विशेष आलेख : उत्तराखंड में पाँचवीं अनुसूची और Tribal Status
पलायन, सिकुड़ती खेती, बदलती जमीन और कमजोर होते गांवों के बीच पाँचवीं अनुसूची और जनजातीय अधिकारों पर गंभीर संवैधानिक विमर्श क्यों जरूरी है?
✍️ संपादकीय टिप्पणी :
उत्तराखंड में पाँचवीं अनुसूची और Tribal Status: कुछ लेख केवल पढ़े नहीं जाते, वे भीतर एक सवाल छोड़ जाते हैं। डॉ. विक्रम सिंह माहोड़ी का यह आलेख भी ऐसा ही एक प्रयास है। उत्तराखंड के पहाड़ को हम अक्सर उसकी खूबसूरत वादियों, लोकसंस्कृति और परंपराओं के रूप में देखते हैं, लेकिन इन सबके पीछे छिपे उस बड़े प्रश्न पर कितनी गंभीरता से बात करते हैं—क्या आने वाली पीढ़ियों के लिए पहाड़ की जमीन, संस्कृति, पहचान और सामाजिक अस्तित्व सुरक्षित रह पाएगा?
उत्तराखंड एकता मंच से जुड़े डॉ. विक्रम सिंह माहोड़ी ने इस आलेख में कुमाउनी-गढ़वाली समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को पाँचवीं अनुसूची, भूमि-अधिकार, जल-जंगल-जमीन, पलायन, स्थानीय स्वशासन और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे व्यापक सवालों से जोड़कर देखने का प्रयास किया है।

यह आलेख किसी निष्कर्ष को पाठक पर थोपने के बजाय कुछ ऐसे प्रश्न सामने रखता है, जिन पर आज उत्तराखंड के हर उस व्यक्ति को गंभीरता से सोचना चाहिए, जिसके लिए पहाड़ केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसकी जड़ें और उसकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है।
क्या कुमाउनी और गढ़वाली समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलना पहाड़ के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है? क्या पाँचवीं अनुसूची जैसे संवैधानिक प्रावधान उत्तराखंड की विशिष्ट भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में कोई नई राह खोल सकते हैं? और सबसे बड़ा सवाल—अगर आज पहाड़ की जमीन, गांव और संस्कृति बदल रही है, तो कल हमारे पास बचाने के लिए क्या बचेगा?
इन सवालों के उत्तर पाठक स्वयं तलाशें। प्रस्तुत है डॉ. विक्रम सिंह माहोड़ी का यह विचारोत्तेजक आलेख –

उत्तराखंड में फिफ्थ शेड्यूल और ट्राइबल स्टेटस क्यों बन सकता है पहाड़ के अस्तित्व की ढाल?
उत्तराखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि हिमालय की गोद में विकसित हुई एक विशिष्ट सभ्यता, संस्कृति और जीवन-पद्धति है। यहाँ की पहचान केवल पहाड़ों से नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, लोकभाषाओं, परंपराओं और सामुदायिक जीवन-पद्धति के ताने-बाने से बुनी गई है, लेकिन आज इसी पहचान के सामने अनेक गंभीर चुनौतियाँ खड़ी हैं।
पलायन तीव्र गति से बढ़ रहा है। खेती सिकुड़ रही है। जमीन का स्वरूप बदल रहा है। प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है और पहाड़ के गांवों का सामाजिक ढांचा छिन्न-भिन्न हो रहा है। ऐसे समय में फिफ्थ शेड्यूल और ट्राइबल स्टेटस के विमर्श को केवल राजनीतिक नारे के रूप में देखना उत्तराखंड की वास्तविक परिस्थितियों और हकीकत को नजरअंदाज कर सच्चाई से मुंह मोड़ना प्रतीत होता है। यह बहस मूलतः इस प्रश्न से जुड़ी है—
“क्या पहाड़ के लोगों को अपनी जमीन, संसाधनों, संस्कृति और भविष्य की रक्षा के लिए संविधान द्वारा उपलब्ध विशेष संरक्षण मिलना चाहिए?”

पाँचवीं अनुसूची: केवल आरक्षण नहीं, संस्कृति और ऐतिहासिक अधिकारों का संवैधानिक कवच
पाँचवीं अनुसूची केवल आरक्षण नहीं, अपितु संस्कृति एवं ऐतिहासिक अधिकारों के संरक्षण का संवैधानिक कवच है। संविधान का अनुच्छेद 244(1) पाँचवीं अनुसूची के माध्यम से अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन की विशेष व्यवस्था करता है। अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने की संवैधानिक प्रक्रिया राष्ट्रपति के आदेश से होती है। पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण और अन्य कानूनों के अनुप्रयोग से संबंधित विशेष शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
यानी पाँचवीं अनुसूची का मूल उद्देश्य केवल सरकारी योजनाओं में अतिरिक्त लाभ देना नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य है— “भूमि का संरक्षण, स्थानीय हितों की रक्षा और जनजातीय समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक हितों की सुरक्षा।”
उपरोक्त परिस्थितियों में उत्तराखंड के संदर्भ में पाँचवीं अनुसूची की चर्चा को गंभीरतापूर्वक समझना आवश्यक है।

