जमरानी बांध: विकास की कीमत कहीं बाघों का रास्ता तो नहीं ?

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जमरानी बांध: विकास की कीमत कहीं बाघों का रास्ता तो नहीं ?
जमरानी बांध: विकास की कीमत कहीं बाघों का रास्ता तो नहीं ?

हल्द्वानी की प्यास बुझाने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना के बीच वन्यजीव संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट में सामने आईं महत्वपूर्ण चेतावनियां

CNE REPORTER, हल्द्वानी। कुमाऊं की आर्थिक और विकास संबंधी उम्मीदों से जुड़ी जमरानी बांध परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। गौला नदी पर बनने वाला यह बहुउद्देशीय बांध हल्द्वानी की भविष्य की पेयजल जरूरतों को पूरा करने, किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने और बिजली उत्पादन की संभावनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन विकास की इस बड़ी परियोजना के साथ एक ऐसा सवाल भी जुड़ा है, जिसकी अनदेखी भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय परिणाम पैदा कर सकती है। सवाल है कि क्या जमरानी बांध के निर्माण से तराई और कुमाऊं के जंगलों के बीच वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित होगी? खासकर बाघों के उस संभावित संपर्क मार्ग का क्या होगा, जिसका उल्लेख भारतीय वन्यजीव संस्थान की वैज्ञानिक रिपोर्ट में किया गया है?


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WII की रिपोर्ट में दर्ज है कॉरिडोर का उल्लेख : भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII), देहरादून ने मई 2023 में जमरानी बहुउद्देशीय परियोजना के पारिस्थितिक प्रभावों को लेकर एक विस्तृत स्थल निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की थी। यह रिपोर्ट राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के लिए तैयार की गई थी।

रिपोर्ट में परियोजना क्षेत्र को दुधवा-लाग्गा टाइगर कॉरिडोर से संबंधित महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया गया है। इसमें कॉर्बेट से दुधवा के बीच संभावित वन्यजीव संपर्क मार्ग की चर्चा करते हुए बताया गया है कि इस मार्ग की एक शाखा प्रस्तावित बांध के जलमग्न क्षेत्र से गुजरती है।

WII के अध्ययन के अनुसार संबंधित कॉरिडोर का क्षेत्र लगभग 24 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें प्रस्तावित जलाशय के पूर्ण जलस्तर पर लगभग 4.28 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। यह कुल क्षेत्र का लगभग 17.85 प्रतिशत है।

हालांकि रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि कॉरिडोर की एक दूसरी शाखा घने जंगलों से गुजरती है और प्रस्तावित जलाशय से सीधे प्रभावित नहीं होगी। परियोजना से जुड़े दस्तावेजों में जलाशय के किनारों पर वन्यजीवों की आवाजाही के लिए उपलब्ध स्थान का भी उल्लेख किया गया है।

बाघों की मौजूदगी के प्रमाण, लेकिन एक जरूरी वैज्ञानिक अंतर : WII की रिपोर्ट में अखिल भारतीय बाघ आकलन के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2018 में परियोजना स्थल से 10 किलोमीटर के भीतर और 2022 में 15 किलोमीटर के भीतर कैमरा ट्रैप में बाघ दर्ज किए गए थे।

अप्रैल-मई 2023 के क्षेत्रीय अध्ययन में 22 कैमरा ट्रैप के माध्यम से 14 स्तनधारी प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई। इनमें तेंदुआ, सांभर, हिमालयन गोरल, हिमालयन सिरो और अन्य वन्यजीव शामिल थे।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन आंकड़ों से बांध के निर्माण स्थल पर बाघों की नियमित मौजूदगी सिद्ध नहीं होती, लेकिन आसपास के जंगलों में उनकी उपस्थिति और वन्यजीव आवास की महत्ता जरूर सामने आती है।

WII की रिपोर्ट में संरक्षण उपायों पर गंभीर टिप्पणी: इस पूरी परियोजना के संदर्भ में WII की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसकी सिफारिशें हैं।

संस्थान ने दो संभावित विकल्पों पर विचार किया। पहला, यदि बाघ कॉरिडोर का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता है तो इस क्षेत्र में विकास परियोजना से बचा जाना चाहिए। दूसरा, यदि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर परियोजना आगे बढ़ाई जाती है तो कठोर पर्यावरणीय शर्तें, स्वतंत्र निगरानी और दीर्घकालिक वैज्ञानिक अध्ययन अनिवार्य होने चाहिए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पहले से तैयार टाइगर कॉरिडोर प्रबंधन योजना की गतिविधियां पर्याप्त नहीं हैं। निर्माण के दौरान और बांध चालू होने के बाद भी वन्यजीवों की आवाजाही, उनके आवास और व्यवहार पर लगातार अध्ययन होना चाहिए।

विशेषज्ञों ने स्वतंत्र बहुविषयक समिति गठित करने और प्रत्येक छह महीने में संरक्षण उपायों की निगरानी करने की सिफारिश की थी।

