संरक्षण की कामयाबी बनी ‘संघर्ष का खतरा’
बाघों की रिकॉर्ड संख्या और मानव-वन्यजीव टकराव की डरावनी तस्वीर
उत्तराखंड में 560 बाघों की रिकॉर्ड संख्या और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में 'ओवरलोड' का विश्लेषण। जानें कैसे संरक्षण की सफलता मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बनी, 60 लोगों की जान गई।
देहरादून: उत्तराखंड, जिसे कभी बाघों की ‘नर्सरी’ कहा जाता था, अब अपनी वहन क्षमता (Carrying Capacity) की अंतिम सीमा पर खड़ा है। वन्यजीव गणना 2023 के अनुसार, राज्य में 560 बाघों की रिकॉर्ड उपस्थिति ने इसे देश के तीसरे सबसे बड़े बाघ राज्य का दर्जा दिया है। यह सफलता जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी लेकर आई है—वह है जगह की कमी (Space Constraint) और इसके चलते मानव-वन्यजीव संघर्ष में विस्फोटक वृद्धि।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) में बाघों का घनत्व आज दुनिया में सबसे अधिक है, लेकिन विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यह ‘ओवरलोड’ अब जंगल की सीमाओं को तोड़कर इंसानी बस्तियों तक पहुँच रहा है, जिसका सीधा परिणाम मानव क्षति के रूप में सामने आ रहा है।

टाइगर इस्टीमेशन 2023: उत्तराखंड में बाघों की विस्फोटक वृद्धि
नवीनतम ‘टाइगर इस्टीमेशन 2023’ की रिपोर्ट उत्तराखंड की गौरवशाली स्थिति को प्रमाणित करती है। देश के उन राज्यों में, जिन्होंने बाघों की संख्या बढ़ाने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है, उत्तराखंड लगातार शीर्ष-3 में अपना स्थान बनाए हुए है।
- कुल आबादी: रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में 560 बाघ दर्ज किए गए हैं।
- कॉर्बेट का रिकॉर्ड: अकेले कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) में 260 बाघ हैं, जो दुनिया के किसी भी टाइगर रिजर्व में पाई जाने वाली सबसे अधिक संख्या है।
- रिजर्व के बाहर: कॉर्बेट को छोड़कर भी, राज्य के अन्य वन क्षेत्रों में लगभग 300 बाघों की प्रभावशाली उपस्थिति है।
भौगोलिक रूप से सीमित और अधिकांशतः पहाड़ी राज्य होने के बावजूद, बाघों की संख्या में यह निरंतर वृद्धि उत्तराखंड के लिए एक असाधारण उपलब्धि है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व: क्षमता से अधिक घनत्व (ओवरलोड)
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कॉर्बेट ही नहीं, बल्कि पूरा उत्तराखंड अब बाघों की आबादी के लिहाज़ से ‘हाउसफुल’ हो चुका है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है:
- क्षेत्रफल की कमी: टाइगर इस्टीमेशन 2023 के आँकड़े बताते हैं कि CTR में बाघ औसतन 5 से 7 वर्ग किलोमीटर के बेहद छोटे क्षेत्र में जीवित रह रहे हैं।
- वैज्ञानिक आवश्यकता: सामान्यतः, एक वयस्क बाघ को शिकार और प्रादेशिक वर्चस्व (Territorial Dominance) के लिए 20-25 वर्ग किलोमीटर के विचरण क्षेत्र की आवश्यकता होती है। कॉर्बेट में यह आवश्यकता पूरी नहीं हो पा रही है।
💬 विशेषज्ञ मत:
WII के पूर्व वैज्ञानिक, टाइगर विशेषज्ञ कमर कुरैशी बताते हैं कि “कॉर्बेट में बाघ बेहद कम घनत्व में भी सफलतापूर्वक सरवाइव कर रहे हैं, जो दर्शाता है कि उनके लिए भोजन (Prey Base) की कोई कमी नहीं है। हालांकि, यह भी स्पष्ट संकेत है कि रिजर्व की वहन क्षमता (Caring Capacity) अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुकी है।”
परिणाम: इंट्रा-टाइगर संघर्ष
कम क्षेत्रफल में अधिक घनत्व का सीधा परिणाम टाइगर-टाइगर कॉन्फ्लिक्ट के रूप में सामने आता है। टेरिटरी को लेकर होने वाले ये संघर्ष अक्सर घातक सिद्ध होते हैं, जिससे बाघों की अप्राकृतिक मृत्यु दर बढ़ सकती है।

