जीआईसी लोधिया में दहशत, बारिश के बीच भरभराकर गिरा मुख्य भवन की छत का प्लास्टर
चंद सेकंड पहले ही कुर्सी से उठे थे शिक्षक
सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा। राजकीय इंटर कॉलेज लोधिया में बुधवार को उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब स्कूल के मुख्य भवन स्थित स्टाफ रूम की छत का भारी प्लास्टर अचानक भरभराकर नीचे आ गिरा। संयोग से घटना से कुछ ही क्षण पहले एक शिक्षक उस कुर्सी से उठकर खिड़की खोलने गए थे, जिस पर बैठकर वह अपना काम कर रहे थे। शिक्षक के उठते ही उसी स्थान पर छत का मलबा गिर पड़ा। यदि शिक्षक कुछ सेकंड और वहीं बैठे रहते तो गंभीर हादसा होना तय माना जा रहा था।
घटना के बाद स्टाफ रूम में मौजूद शिक्षक सहम गए। कुछ देर के लिए पूरे विद्यालय परिसर में भय और तनाव का माहौल बन गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विद्यालय भवन की छत इतनी जर्जर स्थिति में पहुंच चुकी है कि उसका प्लास्टर अचानक गिरने लगा है, तो यहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं और कार्यरत शिक्षकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
कुर्सी खाली हुई और मौत का खतरा उसी जगह आ गिरा
बताया गया कि बुधवार को विद्यालय के मुख्य भवन स्थित स्टाफ रूम में शिक्षक नियमित कामकाज में जुटे थे। इसी दौरान एक शिक्षक अपनी कुर्सी से उठे और खिड़की खोलने के लिए वहां से कुछ कदम दूर चले गए। अभी उन्हें कुछ ही क्षण हुए थे कि अचानक छत का प्लास्टर टूटकर उसी कुर्सी पर जा गिरा।
कुछ पल पहले तक जिस जगह शिक्षक बैठे थे, वहां देखते ही देखते छत का मलबा बिखरा पड़ा था। घटना ने विद्यालय में मौजूद सभी लोगों को झकझोर दिया। गनीमत रही कि शिक्षक समय रहते अपनी सीट से उठ गए, अन्यथा गिरता हुआ मलबा सीधे उनके ऊपर आ सकता था।
बारिश के मौसम में इस तरह छत का प्लास्टर गिरना विद्यालय भवन की मौजूदा हालत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह घटना महज एक दुर्घटना टलने की कहानी नहीं, बल्कि उस खतरे का संकेत है जो कभी भी बड़े हादसे में बदल सकता है।
आज प्लास्टर गिरा है, कल क्या होगा?
जीआईसी लोधिया की स्थिति को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। विद्यालय का मुख्य भवन करीब 48 वर्ष पुराना बताया जा रहा है और वर्तमान में इसकी हालत काफी जर्जर हो चुकी है। मुख्य भवन के अलावा विद्यालय परिसर में मौजूद कई अन्य कक्षा-कक्ष और कार्यालय भी सुरक्षित नहीं माने जा रहे हैं।
जर्जर भवनों के बीच छात्र-छात्राओं को पढ़ाई करनी पड़ रही है और शिक्षक अपनी जिम्मेदारियां निभाने को मजबूर हैं। ऐसे में अभिभावकों की चिंता स्वाभाविक है। उनका सीधा सवाल है—जब भवन की छत ही भरोसेमंद नहीं है तो उसके नीचे बच्चों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
बुधवार की घटना ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
नए निर्माण भी सवालों के घेरे में
चिंता सिर्फ पुराने भवनों तक सीमित नहीं है। विद्यालय परिसर में पिछले दो-तीन वर्षों के दौरान और उससे पहले भी कुछ नए निर्माण कराए गए हैं। लेकिन इन निर्माणों में भी जगह-जगह दीवारों और फर्श पर बड़ी दरारें दिखाई देने की बात सामने आई है।
बारिश के दौरान कुछ छतों से पानी टपकने और प्लास्टर उखड़ने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में अभिभावक यह जानना चाहते हैं कि अपेक्षाकृत नए निर्माण इतनी जल्दी खराब हालत में कैसे पहुंच गए।
यही वजह है कि विद्यालय के निरीक्षण के दौरान अभिभावकों ने निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की भी जांच कराने की मांग प्रशासन के सामने रखी थी। यदि नए निर्माणों में भी तकनीकी खामियां सामने आती हैं तो इसकी जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग भी उठ रही है।
डीएम के निरीक्षण के बाद जगी उम्मीद
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिलाधिकारी अंशुल सिंह ने बीते दिवस ही राजकीय इंटर कॉलेज लोधिया का स्थलीय निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान उन्होंने विद्यालय की वास्तविक स्थिति का जायजा लिया और पाया कि परिसर की कुछ इमारतें छात्रों और शिक्षकों के लिए सुरक्षित नहीं हैं।
डीएम ने संबंधित अधिकारियों को नियमानुसार जर्जर भवनों के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने के साथ ही विद्यालय के लिए नए भवन की कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए थे।
डीएम के निरीक्षण के ठीक बाद छत का प्लास्टर गिरने की घटना ने भवनों की जर्जरता को और स्पष्ट कर दिया है। इससे यह भी सामने आया है कि विद्यालय की इमारतों की स्थिति केवल कागजी निरीक्षण का विषय नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में बच्चों और शिक्षकों के सामने मौजूद वास्तविक खतरा है।
अभिभावकों की मांग—मरम्मत तक बच्चों को खतरे से दूर रखा जाए
घटना के बाद अभिभावकों में भी चिंता बढ़ गई है। उनका कहना है कि जब तक जर्जर भवनों की मरम्मत, पुनर्निर्माण अथवा ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक बच्चों और शिक्षकों को ऐसे भवनों में बैठाना उचित नहीं है।
अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि विद्यालय की असुरक्षित इमारतों का तकनीकी परीक्षण कराया जाए और जहां भवन खतरनाक पाए जाएं, वहां तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। जरूरत पड़ने पर विद्यालय के संचालन के लिए अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाए, ताकि किसी अनहोनी की स्थिति पैदा न हो।
उनका कहना है कि सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा किसी भी स्थिति में समझौते का विषय नहीं हो सकती।
हादसा टला, लेकिन खतरे की घंटी बज गई
जीआईसी लोधिया में बुधवार को कोई जनहानि नहीं हुई, यह राहत की बात जरूर है। लेकिन जिस तरह एक शिक्षक के उठने के कुछ ही क्षण बाद उनकी कुर्सी पर छत का मलबा आ गिरा, उसने पूरे विद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर खतरे की घंटी जरूर बजा दी है।
आज एक शिक्षक बाल-बाल बच गए। सवाल यह है कि अगली बार यदि ऐसी घटना कक्षा में हुई और उस वक्त वहां दर्जनों बच्चे मौजूद हुए तो क्या होगा?
घटना ने प्रशासन के सामने एक स्पष्ट संदेश रख दिया है—जर्जर भवनों की समस्या को अब केवल मरम्मत या निरीक्षण की फाइलों तक सीमित रखने के बजाय जमीन पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। बच्चों और शिक्षकों की सुरक्षा के लिए अब इंतजार नहीं, तत्काल निर्णय की आवश्यकता है।




