वन पंचायत कफलनी में मंडरा रहा खतरा
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। वन पंचायत कफलनी में चौड़ी पत्ती वाले उपयोगी वृक्षों और फलदार पौधों पर साजी कनेर, लंटाना, और काला बांस जैसी आक्रामक झाड़ियों का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। ये विदेशी और आक्रामक प्रजातियाँ स्थानीय वनस्पतियों को लील रही हैं, जिससे जंगल की जैव विविधता को भारी नुकसान हो रहा है।

उल्लेखनीय है कि वन पंचायत कफलनी में बांज, ब्रूस और फलयाट जैसे चौड़ी पत्ती के महत्वपूर्ण वृक्षों के साथ-साथ काफल, हिसालू, और पलम जैसे फलदार पौधे भी इन शापित झाड़ियों की चपेट में आ गए हैं। ये झाड़ियां इतनी तेजी से फैलती हैं कि ये सूरज की रोशनी और पोषक तत्वों को रोककर देशी पौधों को पनपने नहीं देती हैं।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता शिव दत्त पांडे और सरपंच सरस्वती देवी के अनुसार, इस समस्या के बारे में वन विभाग को कई बार सूचित किया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे जंगल का एक बड़ा हिस्सा, अब नष्ट होने लगा है।

समस्या की जड़: आक्रामक प्रजातियाँ
लंटाना (पंचफूली): यह विदेशी झाड़ी बहुत तेजी से बढ़ती है और घनी झाड़ियां बनाती है, जिससे देशी पौधे विलुप्त हो रहे हैं। इसकी सूखी पत्तियां जंगल की आग का खतरा भी बढ़ाती हैं, और इसके पत्ते व फल मवेशियों के लिए जहरीले होते हैं।
काला बांस (मेक्सिकन डेविल): यह भी एक आक्रामक पौधा है जो अन्य पौधों से पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करता है। यह मिट्टी की गुणवत्ता को कम कर देता है, जिससे देशी प्रजातियों का विकास रुक जाता है।
साजी कनेर: यह एक अत्यधिक जहरीला पौधा है जो मनुष्यों और जानवरों के लिए खतरा पैदा करता है।
पांडे ने यह भी बताया कि समस्या से निपटने की बजाय, वन विभाग चौड़ी पत्ती के जंगलों में चीड़ के वृक्ष लगा रहा है, जिससे भविष्य में आग लगने का खतरा और बढ़ जाएगा। यह स्थिति वनाग्नि से झुलसे जंगलों में दोबारा वृक्षारोपण न किए जाने के बाद और भी गंभीर हो गई है।
जंगल के अस्तित्व पर सवालिया निशान
इन आक्रामक झाड़ियों का प्रसार न केवल वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। समय रहते अगर इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वन पंचायत कफलनी के जंगल अपनी प्राकृतिक पहचान खो सकते हैं।
प्रभावित हो रहा 50 एकड़ का क्षेत्रफल
पर्वतीय कृषि रक्षा समिति के सदस्य शिव दत्त पांडे ने कहा कि वन पंचायत कफलनी के लगभग 50 एकड़ के क्षेत्रफल में चौड़ी पत्ती के जंगलों को साजी कनेर, लंटाना और काला बांस की कंटीली झाड़ियां लील रही हैं। इन महाविनाशक झाड़ियों ने बांस, उतीस आदि चौड़ी पत्ती के वृक्षों ही नहीं काफल, हिसालू, पलम जैसे फलदारा पौध व वृक्षों को भी अपने आगोश में ले लिया है। यही नहीं, पूर्व में वनाग्नि में जंगल झुलस जाने के बावजूद यहां आज तक वन विभाग द्वारा दोबारा वृक्षारोपण नहीं किया गया है। जिससे संपूर्ण वन क्षेत्र को नुकसान पहुंच रहा है।
उनका कहना है कि पूर्व में कई बार वन विभाग को शिकायत देने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। बांज, ब्रूस, फलयाट, काफल का यहां 2022 से जंगल है, जो अब नष्ट होने लगा है। यहां स्वत: चीड़ के वृक्ष उत्पन्न होने लगे हैं, जो खुद में चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों के लिए खतरा हैं। समस्या से निपटने के लिए जंगलात वालों को धरातल पर प्रयास करने चाहिए। पांडे ने कहा कि यहां वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए पर्याप्त संख्या में फायर वाचर रखे जाने की आवश्यकता है।

