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बड़े संघर्ष से जन्मा उत्तराखंड दिशाहीन नीतियों व राजनैतिक स्वार्थों के भंवर में उलझा

👉 अल्मोड़ा में ‘उत्तराखंड के हाल: 25 साल’ विषयक गोष्ठी में वक्ताओं ने जताई चिंता

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा: उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विभिन्न संगठनों व नागरिकों की संगोष्ठी आयोजित हुई। इसमें वक्ताओं ने उत्तराखंड के मौजूदा हालातों पर गहरी चिंता व्यक्त की और कहा कि कभी बड़े संघर्ष से सुनहरे सपनों के साथ जन्मा राज्य आज दिशाहीन नीतियों और राजनीतिक स्वार्थों के भंवर में उलझ गया है। वक्ताओं ने कहा कि राज्य आंदोलन के पीछे ‘अपनेपन’ की भावना थी और ‘विकास के अधिकार’ का सपना था, मगर वह अब प्रशासनिक फाइलों और पूंजीगत सौदों के बीच खो गया है।

रविवार को राजकीय संग्रहालय अल्मोड़ा के सभागार में आयोजित ‘उत्तराखंड के हाल: 25 साल’ विषयक संगोष्ठी में उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ने कहा कि जोशीमठ से लेकर धराली और थराली तक आपदा का जो भयावह दृश्य दिखा, वह सिर्फ भौगोलिक आपदा नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता की चेतावनी थी। उन्होंने कहा कि इससे सरकार ने न तो सबक लिया, न दिशा बदली। आज पूरा हिमालय विनाशकारी नीतियों और अवैज्ञानिक निर्माणों के कारण आपदा के मुहाने पर खड़ा है और खामियाजा आम जनता भुगत रही है। उन्होंने कहा कि राज्य की जिस अस्मिता और आत्मनिर्भरता के लिए लोगों ने संघर्ष किया था, वह अब लूट-खसोट और ठेकेदारी राजनीति की भेंट चढ़ चुकी है। किसान, मजदूर और बेरोजगार युवा निराशा के अंधेरे में हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्र जर्जर हो चुके हैं।

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य नीरज पंत ने कहा कि पिछले 25 वर्षों में प्रदेश की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था रसातल में पहुंच चुकी है। उन्होंने सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी का उल्लेख करते हुए कहा कि लोग अपने हक की बात करते हैं, मगर उन्हें आज अपराधी की तरह पेश किया जा रहा है। जो किसी लोकतांत्रिक राज्य का लक्षण नहीं है। धीरेंद्र पाठक ने कहा कि राज्य बनने के बाद से भ्रष्टाचार का ऐसा तंत्र विकसित हुआ, जिसने जनता की उम्मीदों को निगल लिया। अब समय है कि एक नए जनांदोलन की शुरुआत हो। जो 90 के दशक के आंदोलन की तर्ज पर हो, ताकि सत्ता को जनता के असली सवालों से जोड़ा जा सके। राज्य आंदोलनकारी महेश परिहार ने कहा कि अगर सरकारों ने समय रहते पहाड़ की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप नीति बनाई होती, तो आज यह स्थिति नहीं आती।

युवा सामाजिक कार्यकर्ता सोनी मेहता ने बताया कि प्रदेश के 1700 से अधिक गांव भूतिया घोषित हो चुके हैं और 2500 से ज्यादा प्राथमिक व जूनियर हाई स्कूल बंद किए जा चुके हैं। शिक्षा के आधुनिकीकरण के नाम पर सरकार दरअसल स्कूलों को खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है। महिला समिति की प्रतिनिधि भावना जोशी ने कहा कि पहाड़ की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थिति विशिष्ट है, लेकिन नीति-निर्माताओं में उसका अनुभव या समझ नहीं है। यही वजह है कि योजनाएं कागज पर बनती हैं और गांव उजड़ते जा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता विनय किरौला ने कहा कि देहरादून की फाइलों में तो विकास की रफ्तार तेज़ दिखती है, लेकिन गांवों में न बिजली सुधरी और न रोजगार के अवसर बढ़े। सरकारों के सारे मॉडल धरातल पर असफल साबित हुए हैं। कार्यक्रम में उत्तराखंड लोक वाहिनी के एड. जगत रौतेला, सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर सर्वेश डंगवाल, सेवानिवृत्त कर्नल राजीव रावत, जीवन उप्रेती, मनोहर सिंह नेगी, विनोद तिवारी, जीवन चंद्र, उदय किरौला, अजयमित्र बिष्ट, भारती पांडे, ममता जोशी, सीएस बनकोटी, राजू गिरी, हेमा जोशी, एड. मनोज पंत, जीवन चंद्र, ममता जोशी, कर्मचारी नेता चन्द्रमणि भट्ट, मुहम्मद साकिब, नारायण सिंह, संजय अग्रवाल, चम्पा सुयाल आदि कई अन्य लोग उपस्थित रहे।

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