इलाज में ₹15 लाख खर्च, पर किसी ने नहीं की मदद
मदद के लिए गिड़गिड़ाते रहे, नेताओं ने फ़ोन तक नहीं उठाया!
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। जिला अल्मोड़ा के ग्राम बिन्तोला में एक दर्दनाक घटना ने पूरे क्षेत्र को सदमे में डाल दिया है। पूर्व ग्राम प्रधान और समाजसेवी भगवंत सिंह मेहता के 22 वर्षीय पुत्र महिपाल मेहता का निधन सोबन सिंह जीना मेडिकल कॉलेज, अल्मोड़ा में हो गया।

युवा महिपाल होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा था और जल्द ही मॉरिशस नौकरी के लिए जाने वाला था, लेकिन किस्मत ने उसे समय से पहले ही छीन लिया।
ग्राम बिन्तोला निवासी सामाजिक कार्यकर्ता भगवंत सिंह मेहता के पुत्र महिपाल मेहता ने गत 29 अक्तूबर को सोबन सिंह जीना मेडिकल कॉलेज में अंतिम सांस ली। यह खबर केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए बहुत दुखदायी रही।
महिपाल न केवल पढ़ाई में होनहार था, बल्कि सामाजिक और धार्मिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी के लिए भी जाना जाता था। मिलनसार, मददगार और कुसाग्र बुद्धि का यह नौजवान हर किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करता था। उसकी अचानक हुई मौत से गांव और पूरा जिला गहरे शोक में डूब गया।
इधर चिकित्सीय प्रमाण पत्र में मृत्यु का कारण जटिल मलेरिया, परिवर्तित संवेदी अंग, सेप्सिस, श्वसन विफलता बताया गया है। इस प्रमाण पत्र पर डॉ. कैंतुरा के हस्ताक्षर हैं।
इलाज में खर्च हुए 15 लाख, पर न बच सका बेटा
परिवार ने महिपाल को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। अल्मोड़ा जिला अस्पताल, हल्द्वानी के चंदन हॉस्पिटल और बरेली के राममूर्ति अस्पताल तक इलाज कराया गया। इलाज में 15 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो गए, पर ज़िंदगी हार गई। अब गरीब किसान पिता के ऊपर आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा है।

महिपाल मेहता कौन था?
महिपाल अल्मोड़ा के एक निजी कॉलेज से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहा था और जल्द ही भविष्य संवारने के लिए मॉरीशस जाने वाला था। वह केवल छात्र नहीं था, बल्कि एक कुशाग्रबुद्धि, मिलनसार और हुनरमंद नौजवान था। वह क्षेत्र के सभी धार्मिक और सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता था और हमेशा ज़रूरतमंदों की मदद के लिए तत्पर रहता था। उसके अचानक चले जाने से परिवार, गाँव और क्षेत्र के लोग स्तब्ध हैं।
मदद के लिए गिड़गिड़ाते रहे, नेताओं ने फ़ोन तक नहीं उठाया!
इस दुख की घड़ी में, जब एक गरीब परिवार को सबसे ज्यादा मदद की ज़रूरत थी, तब जनप्रतिनिधियों ने आँखें फेर लीं।परिवार का आरोप है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी, राज्य मंत्री सुरेश भट्ट, विधायक मनोज तिवारी, मंत्री अजय टम्टा और भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष कैलाश शर्मा जैसे बड़े नेताओं को पत्र लिखे गए, लेकिन किसी ने भी किसी तरह की कोई मदद नहीं की।
हद तो तब हो गई जब इनमें से किसी ने मदद करना तो दूर, पीड़ित परिवार का फ़ोन तक उठाना उचित नहीं समझा।सिर्फ़ विधायक मनोज तिवारी ने मुख्यमंत्री राहत कोष से मदद के लिए एक पत्र जरूर भेजा था। क्या यही है हमारा सिस्टम, जो एक होनहार युवा को बचाने के लिए हाथ भी नहीं बढ़ाता?

महीनों अस्पतालों के चक्कर काटते रह गए परिजन…
मृतक के परिजनों ने बताया कि महिपाल को पहले पीलिया हुआ था, लेकिन वह पूरी तरह स्वस्थ था। गत 28 अगस्त को उसकी तबियत अचानक खराब हुई तो उसे जिला अस्पताल भर्ती कराया गया। तीन दिन बाद चिकित्सकों ने उसे बाहर के लिए रेफर कर दिया। 30 अगस्त को रात 9 बजे परिजन उसे चंदन अस्पताल हल्द्वानी ले गए। जहां अस्पताल स्टॉफ ने आयुषमान कार्ड होने के बावजूद कोई गुंजाइश नहीं की।
10 दिन महिपाल वहां भर्ती रहा। हालत में सुधार न होने पर परिजन उसे बरेली स्थित राममूर्ति अस्पताल ले गए। राम मूर्ति काफी समय रहने के बाद भी उसकी हालत में सुधार नहीं हुए।
थक—हार कर परिजन उसे वापस अल्मोड़ा ले आये और जिला में फिर भर्ती कर दिया। दो तीन दिन बाद यानी 29 अक्टूबर की रात को बेस में भर्ती करा दिया। जहां रात 2 बजकर 45 मिनट पर उसका निधन हो गया। परिजनों का कहना है महिपाल को बुखार, सर में क्लाट आदि की भी शिकायत हो गई थी। चंदन अस्पताल में तो उनका प्रतिदिन 80 से 90 हजार खर्चा आया। चंदन हास्पिटल ने मल्टीपल बीमारियों के नाम पर आयुष्मान कार्ड तक नहीं लगाया।
परिजनों ने सरकार से निवेदन किया है कि आयुष्मान कार्ड का लाभ नीजी अस्पताल में सभी बिमारियों पर समान रूप से लागू हो। ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। गरीब परिवारों पर अत्यधिक वित्तीय भार न पड़ सके।
परिजनों का कहना है कि उनका बालक तो अब इस दुनियां में नहीं रहा, लेकिन उन्हें इस सिस्टम से बहुत शिकायत है, जहां हमारे जनप्रतिनिधि जरूरत पड़ने पर एकदम मुंह मोड़ लेते हैं। गरीब की कहीं सुनवाई नहीं होती। वहीं, बड़े—बड़े अस्पताल भी केवल धन उगाही का माध्यम बनकर रह गए हैं।
गांव में पसरा मातम, नम आंखों से दी विदाई
महिपाल की अंतिम यात्रा उसके गांव बिन्तोला बल्टा महादेव घाटी से निकाली गई, जिसमें ग्रामीणों के साथ जिले के कई गणमान्य लोग शामिल हुए। हर आंख नम थी, हर दिल में एक ही सवाल —
22 साल के युवा का इस तरह चले जाना समाज और व्यवस्था दोनों पर एक गहरा सवाल छोड़ गया है।
“क्या एक होनहार युवा सिर्फ इसलिए मर गया क्योंकि उसका परिवार गरीब था और किसी ने उसकी जरूरत पड़ने पर मदद नहीं की?”

