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Almora News: सामाजिक ताने—बाने को उकेरती रचनाएं परोसी

—श्री लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब में जमी कवियों की महफिल
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा
श्री लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब अल्मोड़ा में में कवियों की महफिल बैठी। इस कवि गोष्ठी में कवियों ने सामाजिक ताने—बाने, व्यवस्था और सम सामयिक हालातों पर आधारित प्रेरक कविताएं परोसी और कवियों ने खूब तालियां बटोरी। इस मौके पर उपन्यासकार श्याम सिंह कुटौला द्वारा रचित कुमाउंनी नाटक ‘पांच लाप‘ का अतिथियों ने विमोचन किया।

सर्वप्रथम श्री लक्ष्मी भंडार हुक्का क्लब के अध्यक्ष रंगकर्मी राजेन्द्र प्रसाद तिवारी ने आगंतकों का स्वागत किया। इसके बाद चला कविताओं की श्रृंखला। कवियों ने अपनी—अपनी कविताओं को परोसा।मुख्य अतिथि रूप में मौजूद वरिष्ठ कवि, साहित्यकार व गीतकार महेशानंद गौड़ ने अपनी कर्मस्थली अल्मोड़ा से जुड़े संस्मरणों को साझा किया। उन्होंने अपनी कविता पाठ करते हुए कहा— ‘दर्द दुख और आसुओं की है कहानी जिंदगी, बुझती चिता की राख जैसी है जिंदगी। किससे कहें दामन हमारा फूलों सा महका …भी। सहरा के शोले सी खुद ही मिटानी जिंदगी।’ इससे पहले हुक्का क्लब के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद तिवारी व गोष्ठी के अध्यक्ष प्रो. देवसिंह पोखरिया ने मुख्य अतिथि महेशानंद गौड़ का शाॅल ओढाकर स्वागत किया।

रंगकर्मी दीवान कनवाल ने कवि महेशानंद गौड़ के गीत ‘डाना रूनै रयूं, मैं काना रूंन रयूं। इकैलि पराणि ल्हिी, कां कां नि गयूं’ का गायन किया। वरिष्ठ कवि एवं उपन्यासकार श्याम सिंह कुटौला ने अपनी पंक्तियां सुनाते हुए कहा- ‘हम मनुज हैं इस धरा के, तुम निरा जड़ मत समझना।’ कवि नवीन सिंह बिष्ट ने ‘सांझ की पलकें झुकी दिनकर गए अवसान को, हिमशिखर रक्तिम हुए, मानो लली वृषभानु हो।’ सुनाया।

कवि डाॅ. महेंद्र सिंह महरा ‘मधु’ ने ‘लोग मिलनै रईं करार नी ए, मौसम बदलनै गईं बहार नीं एै। घुघुती, पंचमी, हर्याव सब न्हैं गईं, मनक भेटणक त्यार नीं एै।’ आदि पंक्तियां सुनाई। डाॅ. ललित चंद्र जोशी ‘योगी’ ने अपनी कविता ‘मम्मी मोबाइल तैयार रखो तुम, मैं झटपट से आने वाला हूं। तुम तो हो गई बहुत पुरानी, मैं इक्कसवीं सदी वाला हूं।’ सुनाई। कंचन तिवारी ने कहा ‘एक दिनां उ दिगै मुलाकात है गे, नानछीना की बात याद एैगे।’

रंगकर्मी एवं वरिष्ठ कवि त्रिभुवन गिरी महाराज ने आंचलिक परिवेश की महिलाओं की स्थिति को दशाते हुए अपनी कविता यूं कही-‘कहीं कुछ दिन में आएंगे प्रियतम, आश लगाई बैठी होगी..क्या पहचान प्रिया की होगी।’ हिंदी एवं कुमाउनी की वरिष्ठ कवियित्री प्रो. दिवा भट्ट ने ‘अब तो मौसम रोज हवा पर शक करता है, सहम समेटे हवा उम्मीदें चुपके चुपके, चलो तुम्हारा मौन कुरेंदे चुपके चुपके।’ सुनाई।

अध्यक्षता करते हुए हिंदी एवं कुमाउंनी के विद्वान प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कवि गोष्ठी में कवियों द्वारा पढ़ी गई रचनाओं पर समीक्षा की। उन्होंने कहा कि गोष्ठी में पढ़ी गई रचनाओं में दर्शन से लेकर समसामयिक परिस्थितियां दिखाई देती हैं। कवियों ने बखूबी ढंग से कविताओं में अपने समाज को बुना है। उन्होंने अपनी कविता का पाठ करते हुए कहा— ‘रंगमहल के रंगमहल में, साथी मुझको भूल न जाना रे।’

इस मौके पर उपन्यासकार श्याम सिंह कुटौला द्वारा रचित कुमाउंनी नाटक ‘पांच लाप‘ का अतिथियों ने विमोचन किया। संचालन डाॅ. महेंद्र सिंह महरा ‘मधु‘ ने किया जबकि अंत में संस्थाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद तिवारी ने सभी का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर पहरू के संपादक डा. हयात सिंह रावत, दीपक कार्की, विनीत बिष्ट, धीरज साह, प्रभात लाल साह गंगोला, ललित मोहन साह, बब्बन उप्रेती, नारायण सिंह थापा, अर्जुन नयाल, शिब्बू नयाल, कंचन तिवारी, अजय साह, शरद साह, भरत गोस्वामी आदि संस्था के सदस्य एवं साहित्यकार मौजूद रहे।

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