2 घंटे का सफर 7-8 घंटे में, जगह-जगह जाम में फंसे यात्री
पुलिस दिनभर संभालती रही मोर्चा, लेकिन भीड़ के आगे छोटी पड़ गई व्यवस्था
नैनीताल पुलिस की श्रद्धालुओं और पर्यटकों से सहयोग की अपील
CNE REPORTER, हल्द्वानी। कैंचीधाम की बढ़ती लोकप्रियता उत्तराखंड के लिए धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से भले ही बड़ी उपलब्धि हो, लेकिन अब यही बढ़ती भीड़ पहाड़ के आम यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बनती जा रही है। खासकर सप्ताहांत और लगातार छुट्टियों के दौरान कैंचीधाम, भवाली, भीमताल से लेकर गरमपानी-खैरना और आगे अल्मोड़ा की ओर जाने वाले मार्गों पर यातायात का दबाव इस कदर बढ़ रहा है कि सामान्य दो से ढाई घंटे का सफर कई बार सात से आठ घंटे तक खिंच जा रहा है।
2 अक्टूबर की छुट्टी और वीकेंड के बीच भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। कैंचीधाम में उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ का असर आसपास के मार्गों पर पड़ा और अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, रानीखेत समेत पर्वतीय क्षेत्रों से हल्द्वानी आने-जाने वाले यात्रियों को जगह-जगह यातायात जाम का सामना करना पड़ा।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कैंचीधाम और भीमताल के बीच यात्रियों को तीन घंटे से अधिक समय तक जाम में फंसे रहना पड़ा। इसका असर हल्द्वानी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, रानीखेत और अन्य पर्वतीय मार्गों की आवाजाही पर भी पड़ा।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल की एक मीडिया रिपोर्ट में अल्मोड़ा से हल्द्वानी की सामान्य यात्रा में लगने वाले समय के मुकाबले आठ घंटे तक का सफर करने की स्थिति सामने आई थी।
जाम में फंसे यात्रियों की परेशानी—“आखिर कब पहुंचेगा गंतव्य?”
2 अक्टूबर को सड़क पर फंसे यात्रियों के लिए यह केवल कुछ मिनट या एक-दो घंटे की देरी नहीं थी।
अल्मोड़ा, बागेश्वर और पिथौरागढ़ से हल्द्वानी आने वाले अनेक यात्रियों का कहना था कि पर्वतीय मार्ग पर कैंचीधाम और आसपास के क्षेत्रों में यातायात का दबाव बढ़ने के बाद यात्रा का पूरा कार्यक्रम बिगड़ गया।
किसी को बस पकड़नी थी, किसी को ट्रेन, किसी को अस्पताल पहुंचना था तो कोई जरूरी काम के लिए हल्द्वानी आ रहा था।
वाहनों की लंबी कतारों में फंसे चालक और यात्री व्यवस्था को कोसते नजर आए। लोगों का कहना था कि यदि हर वीकेंड और छुट्टी के दिन यही स्थिति बननी है तो पहाड़ के स्थानीय लोगों के लिए आवागमन की अलग और प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं की जाती?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कैंचीधाम जाने वाला पर्यटक कुछ घंटे या एक दिन के लिए यहां आता है, लेकिन अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, रानीखेत और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों का स्थानीय व्यक्ति इसी सड़क से रोजमर्रा की जिंदगी के जरूरी कामों के लिए आवागमन करता है।
पुलिस का पक्ष—“सुबह से यातायात व्यवस्था संभालने में जुटी है पुलिस”
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में नैनीताल पुलिस का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
नैनीताल पुलिस के अनुसार वीकेंड पर जिले के प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों कैंचीधाम, नैनीताल, भीमताल और मुक्तेश्वर की ओर बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचे। वाहनों की संख्या बढ़ने के कारण विभिन्न मार्गों पर यातायात का दबाव बना हुआ था।
