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बेलवाल गांव में ‘सरकारी सिस्टम’ बेपर्दा: एक सप्ताह से बिजली-पानी ठप, बरसाती पानी पी रहे ग्रामीण!

मोबाइल चार्ज नहीं, बाहरी दुनिया से संपर्क कटा

फ्यूज उड़ता रहा, विभाग फॉल्ट खोजता रहा—5 किमी की पेयजल लाइन किसकी है, यह तक नहीं पता!

डीएम से हस्तक्षेप की गुहार

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। विकासखंड भैसियाछाना के बेलवाल गांव में बिजली और पानी के संकट ने ग्रामीणों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। करीब एक सप्ताह से बिजली गुल है और पेयजल लाइन भी ठप पड़ी है। हालात इतने खराब हैं कि लोग प्यास बुझाने के लिए बरसाती पानी का सहारा लेने को मजबूर हैं। बिजली नहीं होने से मोबाइल फोन चार्ज नहीं हो पा रहे, जिसके चलते ग्रामीणों का बाहरी क्षेत्रों से संपर्क तक कट गया है। सबसे गंभीर बात यह है कि मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत किए जाने के बावजूद समस्या जस की तस है।

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इस पूरे मामले में सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि करीब पांच किलोमीटर लंबी पेयजल लाइन को लेकर संबंधित विभाग आज तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है!

बिजली गई तो सिर्फ बल्ब नहीं बुझा, पूरा जनजीवन ठप

बेलवाल में करीब एक सप्ताह से बिजली आपूर्ति बाधित है। बिजली नहीं होने का असर केवल रोशनी तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीणों का पूरा जनजीवन प्रभावित हो गया है।

मोबाइल फोन चार्ज नहीं हो पा रहे हैं। नतीजतन ग्रामीणों का बाहरी क्षेत्रों में रहने वाले परिजनों, रिश्तेदारों और अन्य लोगों से संपर्क टूट गया है। बारिश के मौसम में जब पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य और आपदा से जुड़ी परिस्थितियां कभी भी गंभीर हो सकती हैं, उस समय मोबाइल संपर्क का टूटना अपने आप में बड़ी चिंता का विषय है।

बिजली के अभाव में घरों में लगे पंखे, टीवी, फ्रिज, चार्जर, इन्वर्टर और अन्य विद्युत उपकरण बेकार पड़े हैं। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। ऑनलाइन पढ़ाई अथवा जरूरी डिजिटल काम करना मुश्किल है। जिन घरों में बिजली से पानी खींचने या अन्य घरेलू कार्यों की व्यवस्था है, वहां भी कामकाज प्रभावित है।

रात होते ही गांव अंधेरे में डूब जाता है। बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए रात का समय और अधिक परेशानी भरा हो जाता है। वहीं मोबाइल चार्ज न होने से आपात स्थिति में मदद मांगना भी मुश्किल हो सकता है।

कर्मचारी आते हैं, फ्यूज लगाते हैं और फिर उड़ जाता है!

ग्रामीणों की शिकायत के बाद विद्युत विभाग के कर्मचारी मौके पर पहुंच रहे हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा है।

ग्रामीणों के अनुसार कर्मचारी फ्यूज लगाते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद वह फिर उड़ जाता है। फॉल्ट आखिर कहां है, इसका पता लगाने में विभाग अब तक सफल नहीं हो पाया है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि हर बार फ्यूज उड़ने के बाद उसे बदलना ही समाधान है तो स्थायी फॉल्ट की जांच कब होगी? आखिर कब तक गांव के लोग बिजली के लिए इस तरह परेशान होते रहेंगे?

यूपीसीएल के अधिशासी अभियंता कन्हैया लाल मिश्रा का कहना है कि फॉल्ट कहां आ रहा है, इसकी जांच की जा रही है।

पानी की जगह बरसात का पानी—यह कैसी व्यवस्था?

बिजली संकट के साथ बेलवाल में पेयजल संकट ने भी ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बबुरियानायल-बेलवाल पेयजल योजना की लाइन लंबे समय से बदहाल बताई जा रही है।

स्थिति यह है कि गांव में नियमित पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा और ग्रामीणों को बरसात के पानी से अपनी प्यास बुझानी पड़ रही है।

बारिश का पानी मजबूरी में इस्तेमाल करना ग्रामीणों के लिए कोई सामान्य विकल्प नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का सीधा प्रमाण है। बरसाती पानी की गुणवत्ता को लेकर भी ग्रामीणों के सामने चिंता बनी हुई है।

पांच किलोमीटर की लाइन, मगर जिम्मेदार विभाग गायब!

इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू पेयजल लाइन की जिम्मेदारी को लेकर सामने आया है।

बताया गया है कि करीब पांच किलोमीटर लंबी यह पेयजल लाइन धौलछीना के नीचे स्थित एक गधेरे से पानी लेकर बेलवाल गांव तक पहुंचती है।

कई वर्षों तक इसकी देखरेख जल संस्थान करता रहा। ग्रामीणों के अनुसार पहले पेयजल का बिल भी जल संस्थान द्वारा लिया जाता था। बाद में जल संस्थान की ओर से मौखिक रूप से कहा गया कि लाइन सिंचाई विभाग को हैंडओवर कर दी गई है।

लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि हैंडओवर किए जाने का कोई स्पष्ट लिखित दस्तावेज उनके सामने नहीं है।

उधर जल जीवन मिशन के तहत भी इस लाइन पर कोई प्रभावी काम नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि लाइन न पूरी तरह जल संस्थान के पास रही, न सिंचाई विभाग ने इसकी जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से संभाली और अब ग्रामीणों को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।

सिंचाई विभाग बोला—ग्राम सभा की है, ब्लॉक बोला—हमारे पास नहीं!

पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य रमेश सिंह जड़ौत के अनुसार इस समस्या को लेकर करीब तीन माह पूर्व मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत भी दर्ज कराई गई थी, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

जड़ौत के अनुसार सिंचाई विभाग की ओर से फोन कर कहा गया कि पेयजल लाइन ग्राम सभा के अंतर्गत आती है और इसे ब्लॉक स्तर से देखा जाएगा।

जब ब्लॉक स्तर पर संपर्क किया गया तो वहां से कथित तौर पर कहा गया कि यह लाइन उनके पास है ही नहीं।

यानी ग्रामीणों के सामने सीधा सवाल खड़ा है—

जल संस्थान कहता है हैंडओवर कर दिया।
सिंचाई विभाग कहता है ग्राम सभा की है।
ब्लॉक कहता है हमारे पास लाइन है ही नहीं।
तो फिर पांच किलोमीटर की यह पेयजल लाइन आखिर किसकी है?

और उससे भी बड़ा सवाल—जब किसी को जिम्मेदारी ही नहीं पता तो ग्रामीणों को पानी कौन देगा?

जल जीवन मिशन भी नहीं पहुंचा यहां तक!

ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना के बावजूद बबुरियानायल-बेलवाल पेयजल योजना में कोई काम नहीं हुआ।

ग्रामीणों के अनुसार यदि योजना की मरम्मत, पाइपलाइन का सुधारीकरण और नियमित रखरखाव समय रहते कर दिया जाता तो आज उन्हें बरसाती पानी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

यह स्थिति इस सवाल को जन्म देती है कि आखिर सरकारी योजनाओं का लाभ उन गांवों तक कब पहुंचेगा, जहां आज भी लोग मूलभूत पेयजल सुविधा के लिए तरस रहे हैं?

‘एक बूंद बारिश गिरी नहीं कि बिजली गायब’

ग्रामीणों का आक्रोश अब खुलकर सामने आने लगा है। उनका कहना है कि यह समस्या आज की नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही है।

ग्रामीणों के अनुसार जैसे ही बारिश शुरू होती है, बिजली व्यवस्था चरमरा जाती है और गांव अंधेरे में डूब जाता है।

उनका कहना है कि क्षेत्र में हालात अब बेहद खराब हो चुके हैं। ग्रामीणों ने यहां तक कहा कि उन्हें ‘नेपाल से भी बदतर’ हालात का सामना करना पड़ रहा है।

बारिश के मौसम में बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का इस तरह ठप होना ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सीएम पोर्टल पर शिकायत भी बेअसर

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब ग्रामीणों ने समस्या को मुख्यमंत्री पोर्टल तक पहुंचाया, तब भी समाधान क्यों नहीं हुआ?

यदि तीन माह पूर्व दर्ज शिकायत के बावजूद स्थिति जस की तस है तो शिकायत निवारण व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें आश्वासन नहीं, बिजली और पानी चाहिए।

अब ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन तत्काल मौके पर टीम भेजकर बिजली व्यवस्था दुरुस्त करे, पेयजल लाइन का स्थलीय निरीक्षण कर उसकी वास्तविक जिम्मेदारी तय करे और बबुरियानायल-बेलवाल पेयजल योजना को स्थायी रूप से दुरुस्त किया जाए।

बेलवाल के ग्रामीणों का सवाल सीधा है—सरकार के कागजों में चाहे यह लाइन किसी की भी हो, लेकिन जमीन पर इसकी जिम्मेदारी कौन निभाएगा? क्योंकि विभागीय ‘जिम्मेदारी के खेल’ में प्यास ग्रामीणों की है और अंधेरा भी उन्हीं के हिस्से में आया है।

डीएम से हस्तक्षेप की गुहार, बोले—अब आप ही दिलाएं राहत

बेलवाल गांव की विकट स्थिति को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने जिलाधिकारी अल्मोड़ा से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। ग्रामीणों का कहना है कि जब विभागीय अधिकारी एक-दूसरे के पाले में गेंद डालकर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं और मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत के बावजूद महीनों से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो अब जिला प्रशासन को स्वयं मामले का संज्ञान लेना चाहिए। ग्रामीणों ने डीएम से मांग की है कि संबंधित विभागों की संयुक्त टीम को मौके पर भेजकर बिजली के फॉल्ट का स्थायी समाधान, पेयजल लाइन की वास्तविक स्थिति और उसके स्वामित्व/जिम्मेदारी का तत्काल निर्धारण कराया जाए। साथ ही बबुरियानायल-बेलवाल पेयजल योजना को पुनर्जीवित कर ग्रामीणों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराने की ठोस व्यवस्था की जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। अब उन्हें आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए। ऐसे में डीएम का हस्तक्षेप ही यह तय कर सकता है कि बेलवाल के ग्रामीणों की प्यास और अंधेरे का सिलसिला कब टूटेगा।

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