प्रदेशभर में फार्मासिस्टों ने बांधी काली पट्टी, सरकार से पूछा—कब बहाल होंगे 391 पद?
सीएनई रिपोर्टर, देहरादून। उत्तराखंड में पांच लंबित मांगों को लेकर डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का चरणबद्ध आंदोलन आज 1 सितंबर से शुरू हो गया है। प्रदेशभर के सरकारी अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और विभागीय कार्यालयों में फार्मासिस्ट काली पट्टी बांधकर काम कर रहे हैं और 15 सितंबर तक इसी तरह शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराएंगे। आंदोलन के केंद्र में स्वास्थ्य उपकेंद्रों में समाप्त किए गए 391 फार्मासिस्ट पदों की बहाली है। इसके साथ ही 10 वर्ष की सेवा पर पदोन्नत पद का वेतनमान, फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन-2015 लागू करने, चिकित्सक विहीन क्षेत्रों में फार्मासिस्टों को आवश्यक दवा उपलब्ध कराने का अधिकार देने तथा चारधाम यात्रा ड्यूटी से जुड़े लंबित देयकों एवं व्यवस्थाओं में सुधार की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई है।
एसोसिएशन का कहना है कि ये मांगें केवल फार्मासिस्ट संवर्ग के सेवा हित से जुड़ी नहीं हैं, बल्कि विशेषकर पर्वतीय और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से भी सीधे जुड़ी हैं।
सबसे बड़ा मुद्दा 391 पदों की बहाली का, कैडर घटने से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर असर का दावा
फार्मासिस्टों के आंदोलन में सबसे प्रमुख मुद्दा स्वास्थ्य उपकेंद्रों के लिए पूर्व में सृजित 391 फार्मासिस्ट पदों को पुनः क्रियाशील करना है।
एसोसिएशन के अनुसार राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए दूरस्थ एवं दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाली ग्रामीण आबादी तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए फार्मासिस्ट पद सृजित किए गए थे। संगठन का कहना है कि इन पदों को स्थगित किए जाने से ग्रामीण क्षेत्रों में दवा एवं प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता प्रभावित हो रही है।
आज की रिपोर्ट में एसोसिएशन ने दावा किया कि फार्मासिस्ट कैडर की संख्या 1562 से घटाकर 963 कर दी गई है। संगठन का कहना है कि 391 पदों की बहाली को लेकर कार्मिक विभाग की स्वीकृति और 35 से अधिक विधायकों का लिखित समर्थन होने के बावजूद शासन स्तर पर निर्णय लंबित है।
एसोसिएशन का तर्क—पदों की बहाली से ग्रामीण क्षेत्रों को सीधा लाभ
मांग-पत्र में भी एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि पर्वतीय एवं दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य उपकेंद्रों की वास्तविक जरूरत को देखते हुए इन पदों को पुनः क्रियाशील किया जाना जरूरी है।
संगठन ने सरकार से इस संबंध में तैयार प्रस्ताव को आगे बढ़ाकर कैबिनेट से स्वीकृति दिलाने की मांग की है।
10 साल की सेवा के बाद भी पदोन्नति का इंतजार, वेतनमान को लेकर नाराजगी
फार्मासिस्टों की दूसरी बड़ी मांग 10 वर्ष की सेवा पूर्ण करने पर पदोन्नत पद का वेतनमान दिए जाने से जुड़ी है।
एसोसिएशन का कहना है कि चिकित्सा विभाग में फार्मासिस्ट अधिकारियों के लिए पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हैं। इसके चलते कई फार्मासिस्टों को लंबे समय तक एक ही प्रारंभिक पद पर सेवाएं देनी पड़ती हैं।
मांग-पत्र में ऐसे कर्मचारियों का उल्लेख किया गया है, जो 34-35 वर्ष तक सेवा करने के बाद भी प्रथम पदोन्नति से वंचित रह जाते हैं।
संगठन ने पूर्व में लागू व्यवस्था के अनुरूप पात्र फार्मासिस्टों को पदोन्नत पद का वेतनमान दिए जाने तथा नॉन-फंक्शनल वेतनमान को एमएसीपी की गणना में इग्नोर किए जाने की मांग की है।
आज की आंदोलन संबंधी रिपोर्ट में भी फार्मासिस्ट नेताओं ने 10, 16 और 26 वर्ष की सेवा पर पूर्व की भांति पदोन्नत वेतनमान दिए जाने की मांग प्रमुखता से उठाई है।
फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन-2015 लागू करने पर जोर
फार्मासिस्टों की तीसरी मांग सीधे मरीजों की दवा संबंधी सुरक्षा और फार्मासिस्ट की पेशेवर भूमिका से जुड़ी है।
एसोसिएशन ने राज्य में Pharmacy Practice Regulation-2015 के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की है।
संगठन ने अपने मांग-पत्र में दवाओं के अतार्किक उपयोग, ओवरडोज और इसके कारण बढ़ रहे ड्रग रेजिस्टेंट मामलों का हवाला दिया है। उसका कहना है कि मरीजों को दवाओं के सही उपयोग की जानकारी देने और स्वास्थ्य सेवाओं में फार्मासिस्ट की भूमिका को मजबूत करने के लिए रेगुलेशन को लागू किया जाना आवश्यक है।
हर चिकित्सालय में काउंसलिंग कक्ष की मांग
एसोसिएशन ने रेगुलेशन के अनुरूप प्रत्येक चिकित्सालय में मरीजों की काउंसलिंग के लिए अलग काउंसलिंग कक्ष बनाए जाने की मांग भी की है।
यानी संगठन का जोर केवल दवा वितरण तक सीमित भूमिका पर नहीं, बल्कि मरीजों को दवाओं के सही इस्तेमाल के बारे में मार्गदर्शन देने की जिम्मेदारी को संस्थागत रूप देने पर भी है।
डॉक्टर नहीं तो मरीज को दवा कौन देगा? फार्मासिस्टों ने मांगा कानूनी अधिकार
आंदोलन की चौथी मांग पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी बेहद महत्वपूर्ण मांग है।
एसोसिएशन के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों की कई चिकित्सा इकाइयों में डॉक्टर प्रशिक्षण, सामान्य अवकाश, चिकित्सा अवकाश, उपार्जित अवकाश, चारधाम यात्रा ड्यूटी अथवा सरकारी कार्य से बाहर होने के कारण अनुपस्थित रहते हैं।
ऐसे में दूरदराज के क्षेत्रों में नियमित उपचार लेने वाले मरीजों के सामने दवा उपलब्ध होने की समस्या पैदा होती है।
ओडिशा और असम की तर्ज पर व्यवस्था की मांग
फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने मांग की है कि ओडिशा और असम में प्रचलित व्यवस्था की तर्ज पर चिकित्सक की अनुपस्थिति में सूचीबद्ध मरीजों को सूचीबद्ध दवाएं उपलब्ध कराने के लिए फार्मासिस्ट अधिकारियों को अधिकृत किया जाए।
आज की रिपोर्ट में भी संगठन ने चिकित्सक विहीन क्षेत्रों में फार्मासिस्टों को प्राथमिक इलाज और दवा वितरण का कानूनी अधिकार देने की मांग दोहराई है।
चारधाम ड्यूटी का बकाया भुगतान और सुविधाएं बढ़ाने की मांग
पांचवीं मांग चारधाम यात्रा ड्यूटी पर तैनात फार्मासिस्टों के लंबित देयकों के भुगतान और ड्यूटी व्यवस्था में सुधार को लेकर है।
एसोसिएशन का कहना है कि विषम परिस्थितियों में चारधाम यात्रा मार्ग पर सेवाएं देने वाले फार्मासिस्टों को उनके देयकों का भुगतान समय पर किया जाना चाहिए।
इसके साथ संगठन ने मांग की है कि यात्रा ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों के लिए—
- उचित आवास की व्यवस्था हो,
- भोजन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए,
- लंबित ड्यूटी देयकों का तत्काल भुगतान हो,
- प्रोत्साहन भत्ते की दरों की समीक्षा की जाए।
आज की रिपोर्ट में भी यात्रा ड्यूटी पर तैनात कर्मचारियों के बकाया देयकों के तत्काल भुगतान की मांग को प्रमुखता से उठाया गया है।
आज से शुरू हुआ दूसरा चरण, 15 सितंबर तक चलेगा काली पट्टी अभियान
फार्मासिस्ट एसोसिएशन के आंदोलन का पहला चरण 17 से 31 अगस्त तक पत्र लेखन अभियान के रूप में चलाया गया था। इसमें संगठन के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने विभागीय अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और महासंघ के पदाधिकारियों को मांगों के समर्थन में पत्र भेजे।
अब 1 सितंबर से आंदोलन का दूसरा चरण शुरू हो गया है।
इस चरण में 15 सितंबर तक प्रदेशभर के फार्मासिस्ट काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करते हुए अपने कार्यों का निर्वहन करेंगे। आज प्रदेश के सरकारी अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों और कार्यालयों में इसका असर दिखाई दिया।
15 सितंबर के बाद क्या होगा?
