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एक गांव की गृहिणी और दूसरे गांव के किसान ने पेश की सफलता की मिसाल!

╰┈➤ सोच बदली तो बदली किस्मत: राधा की एनआरएलएम, तो हरीश की शहतूत ने बदली तकदीर

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सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा: जिले के दो गांवों से सफलता की प्रेरणादायी कहानी सामने आई है, जिसमें एक गृ​हणी और प्रगतिशील किसान ने यह प्रेरणा दे डाली है कि सोच बदलो, तो तकदीर भी बदलती है। भिकियासैंण के धमेड़ा गांव के गरीब परिवार से जुड़ी गृहणी राधा रावत के लिए एनआरएलएम फलीभूत साबित हुआ। उन्होंने डेयरी व पशुपालन को स्वरोजगार बनाया और अब सालाना ढाई लाख कमा कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। दूसरी ओर धौलादेवी के बमनस्वाल गांव के एक किसान हरीश जोशी ने परंपरागत खेती में बदलाव लाकर शहतूत और रेशम कीटपालन को अपनाया, जिससे कभी 30 हजार रुपये मात्र सालाना बचत करने वाले किसान की किस्मत ही बदल दी। बड़ी बात यह है कि उनके इस कदम से गांव के 34 और किसानों ने भी रेशम कीटपालन शुरू कर दिया है।
शहतूत उत्पादन और रेशम कीटपालन से बदली तकदीर

विकासखंड धौलादेवी के ग्राम बमनस्वाल निवासी प्रगतिशील कृषक पहले परंपरागत खेती पर निर्भर थे, जिसमें छोटी जोत, कड़ी मेहनत व अधिक कृषि लागत के बावजूद साल में करीब 30 से 40 हजार रुपये मात्र की बचत होती थी। उन्होंने सोच बदली, शहतूत की खेती और रेशम कीट पालन को अपनाया और अपनी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत कर ली है। साथ ही गांव के 34 किसानों ने प्रेरित होकर रेशम कीटपालन को सहायक व्यवसाय के रूप में अपनाया है।
विकासखण्ड धौलादेवी के ग्राम बमनस्वाल निवासी प्रगतिशील कृषक हरीश जोशी ने अपनी आय बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। सीमित भूमि और संसाधनों के बावजूद रेशम कीटपालन से प्राप्त अतिरिक्त आय ने उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है। हरीश जोशी पहले गेहूं, धान एवं सब्जियों की परम्परागत खेती करते थे। छोटी जोत एवं कृषि लागत अधिक होने के कारण वर्षभर की मेहनत के बावजूद लगभग 30 से 40 हजार रुपये की ही बचत हो पाती थी। वर्ष 2017-18 में ग्राम पंचायत भवन में रेशम विभाग की एक जागरूकता गोष्ठी ने उन्हें जगाने का काम किया। जहां उन्हें शहतूत की खेती के साथ रेशम कीटपालन की जानकारी मिली। विभागीय अधिकारियों एवं वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन से प्रेरित होकर रेशम कीटपालन को अपनाने का निर्णय लिया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद हरीश जोशी ने लगभग एक एकड़ भूमि में शहतूत की एस-146 प्रजाति का रोपण कर करीब 30 डीएफएल से रेशम कीटपालन शुरू किया। रेशम कीटपालन से प्राप्त बेहतर परिणामों के बाद उन्होंने इस कार्य का विस्तार किया।

वर्ष 2026-27 में उनके द्वारा लगभग 4.5 एकड़ क्षेत्र में टी-5 प्रजाति के करीब 5,000 शहतूत पौधों का रोपण किया गया तथा कीटपालन को बढ़ाकर लगभग 50 डीएफएल कर दिया गया। रेशम विकास विभाग द्वारा हरीश जोशी को 03 दिवसीय निःशुल्क प्रशिक्षण, शहतूत के पौधे, 90 प्रतिशत अनुदान, कीटपालन उपकरण एवं कृषि उपकरण उपलब्ध कराए गए। इसके साथ ही विभागीय वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया गया। उन्होंने अपनी पहली फसल में ही लगभग 25 किलोग्राम रेशम कोकून का उत्पादन किया, जिसकी बाजार कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम रही। वर्तमान में रेशम कीटपालन से उन्हें वर्ष में दो फसलों के माध्यम से लगभग 25 हजार रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। भविष्य में उनकी यह आमदनी कई गुना बढ़ने की उम्मीद जगी है। उनकी सफलता से प्रेरित होकर ग्राम बमनस्वाल के 34 अन्य किसानों ने रेशम कीटपालन को सहायक व्यवसाय के रूप में चुना है। इससे गांव में स्वरोजगार एवं अतिरिक्त आय के नए अवसर विकसित हुए हैं। हरीश जोशी ने रेशम विकास विभाग का आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि विभागीय प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन से उन्हें आय का नया स्रोत मिला है।
पशुपालन व डेयरी ने बदली राधा की किस्मत

जिले के भिकियासैंण ब्लाक अंतर्गत ग्राम धमेड़ा निवासी राधा रावत के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) काफी फलीभूत रहा है। कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण कभी परिवार की दो जून की रोटी कमाना मुश्किल हो रहा था, किंतु अब डेयरी व पशुपालन को रोजगार का जरिया बनाकर आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर ली है। आज राधा की करीब ढाई लाख रुपये वार्षिक आय है।

धमेड़ा गांव निवासी राधा रावत पत्नी अमर सिंह एक कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार से जुड़ी है, जो गृ​हणी तक सीमित थी। वजह यह थी कि उनके पास को कोई व्यवसाय व नियमित आजीविका का कोई साधन नहीं था। चिंता थी परिवार के गुजर बसर की। इसी बीच राधा ने कुछ नया करने की ठानी और वर्ष 2022 में ‘ज्योति स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ गई। समूह की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करते हुए उन्होंने ग्राम संगठन एवं क्लस्टर संगठन की गतिविधियों से भी खुद को जोड़ा और आजीविका संबंधी योजनाओं की जानकारी ली। फिर लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ी और एनआरएलएम के जरिये विकासखण्ड स्तर पर डेयरी प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। वहां राधा रावत ने दुग्ध उत्पादन एवं पशुपालन से संबंधित जरूरी जानकारियां लेते हुए तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया।

इसके बाद उन्होंने पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया और पंतनगर से अच्छी नस्ल की एक गाय एवं एक भैंस खरीदी तथा राजस्थान से अच्छी नस्ल की बकरियां क्रय कर पशुपालन कार्य प्रारम्भ किया। इसके बाद गांव में ही डेयरी व्यवसाय शुरू कर दिया और स्थानीय स्तर पर दूध बेचना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनके व्यवसाय में तरक्की हुई और उनके उत्पादों स्थानीय बाजार तक पहुंच गए। यह व्यवसाय उनके लिए मजबूत आधार बनने लगा। वर्तमान में उन्हें अपने व्यवसाय से लगभग 20 हजार रुपये प्रतिमाह की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है तथा उनकी वार्षिक आय लगभग 2.50 लाख रुपये तक पहुंच गई है। आज उनके उत्पादों की बिक्री धमेड़ा, घुघती एवं बाजन के स्थानीय बाजारों तथा स्थानीय दुकानों के माध्यम से की जा रही है। अपने गांव में एक मिसाल कायम करके राधा रावत ने यह साबित कर दिखा दिया है कि स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं आत्मनिर्भर एवं सशक्त बन सकती हैं।

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