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IMA Dehradun : पहले लकवे को हराया, अब सेना में अफसर बना यह ‘यंग वॉरियर’

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सीएनई रिपोर्टर, देहरादून

”कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों”

भारतीय सेना में अधिकारी बने जम्मू के नौजवान दानिश लैंगर की सफलता की कहानी —

IMA Passing out parade 2022 : कहते हैं​ कि अगर दिल में कुछ कर गुजरने की सच्ची तमन्ना हो तो कोई भी मुश्किल आपका रास्ता नहीं रोक सकती। ऐसा ही कुछ 21 वर्षीय युवा Young Warrior दानिश लैंगर ने कर दिखाया है। कभी 06 माह तक पक्षाघात से पीड़ित रह चुके दानिश ने लकवे को मात देकर सेना में अधिकारी बनने का अपना सपना पूरा करा है। आज उनके जज्बे की देश भर में सराहना हो रही है।

दानिश बने भारतीय सेना के अधिकारी

उल्लेखनीय है दानिश कि देहरादून में आयोजित आई.एम.ए. की पासिंग आउट परेड के बाद सेना में अफसर बन गये हैं। गत दिवस संपन्न हुई पासिंग आउट परेड के बाद भारतीय सेना को 288 युवा सैन्य अधिकारी मिले हैं, जिनमें से अथ​क जि​जीविषा के धनी जम्मू के रहने वाले दानिश भी शामिल हैं। दानिश लैंगर के संघर्षों की कहानी बहुत ही प्रेरणादायी है।

गुइलेन बैरे सिंड्रोम बीमारी से हुए थे ग्रसित

बताना चाहेंगे कि एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले जम्मू के बाबा दानिश 21 साल को वर्ष 2017 में लकवा पड़ गया था। चिकित्सकों के अनुसार गुइलेन बैरे सिंड्रोम (GBS) नामक वायरल अथवा बैक्ट्रीरिया संक्रमण के कारण उन्हें पक्षाघात यानी लकवा पड़ गया। जिस वक्त ऐसा हुआ तब दानिश बहुत परेशान हो गये, क्योंकि उनका बचपन से ही सपना भारतीय सेना में अफसर बनने का था। अगर व ह स्थायी रूप से बिस्तर से लग जाते तो कभी भी सेना में नहीं जा सकते थे। अतएव दानिश ने ठान ली कि वह इस बीमारी को हराकर ही दम लेंगे।

हवा में ‘टोपी’ नहीं, उछाल दिया दुर्भाग्य

इसे हम दानिश की इच्छाशक्ति ही कहेंग, जिसके जरिए उन्होंने छह माह के अथक श्रम के बाद अपने शरीर को पूरी तरह स्वस्थ कर लिया और वह लकवा मुक्त हो गये। लैंगर ने आईएमए से स्नातक की उपाधि जैसे ही प्राप्त की तो मारे खुशी के उन्होंने अपनी टोपी हवा में उछाल दी। जो दानिश को जानते हैं, उनका कहना था कि दानिश ने यह टोपी नहीं, बल्कि अपने उस दुर्भाग्य को हवा में उछाल लिया, जो उन पर करीब पांच साल पहले हावी हो गया था। अब दानिश लैंगर भारतीय सेना के एक सैन्य अधिकारी हैं और उनकी कोशिशें हमेशा युवाओं को प्रेरणा देती रहेंगी।

यह कहते हैं दानिश के पिता राजेश लैंगर

यह भी उल्लेखनीय है कि दानिश के पिता राजेश लैंगर मृदा संरक्षण अधिकारी के पद पर हैं। राजेश लैंगर ने पासिंग आउट परेड के बाद बताया कि लकवा पड़ने के बाद दानिश ने लगातार फिजियोथेरेपी करानी शुरू कर दी थी। सेना में अधिकारी बनने के लिए उन्होंने बहुत ज्यादा कसरत की और अपने शरीर को मजबूत बनाया। लकवा पड़ने के सिर्फ छह माह में उन्होंने अपने को लकवा—मुक्त कर लिया था। राजेश ने कहा कि उन्हें अपने बेटे दानिश पर गर्व है।

जानिये क्या है यह बीमारी !

गुइलेन बैरे सिंड्रोम (GBS) एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और नर्व सिस्टम पर हमला करती है। इस संक्रमण के कारण एक साल तक कोई भी व्यक्ति बिस्तर पर पड़ा रह सकता है। अकसर इस बीमारी से ग्रसित लोग हार माल लेते हैं और बिस्तर पर ही लेट जाते हैं या फिर सामान्य गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पाते। इसे दानिश लैंगर की हिम्मत ही कहा जायेगा कि उसने हार नहीं मानी और इस बीमारी पर बहुत कम समय में जीत हासिल कर ली।

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Deepak Manral
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तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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