एसोसिएशन ने साफ किया है कि 15 सितंबर तक मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में आंदोलन को और आगे बढ़ाया जाएगा।
मांग-पत्र के अनुसार दूसरे चरण के बाद संगठन समीक्षा बैठक करेगा और उसमें आंदोलन के अगले चरण की रणनीति तय की जाएगी।
यानी फिलहाल आंदोलन का यह चरण शांतिपूर्ण है, लेकिन सरकार की ओर से ठोस निर्णय नहीं होने पर फार्मासिस्ट संगठन आगे आंदोलन को और व्यापक रूप दे सकता है।
फार्मासिस्टों की पांच मांगें—एक नजर में
1. 391 पद बहाल हों
स्वास्थ्य उपकेंद्रों के लिए पूर्व में सृजित और बाद में स्थगित किए गए 391 फार्मासिस्ट पदों को पुनः क्रियाशील किया जाए।
2. पदोन्नत वेतनमान मिले
10 वर्ष की सेवा पर पदोन्नत पद का वेतनमान देने के साथ 10, 16 और 26 वर्ष की सेवा पर पूर्व व्यवस्था के अनुरूप लाभ देने की मांग।
3. फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन-2015 लागू हो
प्रावधानों को लागू कर चिकित्सालयों में मरीजों की काउंसलिंग व्यवस्था विकसित की जाए।
4. डॉक्टर विहीन क्षेत्रों में फार्मासिस्टों को अधिकार मिले
ओडिशा और असम की तर्ज पर निर्धारित परिस्थितियों में फार्मासिस्टों को मरीजों को सूचीबद्ध दवाएं उपलब्ध कराने का कानूनी अधिकार दिया जाए।
5. चारधाम ड्यूटी के भुगतान और सुविधाओं में सुधार हो
लंबित देयकों का भुगतान, उचित आवास-भोजन और प्रोत्साहन भत्ते की दरों की समीक्षा की जाए।
अब गेंद सरकार के पाले में
डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन उत्तराखंड के इस चरणबद्ध आंदोलन में सबसे बड़ा सवाल 391 पदों की बहाली का है, लेकिन संगठन ने इसे केवल एक सेवा-संबंधी मांग के रूप में नहीं रखा है। उसका तर्क है कि पर्वतीय राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों में फार्मासिस्टों के पदों की संख्या और उनकी भूमिका का सीधा संबंध दूरस्थ क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं से है।
वहीं पदोन्नत वेतनमान और लंबे समय से लंबित सेवा संबंधी मामलों को लेकर फार्मासिस्टों में नाराजगी है। दूसरी तरफ फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन, डॉक्टर विहीन क्षेत्रों में दवा वितरण का अधिकार और चारधाम ड्यूटी के भुगतान जैसी मांगें संगठन की कार्य परिस्थितियों से जुड़ी हैं।
फिलहाल 15 सितंबर तक फार्मासिस्ट काली पट्टी बांधकर सरकार के सामने अपनी मांगें रखेंगे। इसके बाद यदि समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठे तो आंदोलन का अगला चरण क्या होगा, इस पर संगठन की समीक्षा बैठक में फैसला लिया जाएगा।





