा रहा है।

“यह सीधा-सीधा परमिट माफिया का संगठित अपराध है। जो बुकिंग पारदर्शी होनी चाहिए थी, वह अब निजी कंपनियों और बिचौलियों की मुट्ठी में है।” — अमन खान, स्थानीय पर्यटन कारोबारी

ढिकाला: जहाँ कमरों से ज्यादा उम्मीदें हैं

📊 जिम कॉर्बेट: ढिकाला जोन की सीमित आवास क्षमता का ‘कच्चा चिट्ठा’

नीचे दी गई तालिका स्पष्ट करती है कि आखिर क्यों यहाँ बुकिंग के लिए इतनी मारामारी रहती है:

रेंज / कैंप का नामकमरों की संख्यापर्यटकों की पहली पसंद क्यों?डिमांड लेवल
मुख्य ढिकाला कैंप20पार्क का केंद्र और सबसे भव्य परिसर🔥 बेहद उच्च
गैरल (Gairal)06रामगंगा नदी के तट पर स्थित शांत वातावरण⭐⭐⭐⭐
खिनानौली (Khinnanauli)03बाघों की आवाजाही का मुख्य गलियारा🔥 प्रीमियम
सुल्तान (Sultan)02जंगल के बीचों-बीच एकांत अनुभव⭐⭐⭐
सर्पदुली (Sarapduli)02घने जंगल और मगरमच्छों के दीदार के पास⭐⭐⭐
डॉरमेट्री (Dormitory)20 बेडबजट यात्रियों के लिए सामूहिक ठहराव⭐⭐
कुल उपलब्ध क्षमता33 कमरे + 20 बेडसीमित जगह + लाखों सैलानी🚨 क्रिटिकल

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📌 विश्लेषण: जब पूरे देश से हजारों लोग एक साथ इन मात्र 33 कमरों के लिए पोर्टल पर क्लिक करते हैं, तो ‘सॉफ्टवेयर बॉट्स’ या ‘माफिया’ चंद सेकंड में इन्हें झपट लेते हैं। यही कारण है कि आम पर्यटक के लिए 120 सेकंड के भीतर यह “मिशन इम्पॉसिबल” बन जाता है।


प्रशासन सख्त: जांच की आंच अब निजी कंपनी तक

मामला गरमाते ही कॉर्बेट पार्क के डायरेक्टर डॉ. साकेत बडोला ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह को जांच अधिकारी नियुक्त कर तत्काल रिपोर्ट तलब की है।

जांच के मुख्य बिंदु:

  1. बुकिंग वेबसाइट चलाने वाली निजी कंपनी की भूमिका।
  2. बिना पूर्व सूचना के सिस्टम में ‘ओटीपी लेयर’ क्यों जोड़ी गई?
  3. क्या एक ही आईपी एड्रेस (IP Address) से थोक में बुकिंग की गई है?

पार्क वार्डन बिंदर पाल सिंह ने स्पष्ट किया, “निजी कंपनी से जवाब मांगा गया है। अगर तकनीकी हेरफेर या किसी भी स्तर पर मिलीभगत पाई गई, तो सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।”

आर-पार की लड़ाई: कोर्ट जाने की तैयारी

पर्यटन कारोबारियों ने दो टूक कहा है कि यदि यह संदिग्ध बुकिंग्स तुरंत निरस्त नहीं की गईं और दोषियों पर गाज नहीं गिरी, तो वे उत्तराखंड उच्च न्यायालय की शरण लेंगे। उनका आरोप है कि डिजिटल इंडिया के नाम पर पारदर्शिता लाने का दावा करने वाला यह सिस्टम अब भ्रष्टाचार का नया अड्डा बन चुका है।

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