रैलाकोट विद्यालय में ‘भारतीय भाषा समर कैम्प’ का भव्य आयोजन
स्थानीय लोकगीतों और पारंपरिक वाद्यों की सुरीली कार्यशाला
CNE REPORTER, रैलाकोट (अल्मोड़ा)। राजकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (रा०क०उ०मा०वि०) रैलाकोट में ‘भारतीय भाषा समर कैम्प 2026’ के तृतीय दिवस का अत्यंत भव्य और गरिमामय आयोजन किया गया। ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान आयोजित इस विशेष शिविर का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को अपनी समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है। शिविर के तीसरे दिन संगीत, पारंपरिक नृत्य, चित्रकला और देश-विदेश सहित स्थानीय लोक कलाओं पर केंद्रित विविध रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन किया गया, जिसमें छात्राओं ने अभूतपूर्व उत्साह के साथ प्रतिभाग किया।

कैम्प के प्रथम सत्र में मुख्य प्रशिक्षक ज्योति भट्ट एवं बिनीता साह द्वारा छात्राओं को उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक लोकगीतों की विस्तृत जानकारी दी गई। इस दौरान शिक्षिकाओं और छात्राओं ने मिलकर पारंपरिक लोकगीतों का सामूहिक गायन किया, जिससे संपूर्ण विद्यालय परिसर संगीतमय हो उठा। इसके पश्चात श्रीमती बिनीता साह ने चित्रों के माध्यम से देवभूमि उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्रों की विस्तृत जानकारी दी। छात्राओं ने बड़ी ही उत्सुकता और रुचि के साथ हुड़का, ढोल, दमो और मशकबीन (मशकबाजू) जैसे वाद्यों के इतिहास, उनकी बनावट और सांस्कृतिक महत्व को समझा। इसी क्रम में विद्यालय की प्रतिभावान छात्राओं द्वारा सुंदर स्थानीय लोकनृत्य की प्रस्तुति दी गई, जिसने पूरे वातावरण को आनंदमय और जीवंत बना दिया।

राष्ट्रीय एवं स्थानीय लोक कलाओं का अनूठा संगम
कैम्प के द्वितीय सत्र में कला और चित्रकला की विशिष्ट कार्यशाला का आयोजन हुआ। इसमें ज्योति भट्ट ने छात्राओं को भारत के विभिन्न राज्यों की प्रसिद्ध स्थानीय लोक कलाओं जैसे बिहार की ‘मधुबनी’, महाराष्ट्र की ‘वरली’, गुजरात की ‘लिप्पन’ तथा पारंपरिक ‘मण्डला आर्ट’ के बारे में बेहद रोचक ढंग से बारीकियां सिखाया। इसके साथ ही, उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान ‘कुमाऊँनी लोककला’ के अंतर्गत ऐपण, भित्ति चित्र और पिथौरागढ़ की प्रसिद्ध शैलचित्रकला के इतिहास और निर्माण शैली पर विस्तृत प्रकाश डाला गया।
हस्तशिल्प और रचनात्मक कलाकृतियों का व्यावहारिक निर्माण
छात्राओं के व्यावहारिक कौशल को निखारने के लिए कार्यक्रम के अंतिम चरण में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। इसके अंतर्गत श्रीमती बिनीता साह ने छात्राओं को कुमाऊँ की पारंपरिक ऐपण कला के विशिष्ट रूप ‘लक्ष्मी चौकी’ का निर्माण करना सिखाया। छात्राओं ने अत्यंत उत्साहपूर्वक सुंदर ऐपण तैयार किए। वहीं दूसरी ओर, श्रीमती ज्योति भट्ट द्वारा छात्राओं को ग्रीटिंग कार्ड बनाना और उस पर ठप्पे रंग (ब्लॉक प्रिंटिंग) के माध्यम से आकर्षक डिजाइन तैयार करने का हुनर सिखाया गया। बच्चों ने खेल-खेल में अत्यंत सुंदर और कलात्मक ग्रीटिंग कार्ड्स का निर्माण करना सीखा।
कार्यक्रम के सफल समापन पर विद्यालय की प्रधानाध्यापिका कमला बिष्ट ने सभी छात्राओं को संबोधित किया। उन्होंने छात्राओं द्वारा बनाई गई कलाकृतियों और उनकी अद्भुत प्रतिभा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि ऐसे समर कैम्प बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, जो उन्हें आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ अपनी लोक संस्कृति, संगीत और कला की अमूल्य धरोहर से जोड़े रखते हैं। उन्होंने मुख्य प्रशिक्षकों के प्रयासों की सराहना करते हुए सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ तृतीय दिवस के कार्यक्रम के समापन की घोषणा की।