SSP डॉ. मंजूनाथ टी.सी. के निर्देशन में नैनीताल पुलिस ने प्रमुख मार्गों और पर्यटन स्थलों पर पुलिस बल तैनात किया तथा सुबह से ही यातायात व्यवस्था को सुचारु और सुरक्षित बनाए रखने के प्रयास किए।
पुलिस के अनुसार संबंधित थाना, चौकी, CPU और ट्रैफिक प्रभारी सहित पुलिसकर्मी जगह-जगह यातायात को व्यवस्थित करने में जुटे रहे। साथ ही पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आवश्यक दिशा-निर्देश भी दिए जाते रहे।
अर्थात यह कहना सही नहीं होगा कि जाम के दौरान पुलिस मौके से नदारद थी। पुलिसकर्मी लगातार सड़क पर यातायात संभालते और वाहनों को नियंत्रित करते नजर आए।
कैंचीधाम में शटल सेवा और कतार व्यवस्था
नैनीताल पुलिस के अनुसार कैंचीधाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने को देखते हुए उनकी सुविधा और सुरक्षा के लिए यातायात डायवर्जन व्यवस्था लागू की गई।
श्रद्धालुओं को शटल सेवा के माध्यम से कैंचीधाम भेजने की व्यवस्था की गई और कतारबद्ध तरीके से नीम करोली बाबा के दर्शन कराने की व्यवस्था की गई।
पुलिस का कहना है कि शटल सेवा के माध्यम से श्रद्धालुओं को कैंचीधाम भेजकर सुगम और व्यवस्थित दर्शन कराने का प्रयास किया जा रहा है।
यह व्यवस्था इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यदि हजारों श्रद्धालुओं के निजी वाहन सीधे कैंचीधाम तक पहुंचने लगें तो सड़क पर वाहनों का दबाव और भी बढ़ सकता है।
पुलिस की अपील—धैर्य रखें, ओवरटेकिंग न करें
यातायात के भारी दबाव के बीच नैनीताल पुलिस ने श्रद्धालुओं और पर्यटकों से सहयोग की अपील भी की है।
पुलिस ने कहा है कि श्रद्धालु अपनी निर्धारित कतार में ही चलें और कतार बदलकर दूसरी लाइन में जाने का प्रयास न करें।
वाहन चालकों से अनावश्यक ओवरटेकिंग नहीं करने तथा यातायात दबाव के दौरान धैर्य बनाए रखने की अपील की गई है। जल्दबाजी में लेन बदलने से बचने और पुलिस तथा यातायात कर्मियों के निर्देशों का पालन करने को कहा गया है।
इसके साथ ही सड़क पर अनावश्यक रूप से वाहन रोककर यातायात बाधित न करने तथा वाहनों को निर्धारित पार्किंग स्थल पर ही खड़ा करने की अपील की गई है।
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि सड़क किनारे या प्रतिबंधित स्थानों पर वाहन खड़ा करने से यातायात और अधिक प्रभावित होता है।
पुलिस अपना काम कर रही है, मगर क्या केवल पुलिस से हल होगा संकट?
यहां असली सवाल पुलिस की मुस्तैदी पर नहीं, बल्कि पूरी यातायात व्यवस्था की क्षमता पर है।
पुलिस सड़क पर खड़ी होकर यातायात नियंत्रित कर सकती है।
डायवर्जन कर सकती है।
वाहनों को रोक सकती है।
पार्किंग और शटल व्यवस्था संचालित कर सकती है।
लेकिन जब किसी पर्यटन और धार्मिक स्थल पर एक साथ हजारों वाहन और श्रद्धालु पहुंचने लगें तो सवाल केवल पुलिस बल का नहीं रह जाता।
सवाल सड़क की क्षमता, पार्किंग क्षमता और पूरे यातायात तंत्र की क्षमता का हो जाता है।
2 अक्टूबर की स्थिति ने यही सवाल फिर खड़ा कर दिया है।
समस्या केवल कैंचीधाम की नहीं, पूरे कुमाऊं की है
कैंचीधाम में लगने वाला जाम अक्सर कैंचीधाम तक सीमित नहीं रहता।
यातायात का दबाव भवाली, भीमताल, गरमपानी और खैरना की ओर फैलता है और इसका असर आगे अल्मोड़ा तथा अन्य पर्वतीय मार्गों पर भी दिखाई देता है।
मीडिया रिपोर्ट्स में पिछले कुछ समय के दौरान कैंचीधाम में भारी भीड़ के चलते दो किलोमीटर तक जाम तथा कई घंटों तक वाहन रेंगने की स्थिति सामने आ चुकी है।
सितंबर में भी भारी भीड़ के कारण अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, रानीखेत, धारचूला, बागेश्वर और हल्द्वानी की ओर जाने वाले यात्रियों को परेशानी की खबरें सामने आई थीं।
यानी 2 अक्टूबर कोई अलग-थलग घटना नहीं थी।
यह लगातार उभर रही समस्या का एक और बड़ा उदाहरण है।
स्थानीय यात्रियों के लिए कौन सोचेगा?