2026 में फिर सामने आया वन्यजीव पुलों का सवाल

इस बीच सितंबर 2026 में प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट में बताया गया कि प्रस्तावित जलाशय क्षेत्र में बाघों की आवाजाही के लिए दो विशेष वन्यजीव पुल बनाए जाने हैं, लेकिन उनकी लोकेशन तय करने में असमंजस बना हुआ था।

यदि पुलों का निर्माण होना है तो उनका स्थान, ऊंचाई, चौड़ाई, प्राकृतिक वनस्पति और वन्यजीवों की वास्तविक आवाजाही के आधार पर डिजाइन तय होना बेहद जरूरी है। केवल कंक्रीट का पुल बना देना वन्यजीवों की निर्बाध आवाजाही की गारंटी नहीं हो सकता।

32 करोड़ रुपये के प्रस्ताव ने बढ़ाई जवाबदेही की जरूरत : अक्टूबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार टाइगर कॉरिडोर प्रबंधन योजना का संशोधित बजट 19.07 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 32 करोड़ रुपये प्रस्तावित किया गया है। इसमें से 10.74 करोड़ रुपये पहले ही वन विभाग को दिए जाने की बात भी सामने आई है। संशोधित प्रस्ताव शासन की मंजूरी के लिए भेजा गया था।

वहीं 31 अक्टूबर को प्रकाशित एक अन्य रिपोर्ट में परियोजना अधिकारी ने 22 करोड़ रुपये से अधिक के वन्यजीव संरक्षण बजट, दस साल की निगरानी, कैमरा ट्रैप, GPS कॉलरिंग और बायोफेंसिंग की योजना का उल्लेख किया।

इन बजट आंकड़ों का आपसी संबंध और वास्तविक स्वीकृति की स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है। इसलिए परियोजना इकाई और वन विभाग को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि अब तक कितनी धनराशि स्वीकृत हुई, कितनी जारी हुई और उससे जमीन पर कौन-कौन से काम पूरे किए गए।

विकास भी जरूरी, प्रकृति का संरक्षण भी : जमरानी बांध से हल्द्वानी को 42.7 मिलियन घनमीटर पेयजल उपलब्ध कराने और लगभग 57 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि क्षेत्र को सिंचाई का लाभ देने का प्रावधान है। ऐसे में इस परियोजना की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।

लेकिन विकास का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब उसके साथ पर्यावरणीय संतुलन भी कायम रहे। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि वे अनेक प्रजातियों के आवास और प्राकृतिक आवागमन के मार्ग होते हैं।

इसलिए जरूरी है कि परियोजना इकाई, वन विभाग, NTCA और स्वतंत्र वन्यजीव विशेषज्ञ मिलकर यह सुनिश्चित करें कि प्रस्तावित वन्यजीव पुल, वैकल्पिक मार्ग, पौधरोपण, जल स्रोत और निगरानी व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित न रहें।

अब प्रशासन से कुछ सीधे सवाल ?

क्या जमरानी क्षेत्र में टाइगर कॉरिडोर की वास्तविक लोकेशन चिह्नित हो चुकी है? क्या प्रस्तावित वन्यजीव पुलों का डिजाइन और निर्माण स्थल तय हो गया है? क्या WII की रिपोर्ट में बताई गई कमियों को दूर कर दिया गया है? क्या 10 साल की निगरानी और स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हो चुके हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वन्यजीव संरक्षण के लिए निर्धारित धनराशि का वास्तविक उपयोग जमीन पर दिखाई दे रहा है?

इन सवालों के जवाब केवल वन्यजीव प्रेमियों के लिए नहीं, बल्कि हल्द्वानी और पूरे कुमाऊं के नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

क्योंकि जमरानी बांध से पानी और विकास की उम्मीदें जुड़ी हैं, लेकिन इस क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत और वन्यजीवों का भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

विकास ऐसा हो जो इंसान की प्यास भी बुझाए और जंगल के बाशिंदों के रास्ते भी सुरक्षित रखे।

परियोजना प्रबंधन का आधिकारिक पक्ष

‘वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 10 साल तक होगी सैटेलाइट से निगरानी’

जमरानी बांध परियोजना के उप महाप्रबंधक बी.बी. पांडेय के अनुसार, परियोजना क्षेत्र टाइगर कॉरिडोर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की गाइडलाइन के अनुरूप वन्यजीव संरक्षण की योजना तैयार की गई है।

पांडेय के मुताबिक, वन्यजीवों की आवाजाही पर बांध का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, इसके लिए अगले 10 वर्षों तक सैटेलाइट आधारित निगरानी की जाएगी। परियोजना से संबंधित 352 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रभावित हो रहे लगभग 10 प्रतिशत कॉरिडोर को नए सिरे से विकसित करने की योजना है।

उन्होंने बताया कि वन्यजीव संरक्षण के लिए 22 करोड़ रुपये से अधिक का बजट रखा गया है। इसके तहत कैमरा ट्रैप, जीपीएस कॉलरिंग और आसपास के गांवों में बायो फेंसिंग जैसे कार्य किए जाएंगे। सैटेलाइट से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर हर छह महीने में रिपोर्ट NTCA को भेजी जाएगी।

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