HomeBreaking Newsबहुत महंगा पड़ा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल, SC ST Act में कार्रवाई

बहुत महंगा पड़ा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल, SC ST Act में कार्रवाई

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📌 जांच में सही पाये गये आरोप, ज्यूडिशियल कस्टडी में जेल

सीएनई रिपोर्टर, गरमपानी/भवाली। कोतवाली भवाली क्षेत्रांतर्गत एक जमीनी विवाद के प्रकरण में एक व्यक्ति को अपने पड़ोसी के साथ गाली-गलौज व जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल करना बहुत भारी पड़ गया। जांच के बाद तमाम आरोप पुलिस ने सही पाये। जिस पर आरोपी पर SC ST Act सहित विविध धाराओं में कार्रवाई हुई। उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार आरोपी गोपाल दत्त भट्ट पुत्र शिवदत्त भट्ट उम्र 48 वर्ष निवासी ग्राम धारी पोस्ट हरतोला कोतवाली भवाली जनपद नैनीताल पर कार्रवाई हुई है। शिकायतकर्ता ने उस पर एक जमीनी विवाद के प्रकरण में कब्जे के दौरान उसके साथ मारपीट, गाली-गलौज व जाति सूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप लगाया था।

मार्च माह में दर्ज हुआ था मुकदमा, जांच में हुई पुष्टि

जिस संबंध में शिकातकर्ता द्वारा विगत माह मार्च 2023 को कोतवाली भवाली में मुकदमा भी धारा 3(1) S, 3(1) F एससी/एसटी एक्ट (SC ST Act) व धारा – 323, 504, 506 आईपीसी के अंतर्गत पंजीकृत करवाया। विवेचना विभा दीक्षित (क्षेत्राधिकारी नगर नैनीताल) द्वारा की जा रही थी। मुकदमे में क्षेत्राधिकारी नगर नैनीताल (विवेचक) द्वारा समस्त साक्ष्यों का बारीकी के साथ अवलोकन किया गया। जांच उपरांत आरोपी गोपाल दत्त भट्ट पर लगाए गए आरोप सही पाये गये।

न्यायिक अभिरक्षा में हो गई जेल

विवेचक क्षेत्राधिकारी नैनीताल विभा दीक्षित के निर्देशन में चौकी प्रभारी खैरना एसआई दिलीप कुमार व कांस्टेबल प्रयाग जोशी द्वारा उपरोक्त अभियोग में वांछित अभियुक्त गोपाल दत्त भट्ट पुत्र शिवदत्त भट्ट निवासी ग्राम धारी, हरतोलाको गिरफ्तार कर माननीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया। न्यायालय के आदेशानुसार आरोपी को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा गया है।

क्या होती है ज्यूडिशियल कस्टडी (Judicial Custody) ?

आरोपी को न्यायालय में पेश किए जाने के बाद मजिस्ट्रेट जब संबंधित को पुलिस को सौंपने की बजाय अपने संरक्षण में रखता है। इसे न्यायिक हिरासत या ज्यूडिशियल क्सटडी कहते हैं। इस हिरासत में भेजे गए व्यक्ति के संरक्षण की जिम्मेदारी मजिस्ट्रेट की होती है। यदि कोई न्यायिक हिरासत में भेजा गया है तो पुलिस को उस मामले में 60 दिन के अंदर अंदर आरोप पत्र पेश करना पड़ता है।

पुलिस कस्टडी और ज्यूडिशियल कस्टडी में अंतर ?

👉 ध्यान देने वाली बात यह है कि पुलिस कस्डटी में आरोपी को थाने में ले जाया जाता है। वहीं न्यायिक हिरासत में आरोपी को जेल में रखा जाता है। वह सिर्फ आरोपी होती है अपराधी नहीं।

📌 यदि पुलिस किसी को हिरासत में लेती है तो नियम अनुसार उस व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश करना जरुरी होता है। दूसरी ओर न्यायिक हिरासत की कोई समय सीमा नहीं होती है। जब तक मामले की जांच चलती है तब तक आरोपी को जेल में रखा जाता है। देखा गया है कई बार न्यायिक प्रक्रिया में देरी से निर्दोष में लंबे समय तक जेल में ही रह जाते हैं।

✒️ अकसर लूट, हत्या या चोरी जैसे अपराधों पर पुलिस आरोपी को अपनी कस्टडी में लेती है। वहीं अन्य तमाम मामलों में जमानत खारिज होने पर आरोपी को न्यायिक हिरासत में ले लिया जाता है।

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Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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