कैंचीधाम में आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा मिलनी चाहिए।
पर्यटन बढ़ना चाहिए।
स्थानीय लोगों को रोजगार और व्यापार का लाभ मिलना चाहिए।
लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि पर्यटन के बढ़ते दबाव का सबसे बड़ा बोझ उसी पहाड़ के आम नागरिक को न उठाना पड़े।
कल्पना कीजिए—
एक मरीज को अल्मोड़ा से हल्द्वानी अस्पताल लाया जा रहा है और वह घंटों जाम में फंसा है।
एक विद्यार्थी की परीक्षा है और उसकी बस रास्ते में अटक गई।
किसी व्यक्ति की ट्रेन है और वह समय पर हल्द्वानी नहीं पहुंच पा रहा।
किसी कर्मचारी को जरूरी ड्यूटी पर पहुंचना है।
ऐसे लोगों के लिए घंटों का जाम केवल “ट्रैफिक समस्या” नहीं है।
यह उनके जीवन और जरूरी कामों पर सीधा असर है।
अब स्थायी समाधान की जरूरत
इस समस्या का समाधान केवल हर वीकेंड अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करना नहीं हो सकता।
अब कैंचीधाम और आसपास के पूरे क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक यातायात एवं पर्यटन प्रबंधन योजना की आवश्यकता है।
कैंचीधाम से पर्याप्त दूरी पर बड़े और व्यवस्थित पार्किंग हब विकसित किए जाएं।
बाहरी वाहनों को वहीं रोककर पर्याप्त संख्या में शटल बसों के माध्यम से श्रद्धालुओं को कैंचीधाम पहुंचाया जाए।
भवाली, भीमताल, कैंचीधाम, गरमपानी और खैरना को एक समग्र ट्रैफिक कॉरिडोर के रूप में देखते हुए योजना बनाई जाए।
वीकेंड और बड़े अवकाश से पहले संभावित पर्यटक संख्या का अनुमान लगाकर उसी हिसाब से पार्किंग और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था की जाए।
रीयल टाइम ट्रैफिक सूचना की व्यवस्था हो, ताकि हल्द्वानी या पहाड़ से निकलने वाला व्यक्ति पहले ही जान सके कि आगे किस मार्ग पर कितना यातायात दबाव है।
और सबसे महत्वपूर्ण—आपातकालीन वाहनों के लिए ऐसा कॉरिडोर हो जिससे जाम की स्थिति में एंबुलेंस और अन्य जरूरी वाहन बिल्कुल न रुकें।
आस्था भी रहे, आम आदमी की राह भी खुले
कैंचीधाम की लोकप्रियता को रोकना समाधान नहीं है।
श्रद्धालुओं को रोकना भी समाधान नहीं है।
समाधान है—बढ़ती भीड़ को वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से संभालना।
नैनीताल पुलिस अपनी ओर से यातायात संभालने का प्रयास कर रही है। पुलिसकर्मी सड़क पर मुस्तैद हैं, शटल सेवा चल रही है, डायवर्जन किया जा रहा है और श्रद्धालुओं से लगातार सहयोग की अपील की जा रही है।
लेकिन 2 अक्टूबर की स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब केवल पुलिस के भरोसे इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
जरूरत है सरकार, प्रशासन, पुलिस, परिवहन विभाग, पर्यटन विभाग और स्थानीय निकायों को साथ बैठकर ऐसी व्यवस्था बनाने की, जिसमें—
कैंचीधाम आने वाले श्रद्धालु भी सुरक्षित और सुविधाजनक तरीके से दर्शन कर सकें और अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, रानीखेत तथा पूरे पहाड़ का आम यात्री भी अपने जरूरी काम के लिए समय पर हल्द्वानी पहुंच सके।
क्योंकि सड़क पर घंटों खड़ा हर वाहन केवल एक वाहन नहीं है।
उसमें किसी का मरीज है, किसी का बच्चा है, किसी की नौकरी है, किसी की परीक्षा है और किसी का जरूरी काम।
कैंचीधाम की आस्था का सम्मान जरूरी है, लेकिन पहाड़ के आम आदमी के समय और परेशानी का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।
अब सवाल यह नहीं कि अगली छुट्टी पर जाम को कैसे संभाला जाएगा।
सवाल यह है कि अगली छुट्टी आने से पहले ऐसी स्थायी व्यवस्था कब बनेगी, जिससे जाम पैदा ही न हो?