उत्तराखंड की परिस्थितियाँ क्यों मांगती हैं अलग दृष्टिकोण?
उत्तराखंड के पहाड़ी भू-भाग का प्रशासनिक मॉडल मैदानी क्षेत्र की अपेक्षा भिन्न है क्योंकि यहाँ—
- सीमित कृषि योग्य भूमि है,
- बड़े वन क्षेत्र एवं पर्वतीय पारिस्थितिकी हैं,
- पर्वतीय क्षेत्रों के ग्रामीण क्षेत्र भौगोलिक रूप से दुर्गम हैं,
- सीमावर्ती क्षेत्रों का रणनीतिक महत्व है,
- रोजगार के सीमित अवसर हैं,
- पलायन ने गांवों की जनसांख्यिकी गंभीर रूप से प्रभावित की है,
- भूमि पर बाहरी स्वामित्व का प्रश्न लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
दूसरी ओर, उत्तराखंड में पहले से ही संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजातियाँ हैं। 2011 की जनगणना में राज्य की ST आबादी 2,91,903 दर्ज की गई थी और इसमें भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू जैसी जनजातियाँ शामिल हैं। इसलिए उत्तराखंड में जनजातीय अधिकारों की बहस कोई काल्पनिक विषय नहीं है।
अतः एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था पहाड़ की बदलती परिस्थितियों के लिए पर्याप्त है या नहीं?
“सबसे ज्वलंत मुद्दा जल, जंगल और जमीन का है।”

जल, जंगल और जमीन: पहाड़ के अस्तित्व का सबसे बड़ा सवाल
उत्तराखंड में जमीन सिर्फ जमीन नहीं है। वह किसी परिवार की आर्थिक सुरक्षा है।
वह गांव की सामाजिक संरचना है। वह पूर्वजों की विरासत है और पहाड़ की आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का आधार है। जब स्थानीय आबादी रोजगार और शिक्षा के लिए बाहर जाती है और दूसरी ओर जमीन का आर्थिक मूल्य बढ़ता है, तो भूमि-सुरक्षा का प्रश्न और गंभीर हो जाता है। यहीं से पाँचवीं अनुसूची की बहस अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि विकास के नाम पर स्थानीय समाज ही अपनी जमीन और संसाधनों से धीरे-धीरे दूर हो जाए, तो उस विकास का अंतिम लाभ किसे मिलेगा?
आज यह प्रश्न न केवल सरकार, अपितु पूरे समाज से पूछा जाना चाहिए।
क्या पाँचवीं अनुसूची पहाड़ को बाहरी प्रभाव से बचा सकती है?
यहाँ भावनात्मक दावे के बजाय संवैधानिक वास्तविकता समझना जरूरी है। पाँचवीं अनुसूची स्वतः पूरे राज्य पर लागू नहीं हो जाती। अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया और निर्धारित मानदंडों का परीक्षण आवश्यक है।
केंद्र के अनुसार अनुसूचित क्षेत्र निर्धारित करने में जनजातीय आबादी की प्रमुखता, क्षेत्र की सघनता एवं आकार, प्रशासनिक व्यवहार्यता, भौगोलिक दुर्गमता, विशिष्ट संस्कृति और आर्थिक पिछड़ापन जैसे मानदंड महत्वपूर्ण हैं। इसलिए उत्तराखंड के लिए वास्तविक लड़ाई केवल यह नहीं है कि फिफ्थ शेड्यूल लागू करो, बल्कि यह भी प्रमाणित करना होगा कि कहाँ, क्यों, किन क्षेत्रों में और किस संवैधानिक मॉडल के तहत विशेष संरक्षण आवश्यक है। यही आंदोलन को भावनात्मक मांग से उठाकर संवैधानिक मांग बना सकता है।

