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‘माफ़ करना, पर काम तो करना पड़ेगा!’—नाना के निधन पर छुट्टी मांगी तो मैनेजर ने दिया ‘इमोशनलेस’ आदेश, कॉर्पोरेट ज़हर हुआ वायरल

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नई दिल्ली: कॉर्पोरेट जगत में ‘टॉक्सिक वर्क कल्चर’ एक जुमला नहीं, बल्कि एक डरावनी हकीकत बन चुका है। इसी ज़हरीले माहौल की नुमाइंदगी करती एक सनसनीखेज़ घटना सामने आई है, जिसने सोशल मीडिया पर भूचाल ला दिया है। एक कर्मचारी ने अपने नाना के निधन के बाद छुट्टी मांगी, तो मैनेजर ने जो जवाब दिया, उसे पढ़कर हर संवेदनशील इंसान स्तब्ध रह गया है।

यह मार्मिक किस्सा ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) प्लेटफॉर्म पर ‘Stutii’ नामक यूज़र द्वारा साझा किया गया है। अपनी पोस्ट के माध्यम से, उन्होंने वर्तमान कॉर्पोरेट संस्कृति की संवेदनहीन सच्चाई को आम जनता के सामने रखा है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे प्रबंधक (मैनेजरियल) वर्ग किसी की मृत्यु जैसी मानवीय घटना पर भी या तो पूरी तरह संवेदनहीन हो जाता है, या फिर ऐसा करने पर मजबूर होता है।

निजी क्षेत्र के कर्मचारी जिस बेलगाम वर्क लोड (Work Load) और अत्यधिक दबाव से जूझ रहे हैं, यह चैट उसकी एक कड़वी बानगी है। उनकी इस पोस्ट के वायरल होते ही, बड़ी संख्या में यूज़र्स अपनी-अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं और इस ज़हरीले माहौल के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठा रहे हैं।

शोक की घड़ी में भी काम का बुलावा: इंसानियत बनाम डेडलाइन

मामला एक रेडिट पोस्ट के ज़रिए दुनिया के सामने आया है। पोस्ट में कर्मचारी ने उस ‘मैनेजर’ के साथ हुई अपनी WhatsApp चैट के स्क्रीनशॉट्स साझा किए हैं, जिसका दिल शायद कंपनी के प्रॉफिट चार्ट में बदल चुका है।

कर्मचारी ने संदेश भेजा कि रात को उनके नानाजी का देहांत हो गया है, इसलिए वह ऑफिस नहीं आ पाएगा। किसी भी सामान्य कार्यस्थल पर यह खबर सुनते ही तत्काल छुट्टी और संवेदनाएं भेजी जाती हैं।

लेकिन इस मैनेजर का जवाब सुनकर आपको लगेगा कि आपने किसी मशीन से बात की है, इंसान से नहीं।

मैनेजर ने कथित तौर पर शोक व्यक्त करने की औपचारिकता पूरी की और तुरंत अगला ‘आदेश’ जारी कर दिया:

“नाना की मौत का दुख तो है, लेकिन काम करना पड़ेगा। कृपया WhatsApp पर एक्टिव रहें।”

जी हाँ, मैनेजर ने शोक संतप्त कर्मचारी को सांत्वना देने के बजाय, तत्काल काम पर हाज़िर रहने और वर्चुअल रूप से उपलब्ध रहने का फरमान सुना दिया। यह जवाब कॉर्पोरेट जगत के उस स्याह पहलू को उजागर करता है, जहाँ कर्मचारियों को महज़ एक ‘संसाधन’ (resource) समझा जाता है, इंसान नहीं।

क्या मैनेजर्स बनने के लिए ‘आत्मा’ भी बेचनी पड़ती है?

पिछले दो सालों से कंपनी के लिए पसीना बहा रहे इस कर्मचारी का दर्द सोशल मीडिया पर फूट पड़ा है। उसने सवाल किया है कि क्या मैनेजर्स बनने के लिए अपनी आत्मा भी बेचनी पड़ती है? क्या वे भूल जाते हैं कि कर्मचारी मशीन नहीं, बल्कि हाड़-मांस के बने इंसान हैं, जिनके पास भावनाएं और परिवार होते हैं?

