╰┈➤ जनसंवाद: 26 साल बाद भी नहीं बदले उत्तराखंड के हाल
╰┈➤ राज्य की मूल अवधारणा के लिए साझा संघर्ष का संकल्प
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा: गुरुवार को अल्मोड़ा नगर निगम के सभागार में उत्तराखंड का दर्द खुलकर छलका। राज्य के दयनीय हालातों को लेकर जगी यह पीड़ा ‘उत्तराखंड के हाल: 26 साल’ विषयक जनसंवाद में वक्ताओं के मुखारविंद से उजागर हुई। उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के बैनर तले आयोजित इस संवाद में राजनैतिक, सामाजिक व गैर राजनैतिक संगठनों के लोगों ने हिस्सा लिया और राज्य की मूल अवधारणा को साकार करने के लिए साझा संघर्ष करने का संकल्प लिया गया।
राज्य की मूल अवधारणा से खिलवाड़
जनसंवाद में राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन, पर्यावरण और राजनीतिक हालातों पर व्यापक चर्चा हुई और वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड राज्य निर्माण के 26 वर्ष बाद भी राज्य आंदोलन की मूल अवधारणाएं और जनआकांक्षाएं अधूरी हैं। आरोप लगाया कि कांग्रेस और भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के चलते राज्य की मूल अवधारणा के साथ खिलवाड़ किया। उन्होंने उत्तराखण्ड की विशिष्ट जरूरतों और राज्य की मूल परिकल्पना को लगातार नजरअंदाज किया है।
लूट खसोट को बढ़ावे से सपना चकनाचूर
जनसंवाद की शुरुआत करते हुए उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के संयोजक पीसी तिवारी ने राज्य आंदोलन के लंबे संघर्षों और बलिदानों को याद किया। उन्होंने कहा कि जनता ने जिस उत्तराखण्ड का सपना देखा था, वह 26 साल बाद भी साकार नहीं हुआ है। राज्य आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से कमजोर हुआ है। स्थायी राजधानी का सवाल आज भी अनसुलझा है और बेरोजगारी, शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं ने जनता में निराशा और आक्रोश पैदा किया है। जल, जंगल और जमीन सहित प्राकृतिक संसाधनों की लूट ने राज्य को खोखला किया है। ऐसे में सत्ता में बैठे लोगों के विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड आज एक विश्वसनीय और संघर्षशील क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प की तलाश में है। इसके लिए उन्होंने आम जनता और ईमानदार जनपक्षधर लोगों से एकजुट होकर आगे आने का आह्वान किया।
26 साल बाद भी हासिए पर बुनियादी सवाल
अन्य वक्ताओं ने कहा कि सैनिकों, किसानों, महिलाओं, श्रमिकों और युवाओं सहित समाज के विभिन्न वर्गों में गहरा असंतोष है। रोजगार की असुरक्षा, ठेकेदारी प्रथा, भ्रष्टाचार और गिरते राजनीतिक मूल्यों से जनता त्रस्त है। क्षेत्रीयता के नाम पर जनता को भ्रमित किया जा रहा है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण जैसे बुनियादी सवालों पर सरकार की कोई स्पष्ट नीति और कार्ययोजना दिखाई नहीं देती।
जनता भुगत रही खामियाजा
वक्ताओं ने कहा कि राज्य आंदोलन के दौरान ऐसे उत्तराखण्ड की कल्पना नहीं की गई थी, जहां सत्ता और प्रशासन जवाबदेही एवं पारदर्शिता से मुक्त होकर काम करें। स्थायी राजधानी, महिला सुरक्षा, राजनीतिक शुचिता और रोजगार जैसे सवालों पर सरकार तथा जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाना जरूरी है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश और दक्षिण भारत के कई राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद वे सामाजिक विकास के अनेक मानकों पर उत्तराखण्ड से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। स्थापित राजनीतिक दलों की दिशाहीनता का खामियाजा प्रदेश की जनता भुगत रही है। जनसंवाद के अंत में इन मुद्दों पर व्यापक स्तर पर साझा पहल और संघर्ष तेज करने तथा उत्तराखण्ड की जनआकांक्षाओं के अनुरूप एक विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प के निर्माण के लिए मिलकर काम करने पर सहमति बनी।
संवाद में मौजूदगी
वरिष्ठ अधिवक्ता गोविंद लाल वर्मा की अध्यक्षता में आयोजित जनसंवाद में बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, सीपीआई (एम), उत्तराखण्ड क्रांति दल, उत्तराखण्ड छात्र संगठन, सीटू और उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में निर्मल जोशी, नवीन बिष्ट, आनंदी वर्मा, पीसी तिवारी, यूसुफ तिवारी, विनय किरौला, डॉ. सुशील जोशी, जाहिद खान, भावना पाण्डे, हेमलता, शेखर चंद्र जोशी, चंपा सुयाल, सुरेंद्र धामी, जगत रौतेला, दयाकृष्ण काण्डपाल, पूरन चंद्र तिवारी, गिरधारी काण्डपाल, चंद्रशेखर बनकोटी, नारायण राम, देवेंद्र फर्त्याल, गोविंद सिंह मेहरा, चंद्रकला उप्रेती, हर्षिता जोशी, पीएस बोरा, कमल सिंह, सुनील कुमार टम्टा, बबीता टम्टा, भावना जोशी और सुनीता सहित अनेक लोगों ने विचार रखे।









