HomeUttarakhandAlmoraकुमाउनी भाषा के संरक्षण को युवाओं और बच्चों से जोड़ना जरूरी

कुमाउनी भाषा के संरक्षण को युवाओं और बच्चों से जोड़ना जरूरी

आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की उठी मांग

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा।
कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति की सामान्य निकाय की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। बैठक में कुमाउनी भाषा को आने वाली पीढ़ियों से जोड़ने, इसके व्यापक प्रचार-प्रसार तथा भाषा को संवैधानिक पहचान दिलाने के प्रयासों को गति देने पर गंभीर मंथन किया गया।

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बैठक की अध्यक्षता समिति अध्यक्ष डॉ. जगत सिंह बिष्ट ने की, जबकि संचालन नीरज पंत ने किया। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि कुमाउनी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक पहचान की संवाहक है। इसलिए इसके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को इससे जोड़ने की आवश्यकता है।

युवा पीढ़ी को जोड़कर ही मजबूत होगा कुमाउनी भाषा का अभियान

बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि कुमाउनी भाषा के विकास और संरक्षण के अभियान को व्यापक जनअभियान का स्वरूप दिया जाए। वक्ताओं ने कहा कि यदि भाषा को नई पीढ़ी तक मजबूती से पहुंचाना है तो बच्चों और युवाओं को अभियान का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा।

इसके लिए पारंपरिक माध्यमों के साथ-साथ ऐसे आधुनिक और प्रभावी माध्यम अपनाने की जरूरत बताई गई, जो आज बच्चों और युवाओं के बीच लोकप्रिय एवं प्रासंगिक हैं। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, रचनात्मक लेखन, वीडियो सामग्री, गीत-संगीत और अन्य आधुनिक संचार माध्यमों के जरिए कुमाउनी भाषा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया गया।

वक्ताओं का कहना था कि युवाओं की भागीदारी के बिना किसी भी भाषा के संरक्षण का अभियान लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकता। इसलिए कुमाउनी को आधुनिक तकनीक और युवा रचनात्मकता से जोड़ते हुए इसे रोजगार, शिक्षा, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जोड़ने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।

आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए राज्य सरकार से पैरवी की मांग

बैठक में कुमाउनी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। उपस्थित सदस्यों और वक्ताओं ने इस दिशा में राज्य सरकार की ओर से प्रभावी पैरवी किए जाने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

वक्ताओं ने कहा कि कुमाउनी भाषा को संवैधानिक पहचान मिलने से इसके संरक्षण, अध्ययन, शोध, शिक्षण और साहित्यिक विकास को नई दिशा मिल सकती है। इसके लिए व्यापक स्तर पर जनसमर्थन जुटाने के साथ-साथ सरकार के स्तर पर भी गंभीर और निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

लेखन योजनाओं में उत्कृष्ट योगदान के लिए साहित्यकार सम्मानित

बैठक के दौरान कुमाउनी भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले रचनाकारों को सम्मानित भी किया गया। कुमाउनी भाषा की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशा शैली तथा कुमाउनी साहित्यकार डॉ. पवनेश ठकुराठी को पहरू पत्रिका एवं समिति की ओर से आयोजित विभिन्न लेखन योजनाओं में उत्कृष्ट योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि साहित्यकार और रचनाकार किसी भी भाषा की जीवंतता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे रचनाकारों को प्रोत्साहन मिलने से कुमाउनी भाषा में लेखन की नई संभावनाएं विकसित होंगी और नई पीढ़ी के लेखक भी इससे प्रेरित होंगे।

आनंद सिंह बिष्ट की दो पुस्तकों का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान साहित्यकार आनंद सिंह बिष्ट की दो पुस्तकों ‘सांची प्रेम’ और ‘परोपकारी वृक्ष देव’ का भी विमोचन किया गया। उपस्थित साहित्यकारों एवं भाषा प्रेमियों ने पुस्तकों को कुमाउनी साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण प्रयास बताया।

पुस्तक विमोचन के दौरान कुमाउनी साहित्य में विविध विषयों पर निरंतर लेखन और प्रकाशन की आवश्यकता पर भी विचार व्यक्त किए गए। वक्ताओं ने कहा कि स्थानीय लोकजीवन, संस्कृति, परंपराओं, प्रकृति और सामाजिक सरोकारों को साहित्य में स्थान देकर कुमाउनी भाषा को और अधिक समृद्ध बनाया जा सकता है।

कुमाउनी भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास का आह्वान

बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि कुमाउनी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए केवल सरकारी स्तर पर प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। परिवार, विद्यालय, सामाजिक संस्थाओं, साहित्यकारों और युवा पीढ़ी को मिलकर इसके संरक्षण की जिम्मेदारी निभानी होगी।

वक्ताओं ने कहा कि घरों में बच्चों के साथ कुमाउनी में संवाद को प्रोत्साहित करने, विद्यालयों और महाविद्यालयों में भाषा-साहित्य से जुड़ी गतिविधियां आयोजित करने तथा डिजिटल माध्यमों पर कुमाउनी सामग्री को बढ़ावा देने से भाषा को नई ऊर्जा दी जा सकती है।

बैठक में कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति को व्यापक स्तर पर बढ़ावा देने तथा भविष्य में विभिन्न रचनात्मक एवं साहित्यिक गतिविधियों को और अधिक प्रभावी ढंग से संचालित करने पर भी जोर दिया गया।

ये रहे मौजूद

इस अवसर पर डॉ. जगत सिंह बिष्ट, ब्रिगेडियर धीरेश जोशी, डॉ. धाराबल्लभ पांडे, डॉ. हयात सिंह रावत, ईश्वर जोशी, हयात सिंह बिष्ट, आनंद सिंह बिष्ट, किशन सिंह मलड़ा, के.पी.एस. अधिकारी, राजेन्द्र रावत, महेन्द्र ठकुराठी, डॉ. देव सिंह पोखरिया, शशि शेखर जोशी, ललित तुलेरा सहित अनेक साहित्यकार, भाषा प्रेमी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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