यह घटना सिद्ध करती है कि अब रिश्तेदारों या करीबियों की मृत्यु पर भी ऑफिस से छुट्टी लेना एक मुश्किल प्रक्रिया बन सकती है। काम का दबाव इतना बेतहाशा बढ़ चुका है कि कर्मचारियों को छुट्टी के दौरान भी ‘रिमोटली एक्टिव’ रहने की अपेक्षा की जाती है।

‘सस्ता वड़ा पाव, बड़ा बिज़नेस’: यूज़र्स का फूटा गुस्सा

रेडिट पर इस पोस्ट को देखने के बाद यूज़र्स का गुस्सा सातवें आसमान पर है।

  • एक यूज़र ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा, “ये ‘लाला कंपनी’ वड़ा पाव की कीमत में MNC (बहुराष्ट्रीय कंपनी) चलाना चाहती हैं।”
  • दूसरे यूज़र ने अपनी आपबीती सुनाई, “आजकल हमें हर हाल में WhatsApp पर चिपके रहना होता है। हमारी कंपनी में भी दुख-तकलीफ की कोई बात नहीं सुनी जाती।”

कर्मचारी ने यह भी बताया कि कंपनी ने फंड की कमी का हवाला देते हुए कई लोगों को बाहर निकाल दिया है, और बचे हुए कर्मचारियों पर उनके हिस्से का काम भी थोप दिया है। इससे उनके रोल और ज़िम्मेदारियाँ बेतरतीब तरीके से बढ़ा दी गई हैं।

यह सनसनीखेज़ चैट न सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी है, बल्कि यह उस टॉक्सिक वर्क कल्चर पर एक करारा तमाचा है, जहाँ मुनाफ़े के सामने मानवीय संवेदनाएँ घुटने टेक देती हैं।

‘यह हद पार है’ – एक और हैरतअंगेज़ किस्सा

इस वायरल पोस्ट के कमेंट बॉक्स में, Paresh Pisipati नामक एक यूज़र ने जो अनुभव साझा किया है, वह तो हैरत की पराकाष्ठा है और कॉर्पोरेट जगत के नैतिक पतन को दर्शाता है।

Paresh ने लिखा कि जब उन्होंने अपने चाचा की मृत्यु के कारण छुट्टी मांगी, तो उनके मैनेजर का जवाब और भी ज़्यादा संवेदनहीन था। मैनेजर ने निर्दयता से कहा: वह कोई आपके सगे परिजन थोड़े ही थे? आज एक ज़रूरी मीटिंग है, उसे अटेंड करके आप घर जा सकते हैं।”

यह टिप्पणी कॉर्पोरेट जगत के उस अमानवीय चेहरे को सामने लाती है, जहाँ कर्मचारियों के व्यक्तिगत दुख को गैर-ज़रूरी बताकर, तत्काल व्यावसायिक बैठकों को प्राथमिकता दी जाती है। यह दिखाता है कि इस माहौल में, कर्मचारियों के पारिवारिक संबंधों का भी कोई मोल नहीं रह गया है।

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Deepak Manral
Deepak Manralhttp://creativenewsexpress.com
तीन दशकों के करीब का कार्यानुभव रखने वाले दीपक मनराल पत्रकारिता जगत का एक सम्मानित नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वर्ष 1996 में एक त्रैमासिक पत्रिका के सहयोगी संपादक के रूप में की थी। बीते 25 वर्षों में उन्होंने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक आज, उत्तरांचल दीप और चारधाम टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में 'ब्यूरो प्रमुख' की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। वर्तमान में वे 'गंगोत्री अक्षर उजाला पोस्ट' के संपादक हैं और सीएनई (CNE) मीडिया हाउस के संस्थापक व स्वामी के रूप में डिजिटल मीडिया को नई दिशा दे रहे हैं। अपनी निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले मनराल आज भी प्रतिदिन 'ग्राउंड ज़ीरो' से जुड़कर सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं।
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