Fifth Schedule और Tribal Status एक ही बात नहीं है
इस विमर्श में यह महत्वपूर्ण अंतर समझना भी जरूरी है। Tribal Status किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में संवैधानिक मान्यता देने से संबंधित है, जबकि फिफ्थ शेड्यूल मुख्यतः अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और वहाँ रहने वाले जनजातीय समुदायों के हितों की सुरक्षा से संबंधित है। इसलिए दोनों मांगों को एक-दूसरे का पर्याय मानना संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा, लेकिन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध अवश्य है—
“जनजातीय समुदायों के अधिकार और उनके क्षेत्रों की भूमि-संसाधन सुरक्षा।”
ग्रामसभा की शक्ति—लोकतंत्र की जड़ तक अधिकार
पाँचवीं अनुसूची और उससे जुड़े कानूनी ढाँचे पर चर्चा करते समय स्थानीय स्वशासन का प्रश्न भी सामने आता है।
जिस समाज की जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णय हो रहा है, उस समाज की आवाज नीति और निर्णय प्रक्रिया में कितनी मजबूत है? यह प्रश्न उत्तराखंड के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि पहाड़ की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक संरचना को दिल्ली या देहरादून के दफ्तरों में बैठे लोग पूरी तरह नहीं समझ सकते। जिस जमीन पर पीढ़ियों ने जीवन बिताया है, उसके भविष्य पर सबसे पहली आवाज उसी समाज की होनी चाहिए।
पहाड़ को संग्रहालय नहीं, अधिकार चाहिए
उत्तराखंड की संस्कृति को केवल पर्यटन के पोस्टर पर दिखाना पर्याप्त नहीं है। झोड़ा, छपेली, जागर, चांचरी, लोकभाषाएँ और पारंपरिक जीवन-पद्धति तभी जीवित रहेंगी, जब उनसे जुड़ा समाज अपनी जमीन और आजीविका के साथ अपने क्षेत्र में रह सकेगा।
यदि गांव खाली होते गए, खेत बंजर होते गए और युवा पीढ़ी स्थायी रूप से बाहर चली गई, तो केवल सांस्कृतिक उत्सव आयोजित करने से पहाड़ की संस्कृति नहीं बचाई जा सकती। संस्कृति की रक्षा का पहला आधार है—स्थानीय समाज का अपने भौगोलिक क्षेत्र में सुरक्षित रहना।
क्या समाधान केवल पाँचवीं अनुसूची है?
लेकिन पाँचवीं अनुसूची पर गंभीर विचार करना समाधान की व्यापक खोज का एक हिस्सा हो सकता है। उत्तराखंड को एक ऐसी समग्र नीति की आवश्यकता है, जिसमें—
भू-कानून + वनाधिकार + स्थानीय स्वशासन + रोजगार + पलायन रोकथाम + सांस्कृतिक संरक्षण + पर्यावरण संरक्षण + जनजातीय अधिकार
एक-दूसरे से जुड़े हों।
किसी एक कानून से पहाड़ की सभी समस्याएँ समाप्त नहीं होंगी, लेकिन यदि संवैधानिक सुरक्षा के उपलब्ध साधनों का प्रभावी उपयोग नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे सवाल करेंगी—
जब जमीन और गांव बदल रहे थे, तब हमने क्या किया?
अब चाहिए संवैधानिक अध्ययन, राजनीतिक चुप्पी नहीं
फिफ्थ शेड्यूल और ट्राइबल स्टेटस के प्रश्न पर उत्तराखंड में व्यापक और निष्पक्ष अध्ययन होना चाहिए।
इसके लिए विशेषज्ञों, संविधानविदों, इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, जनजातीय प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदायों को साथ लेकर अध्ययन किया जा सकता है।
सवाल स्पष्ट होने चाहिए—
क्या उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पाँचवीं अनुसूची के मानदंडों की समीक्षा आवश्यक है?
क्या वर्तमान भू-कानून स्थानीय लोगों के हितों की पर्याप्त रक्षा कर रहे हैं?
क्या वनाधिकार कानून का वास्तविक लाभ पात्र समुदायों तक पहुंच रहा है?
क्या पलायन और भूमि-परिवर्तन के बीच कोई गंभीर संबंध बन चुका है?
क्या स्थानीय समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों के निर्णयों में पर्याप्त अधिकार प्राप्त हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या उत्तराखंड की विशिष्ट परिस्थितियों के लिए संविधान के भीतर कोई अधिक प्रभावी संरक्षण मॉडल विकसित किया जा सकता है?
निष्कर्ष: पहाड़ का भविष्य आज तय होगा
उत्तराखंड को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं, जिसमें पहाड़ की जमीन किसी और की हो जाए, रोजगार के लिए पहाड़ का युवा बाहर चला जाए और अंततः गांव केवल पर्यटन के नक्शे पर दिखाई दें।
उत्तराखंड को ऐसा विकास चाहिए, जिसमें—
पहाड़ का पानी पहाड़ के काम आए,
पहाड़ का जंगल स्थानीय जीवन को सहारा दे,
पहाड़ की जमीन स्थानीय पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहे,
और पहाड़ की संस्कृति केवल किताबों में नहीं, गांवों में जीवित रहे।
इसीलिए पाँचवीं अनुसूची की बहस को न तो बिना अध्ययन के स्वीकार करना चाहिए और न ही बिना चर्चा के खारिज। इसे संविधान, इतिहास, आंकड़ों और जमीन पर मौजूद वास्तविक परिस्थितियों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए, क्योंकि यह सवाल केवल किसी एक संगठन, समुदाय या राजनीतिक दल का नहीं है।
प्रश्न यह है—
“क्या आने वाली पीढ़ियों के लिए पहाड़ बचेगा?”
यदि फिफ्थ शेड्यूल एवं ट्राइबल स्टेटस सहित संवैधानिक संरक्षण का कोई रास्ता उत्तराखंड के स्थानीय समाज, भूमि और संसाधनों की रक्षा को मजबूत कर सकता है, तो उस रास्ते पर गंभीर संवैधानिक विमर्श शुरू करना अब समय की अनिवार्य मांग है।
पहाड़ की पहचान बचानी है तो पहाड़ के अधिकारों की बात करनी होगी और अधिकारों की लड़ाई को संविधान के भीतर, प्रमाण, तथ्यों और तर्क के साथ लड़ना होगा।



