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नेता चुनावी इश्क में, जनता पूरे रिस्क में ! कोरोना के साये में विधानसभा चुनाव क्यों ?

सीएनई रिपोर्टर

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देश के तमाम राज्यों में कोरोना और ओमिक्रॉन के मामले लगातार बढ़ने के बावजूद आज की तारीख तक न तो विधानसभा चुनाव टलने की घोषणा हुई है और ना ही चुनावी सभाओं व रैलियों को रोका जा रहा है। राजनैतिक दलों के लिए जनता की सलामती से ज्यादा अहम चुनाव में जीत दर्ज करने की होड़ है।

ज्ञात रहे कि इस नव वर्ष 2022 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर सहित कुल 05 राज्यों में जल्द चुनाव होने हैं, जबकि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी इस साल के अंत तक चुनाव संपन्न करा दिये जायेंगे। (ख़बर जारी है, आगे पढ़ें)

उत्तराखंड की विधानसभा में 70 सीटें हैं। साल 2017 के चुनाव में यहां भाजपा ने सबसे अधिक 56 सीटें जीती थीं। वहीं कांग्रेस को 11 सीटें मिली थीं, जबकि अन्य सीटें निर्दलियों ने जीती थीं। उत्तराखंड विधानसभा का कार्यकाल मार्च माह में खत्म हो रहा है। प्रचंड जीत के बाद बीजेपी ने त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में सरकार बनाई थी, लेकिन इस साल मार्च में उन्हें हटाकर तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बना दिया गया। वो इस पद पर 4 जुलाई तक रहे। उनके बाद से पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं।

उत्तराखंड के अलावा उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 सीटें हैं और वहां भी योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों ने 324 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इनमें से 312 सीटें बीजेपी ने अकेले जीती थीं। विधानसभा का कार्यकाल मई 2022 तक का है। उत्तर प्रदेश में करीब 14.66 करोड़ वोटर हैं।

इसी तरह पंजाब की विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं और वहां विधानसभा का कार्यकाल मार्च 2022 तक है। अन्य राज्यों में भी जल्द चुनाव होने हैं। बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह से देश में एक बार फिर लगातार कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं और ओमिक्रॉन भी दस्तक दे चुका है तो क्या चुनाव टालना उचित नहीं होगा ?

इस सवाल के जवाब पर हर पार्टी की एक ही दलील है। राजनैतिक दलों के मुखियाओं का कहना है कि पांचों चुनावी राज्य में कम से कम 70 फीसदी लोग वैक्सीन की एक डोज ले चुके हैं। यूपी में 83 फीसदी, पंजाब में 77 फीसदी, मणिपुर में 70 प्रतिशत जबकि गोवा और उत्तराखंड में 100 फीसदी लोगों को वैक्सीन की एक डोज लग चुकी है। दरअसल, नेताओं के लिए जो चुनावी इश्क है, वही जनता के लिए रिस्क है।

हैरानी की बात तो यह है कि कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए उत्तराखंड सहित कई राज्यों ने नाइट कर्फ्यू लगा रखा है। जो कि रात 11 बजे से 5 बजे तक लगा रहेगा। अब जरा इस तरह के फैसले लेने वालों को कौन समझाये कि सड़कों व सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ किस समय रहती है। वर्किंग आवर्स में या फिर रात 11 बजे के बाद जब अधिकांश लोग इस ठंड के मौसम में अपने—अपने घरों में सोए रहते हैं ? यानी जिस वक्त भीड़ न के बराबर हो उस वक्त आप कर्फ्यू लगा दें और जब सुबह, शाम व दोपहर के वक्त जमकर नेताओं की रैलियों में भीड़ एकट्ठा की जाये। सरकारों के इस तरह के फैसलों से जनता भी इतनी आजिज आ चुकी है कि अब कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए कोई भी जरूरी एतिहायत बरतने को तैयार नहीं है।

आपको यह भी बता दें कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने ओमिक्रॉन के मद्देनज कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 21 दिसंबर को स्वास्थ्य मंत्रालय ने बड़ी चुनावी सभाओं के लिए सख्त नियम तय करने की वकालत की है। इसके बावजूद इन दिनों उत्तर प्रदेश और उत्तराकांड में किसी तरह के दिशा—निर्देशों का राजनैतिक दल कतई भी अनुपालन नहीं कर रहे हैं। स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण इस ओर पहले से ही इशारा कर चुके हैं। (ख़बर जारी है, आगे पढ़ें)

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में भाजपा व विपक्षी दलों के शीर्ष नेता पूरे प्रचार मोड में हैं। वहीं दूसरी ओर केंद्र द्वारा राज्यों से लगातार नियमों का पालन करने के लिए कहा जा रहा है। हास्यास्पद बात तो यह भी है कि केंद्र सरकार एक ओर निर्देश जारी करती है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में लाखों की तादात में भीड़ दिखाई देती है। जब यह सवाल चुनाव आयोग से पूछा जाता है और हस्तक्षेप की मांग बौद्धिक वर्ग करता है तो आयोग कहता है कि उसकी भूमिका तभी शुरू होती है जब आदर्श आचार संहिता लागू होती है।

यह बताना भी लाजमी होगा कि फिलहाल 5 राज्यों में होने वाले चुनाव का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। ​याचिका में रैलियों व सभाओं पर रोक लगाने की मांग की गई है। शीर्ष न्यायालय में एडवोकेट विशाल तिवारी ने जनहित याचिका दाखिल कर चुनावी राज्यों में हो रही राजनीतिक रैलियों, सभाओं और जमावड़ों पर रोक लगाने मांग करते हुए गुहार लगाई गई है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि चुनावी रैलियां वर्चुअल कराई जाएं। सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा गया है कि राजनीतिक पार्टियां चुनावी रैली को वास्तविक के बजाय वर्चुअल यानी डिजिटल रूप में ही करें।

बता दें कि इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की थी कि यूपी में रैलियों पर रोक लगनी चाहिए। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकार को यूपी विधानसभा चुनाव को भी कुछ समय टालने पर विचार करना चाहिए। कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी की थी।

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Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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