अक्टूबर में ही बर्फ की सफेद चादर से ढकीं छिपलाकोट की चोटियां

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अक्टूबर में ही बर्फ की सफेद चादर से ढकीं छिपलाकोट की चोटियां, एक दशक बाद दिखा दुर्लभ नजारा
अक्टूबर में ही बर्फ की सफेद चादर से ढकीं छिपलाकोट की चोटियां, एक दशक बाद दिखा दुर्लभ नजारा

एक दशक बाद दिखा दुर्लभ नजारा

सीएनई रिपोर्टर, पिथौरागढ़। उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में मौसम ने इस बार अक्टूबर में ही हिमालयी क्षेत्र की एक अलग तस्वीर पेश कर दी है। जिले की ऊंचाई पर स्थित छिपलाकोट की चोटियां बर्फ की सफेद चादर से ढक गई हैं। बताया जा रहा है कि करीब एक दशक के अंतराल के बाद अक्टूबर महीने में यहां हिमपात देखने को मिला है। सामान्य तौर पर इन ऊंची चोटियों पर दिसंबर या जनवरी में बर्फबारी होती रही है। ऐसे में शीतकाल की शुरुआत से पहले ही पहाड़ों पर बर्फ जमने की घटना ने पर्यावरण और जलस्रोतों के संरक्षण से जुड़े पहलुओं को फिर चर्चा में ला दिया है।


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पिछले कुछ दशकों में हिमालयी क्षेत्रों के मौसम में आए बदलावों के बीच समय से पहले हुई इस बर्फबारी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इसे पर्यावरणीय बदलावों के लिहाज से कितना सकारात्मक कहा जा सकता है, यह आने वाले समय में बर्फबारी की निरंतरता, तापमान और बर्फ के टिकने की अवधि पर निर्भर करेगा।

जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालय के लिए अहम है हिमपात

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित बसंती दीदी के अनुसार, बीते तीन दशकों के दौरान हिमालय के मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं। ग्लोबल वार्मिंग और पेड़ों के अंधाधुंध कटान का असर पर्वतीय पर्यावरण पर पड़ रहा है। तापमान में वृद्धि तथा वर्षा और हिमपात के बदलते स्वरूप ने हिमालय की प्राकृतिक व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।

पहाड़ों पर होने वाली बर्फबारी केवल मौसम से जुड़ी घटना नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पर्वतीय जलचक्र, वनस्पतियों और प्राकृतिक जलस्रोतों से भी है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान जमा होने वाली बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर आसपास के क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने में योगदान देती है।

पर्याप्त हिमपात नहीं होने अथवा बर्फ के लंबे समय तक नहीं टिकने से इस प्राकृतिक प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। इसका प्रभाव हिमानी नदियों के साथ-साथ उन छोटे जलस्रोतों पर भी पड़ता है, जिन पर पर्वतीय क्षेत्रों की पारिस्थितिकी और स्थानीय आबादी की जल जरूरतें निर्भर करती हैं। ऐसे में छिपलाकोट की चोटियों पर अक्टूबर में हुआ हिमपात इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

14,750 से 15,400 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं चोटियां

पिथौरागढ़ जिले में स्थित छिपलाकोट की पर्वत शृंखला समुद्र तल से लगभग 14,750 से 15,400 फीट की ऊंचाई तक फैली हुई है। ऊंचाई और विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक संपदा, पर्वतीय वनस्पतियों और जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

यहां के बुग्याल, स्थानीय वनस्पतियां और प्राकृतिक जलस्रोत मिलकर एक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। इन क्षेत्रों में मौसम के सामान्य चक्र में होने वाला बदलाव भी वनस्पतियों की वृद्धि, मिट्टी में नमी और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर होने वाला हिमपात मिट्टी में नमी बनाए रखने और प्राकृतिक जलचक्र को सहारा देने में उपयोगी हो सकता है। बर्फ के धीरे-धीरे पिघलने से ऊंचाई वाले इलाकों में पानी की उपलब्धता को बनाए रखने में मदद मिलती है। इसका लाभ उन वनस्पतियों को भी मिल सकता है, जिनका जीवन चक्र मौसमी नमी और तापमान पर निर्भर करता है।

बर्फ की परत से प्राकृतिक जलस्रोतों को मिलता है सहारा

हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान जमा होने वाली बर्फ एक प्राकृतिक जल भंडार की तरह काम करती है। तापमान बढ़ने पर यह बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है और पानी का प्रवाह आसपास के जलग्रहण क्षेत्रों तक पहुंचता है। इससे विभिन्न प्राकृतिक जलस्रोतों के पुनर्भरण और पर्वतीय जलचक्र को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

इसके विपरीत, यदि किसी क्षेत्र में हिमपात कम हो, बर्फ देर से गिरे या तापमान बढ़ने के कारण वह जल्दी पिघल जाए, तो स्थानीय जल उपलब्धता का मौसमी स्वरूप बदल सकता है। इसका असर प्राकृतिक जलधाराओं, वनस्पतियों और क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर पड़ने की आशंका रहती है।

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