देवभूमि की आत्मा: उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्ययंत्रों का विस्तृत परिचय
शिविर के दौरान इस बात पर विशेष प्रकाश डाला गया कि संगीत सदियों से मानव मन की मनोदशा को बदलने में काफी हद तक कारगर होता रहा है. संसार में लगभग हर भाषा का अपना संगीत और अपने विशिष्ट वाद्ययंत्र व धुनें होती हैं, जिससे उस संस्कृति को समझना आसान हो जाता है. विविधता से भरे हमारे देश में उत्तराखंड राज्य को ‘देवभूमि’ व सांस्कृतिक राज्य माना जाता है। यहाँ के लोक संगीत में वाद्ययंत्र विशेष महत्व रखते हैं, जिनका विस्तृत परिचय छात्राओं को कुछ इस तरह दिया गया:
ढोल: लोक संगीत का महानायक
ढोल को सामान्य ढोलक का ही थोड़ा बड़ा रूप माना जाता है। इसे बजाने वाला कलाकार इसे अपने गले में डालकर एक हाथ से (थाप देकर) और दूसरे हाथ से लकड़ी की छड़ी (डंडी) की मदद से बजाता है, जिससे अत्यंत गूंजती हुई और कर्णप्रिय धुनें निकलती हैं।
दमो: ढोल का अभिन्न साथी
दमो हमेशा ढोल के साथ ही जुगलबंदी में बजाया जाता है। इसे बजाने के लिए दो पतली लकड़ियों या कड़ियों का प्रयोग किया जाता है। उत्तराखंड के तमाम मांगलिक और शुभ कार्यों में ढोल और दमो की यह जोड़ी अनिवार्य रूप से बजाई जाती है।
मशकबाजू (मशकबीन): सुरों का अनूठा थैला
यह एक बैग (थैले) जैसा दिखने वाला वाद्ययंत्र है, जिसमें से तीन बीनों के जरिए धुन निकलती है और एक मुख्य पाइप से फूंक मारकर इसे बजाया जाता है। मशकबीन की बीन बजते ही ऐसा आभास होता है जैसे तीन-चार लोग मिलकर एक साथ सुर साध रहे हों। उत्तराखंड के लोक संगीत में जान फूंकने वाले इस वाद्ययंत्र का यहाँ के पारंपरिक संगीत में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है।
हुड़का: थाप पर थिरकाती लोक संस्कृति
उत्तराखंड के लोक वाद्यों में हुड़का बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके अकेले बजने मात्र से ही उत्तराखंड के लोकगीत और लोकनृत्य पूरे जीवंत हो उठते हैं। इसे बजाने की शैली बेहद अनूठी है—वादक इसे एक हाथ से दबाकर (पकड़कर) और दूसरे हाथ की उंगलियों से इस पर तालमयी थाप देता है। यह वाद्ययंत्र मुख्य रूप से झोड़ा, चौधरी और छपेली जैसे पारंपरिक नृत्यों में बजाया जाता है। गायक अक्सर नृत्य समूह के ठीक बीच में खड़ा होकर इसे बजाता है और नर्तक इसकी थाप की गति पर अपने कदम थिरकाते हैं। सच कहा जाए तो, यदि हुड़का न बजे, तो उत्तराखंड का लोक संगीत अधूरा सा प्रतीत होता है।
अन्य सहायक वाद्ययंत्र और उनका महत्व
इन मुख्य वाद्यों के अतिरिक्त बीन (पुंगी) और बांसुरी जैसे वाद्ययंत्र भी उत्तराखंड के संगीत को पूर्णता और मधुरता प्रदान करते हैं। त्योहारों, स्थानीय मेलों, शुभ प्रसंगों और मांगलिक कार्यों में जब झोड़ा, चांचरी, छपेली और छोलिया नृत्य के दौरान ये सारे वाद्ययंत्र एक साथ गूंजते हैं, तो पूरा माहौल उल्लास और उमंग से भर जाता है।
कार्यशाला में निष्कर्ष रूप में बताया गया कि उत्तराखंड को देवभूमि यूँ ही नहीं कहा जाता; यहाँ के संगीत, नृत्य और उनमें बजने वाले ये पारंपरिक वाद्ययंत्र सीधे देवलोक की अनुभूति कराते हैं, जो संपूर्ण माहौल को मंगलमय बनाकर हर इंसान के हृदय को प्रफुल्लित कर देते हैं।


