सरकार बताए किसे, कितने में और कितने साल के लिए दी जा रही है?

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। उत्तराखंड की बेशकीमती सरकारी जमीनों और संपत्तियों को लीज तथा पीपीपी मोड के जरिए निजी क्षेत्र को सौंपने के मुद्दे ने सियासी तूल पकड़ लिया है। कांग्रेस ने भाजपा सरकार की भूमि नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि प्रदेश की बहुमूल्य सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में देने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाई जा रही है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष भूपेंद्र सिंह भोज ने कहा कि उत्तराखंड की जमीन महज सरकारी संपत्ति नहीं, बल्कि प्रदेश की जनता की अमानत है। इसलिए ऐसी जमीनों को लंबे समय के लिए निजी संस्थाओं को सौंपने से पहले सरकार को जनता के सामने पूरी प्रक्रिया और उसका वित्तीय औचित्य रखना चाहिए।
‘किसे, कितने में और कितने साल के लिए?’—कांग्रेस का सीधा सवाल
भोज ने सरकार से सीधा सवाल किया कि प्रदेश में किन-किन सरकारी जमीनों और संपत्तियों को लीज अथवा पीपीपी के तहत दिया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि जमीन का बाजार मूल्य, लीज राशि, लीज अवधि, निविदा प्रक्रिया, चयनित संस्था और अनुबंध की शर्तें सार्वजनिक की जाएं।
उन्होंने कहा कि यदि सरकारी संपत्तियों का वास्तविक बाजार मूल्य बहुत अधिक है और उन्हें लंबे समय के लिए अपेक्षाकृत कम राशि पर दिया जा रहा है तो सरकार को इसका स्पष्ट वित्तीय आधार जनता के सामने रखना चाहिए।
142 एकड़ जमीन का मामला फिर गरमाया
कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने मसूरी स्थित जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट (पार्क एस्टेट), हाथीपांव की करीब 142 एकड़ भूमि का मामला उठाते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि इतनी महत्वपूर्ण सरकारी संपत्ति को लंबे समय के लिए निजी संचालन में देना राज्य की संपत्तियों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल पैदा करता है।
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज है कि जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की करीब 142 एकड़ भूमि सफल बोलीदाता को निविदा प्रक्रिया के बाद दी गई थी। ऐसे में इस मामले में विवाद का प्रमुख बिंदु प्रक्रिया, शर्तों और आर्थिक लाभ को लेकर उठाए जा रहे सवाल हैं।
भोज ने कहा कि सरकार को यह भी बताना चाहिए कि ऐसी संपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग से राज्य को कितना राजस्व मिलेगा और स्थानीय लोगों तथा युवाओं को इसका प्रत्यक्ष लाभ किस रूप में प्राप्त होगा।
UIIDB को लेकर भी सवाल
भोज ने उत्तराखंड इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (UIIDB) की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि इस व्यवस्था के जरिए सरकारी जमीनों और संपत्तियों को निजी क्षेत्र के लिए उपलब्ध कराने की प्रक्रिया आसान की जा रही है।
उन्होंने कहा कि निवेश और विकास के नाम पर सरकारी संपत्तियों का उपयोग किया जाना अलग बात है, लेकिन यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि ऐसी संपत्तियां जनहित से समझौता किए बिना ही निजी क्षेत्र को दी जाएं।
पर्यटन शहरों की जमीन पर नजर?
कांग्रेस जिलाध्यक्ष ने नैनीताल, मसूरी, हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे प्रमुख पर्यटन क्षेत्रों की सरकारी जमीनों और संपत्तियों को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि इन क्षेत्रों में जमीन का महत्व केवल उसके मौजूदा बाजार मूल्य से नहीं, बल्कि पर्यटन, पर्यावरण और भविष्य की सार्वजनिक जरूरतों से भी जुड़ा है।
भोज ने कहा कि आज सरकारी जमीन निजी परियोजनाओं के लिए उपलब्ध करा दी गई तो आने वाले समय में स्कूल, अस्पताल, खेल मैदान, पार्क और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए जमीन की उपलब्धता सीमित हो सकती है।
‘सरकार बताए—जनहित कितना, निजी हित कितना?’
कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार को हर ऐसी संपत्ति के मामले में यह स्पष्ट करना चाहिए कि परियोजना से राज्य को क्या मिलेगा, स्थानीय जनता को क्या मिलेगा और निजी संस्था को क्या लाभ होगा। उन्होंने मांग की कि सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं ताकि जनता स्वयं पूरी प्रक्रिया को समझ सके।
उन्होंने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन, खेल और अन्य जनहितकारी गतिविधियों में इस्तेमाल होने योग्य सरकारी संपत्तियों को सीधे निजी हाथों में देने के बजाय पहले उनके सार्वजनिक उपयोग की संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए।
‘पारदर्शिता नहीं तो सड़क से सदन तक संघर्ष’
भोज ने चेतावनी दी कि सरकारी जमीनों और संपत्तियों से जुड़े मामलों में यदि सरकार ने पारदर्शिता नहीं बरती तो कांग्रेस इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकारी संपत्तियों के उपयोग को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब सरकार को देना होगा।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस उत्तराखंड की सरकारी जमीन और सार्वजनिक संपत्तियों से जुड़े हर मामले में पारदर्शिता, उचित मूल्यांकन और जनहित की मांग करेगी तथा जरूरत पड़ने पर इस मुद्दे को सड़क से लेकर सदन तक उठाया जाएगा।
सवाल अब सिर्फ जमीन का नहीं, हिसाब का भी है—सरकारी संपत्ति का वास्तविक मूल्य क्या है, उससे राज्य को कितना लाभ मिल रहा है और उसके इस्तेमाल का फैसला किसके हित में हो रहा है? कांग्रेस ने सरकार से इन सवालों का सार्वजनिक जवाब मांगा है।