विचरण क्षेत्र का विस्तार और कॉरिडोर की आवश्यकता
कॉर्बेट की सफलता का प्रभाव अब केवल उत्तराखंड तक ही सीमित नहीं है। वहाँ से निकले बाघ अब अपने विचरण क्षेत्र (Dispersal Area) का विस्तार कर रहे हैं। तराई के जंगल होते हुए ये बाघ पड़ोसी उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, दुधवा नेशनल पार्क, और बिजनौर-नजीबाबाद बेल्ट तक पहुँच रहे हैं, जिससे इन क्षेत्रों में भी बाघों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
उत्तराखंड वन विभाग इस वृद्धि को बेहतर संरक्षण और अनुकूल वातावरण का परिणाम मानता है।
आरके मिश्रा, प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव का कहना है कि “उत्तराखंड में बाघों की संख्या बेहतर सुरक्षा, मॉनिटरिंग और संरक्षण के कारण बढ़ी है। कॉर्बेट से बाहर के इलाकों में भी बाघ सफलतापूर्वक रह रहे हैं।”
हालांकि, विशेषज्ञों का मत है कि यह विस्तार जगह की कमी (Space Constraint) के कारण हो रहा है, जिससे भविष्य में सुरक्षित आवागमन गलियारे (Safe Movement Corridors) विकसित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।
बढ़ती आबादी का डरावना सच: मानव-वन्यजीव संघर्ष
बाघों की बढ़ती संख्या, जो एक ओर संरक्षण की सफलता है, दूसरी ओर मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रही है। जैसे-जैसे बाघों की टेरिटरी का विस्तार कोर क्षेत्रों से बाहर हो रहा है, इंसानी बस्तियों से उनका टकराव अपरिहार्य हो गया है।
मानव हताहतों का आंकड़ा
राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं:
- मौतें: वर्ष 2020 के बाद से अब तक बाघों के हमलों में 60 लोगों की जान जा चुकी है।
- घायल: इसी अवधि में 46 लोग घायल हुए हैं।
- वर्तमान वर्ष: इस वर्ष (अक्टूबर तक) बाघों के हमले में 12 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई है।
यह स्पष्ट करता है कि बाघ अब इंसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं, और उनकी बढ़ती संख्या के बीच संघर्ष को कम करना उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ी परीक्षा है।
भविष्य की चुनौती: संख्या नहीं, प्रबंधन की गुणवत्ता
उत्तराखंड में बाघों की संख्या बढ़ना निस्संदेह एक वैश्विक उपलब्धि है, लेकिन विशेषज्ञ अब एकमत हैं कि फोकस संख्या बढ़ाने से हटकर प्रबंधन की गुणवत्ता (Quality Management) पर आना चाहिए।
📢 भविष्य की रणनीति:
“अगर बाघों की संख्या इसी तरह बढ़ती रही और जंगलों का विस्तार नहीं हुआ, तो उनके आपसी और मानव से संघर्ष की घटनाएं बढ़ेंगी। इसीलिए उत्तराखंड में टाइगर कंजर्वेशन का अगला चरण क्वालिटी मैनेजमेंट होगा—यानी जितने बाघ हैं, उनके लिए सुरक्षित, स्थायी और संघर्ष-रहित क्षेत्र सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती होगी।”
गैर-संरक्षित क्षेत्रों में उपस्थिति
हैरान करने वाली बात यह है कि राज्य के कुछ गैर-टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में भी बाघों की संख्या कई राष्ट्रीय पार्कों से ज्यादा है। उदाहरण के लिए, पश्चिमी सर्कल में 88 बाघ और लैंसडाउन वन प्रभाग में 29 बाघ मौजूद हैं। यह दर्शाता है कि बाघ केवल संरक्षित सीमाओं में ही नहीं, बल्कि आसपास के जंगली परिदृश्यों (Wild Landscapes) में भी स्थायी रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं।
उत्तराखंड आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ संरक्षण की सफलता, मानव सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन को एक साथ साधने की आवश्यकता है।
कॉर्बेट ‘ओवरलोड’ की आंच: कम जगह, बड़ा खतरा
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में 260 बाघों का रहना एक विश्व रिकॉर्ड है, लेकिन वन्यजीव वैज्ञानिक इसे खतरे की घंटी मानते हैं।

राष्ट्रीय बाघ गणना में उत्तराखंड का स्थान
| रैंक | राज्य | बाघों की संख्या (2023) |
| 1 | मध्य प्रदेश | 785 |
| 2 | कर्नाटक | 563 |
| 3 | उत्तराखंड | 560 |
अगला कदम: गुणवत्ता प्रबंधन
वन विभाग इसे अपनी कामयाबी मानता है, लेकिन विशेषज्ञों की अंतिम चेतावनी है: “बाघों के संरक्षण का अगला चरण ‘गुणवत्ता प्रबंधन’ (Quality Management) होगा। इसका अर्थ है – सुरक्षित, स्थायी और संघर्ष-रहित क्षेत्र सुनिश्चित करना, न कि केवल संख्या बढ़ाना।”
बाघों के लिए जगह और सुरक्षित गलियारे उपलब्ध कराना ही वह एकमात्र रास्ता है जिसके जरिए उत्तराखंड इस दोहरी चुनौती—रिकॉर्ड संरक्षण और मानव सुरक्षा—को साध सकता है।

