👉 125 दिन वेंटिलेटर में रहने बाद 151 दिन में मां की गोद में मारी किलकारी
👉 अल्मोड़ा मेडिकल कालेज के शिशु एवं बाल रोग विभाग की मेहनत लाई रंग
👉 गरीब दंपति के लिए लोगों ने निभाया मानवता का फर्ज, हंसी-खुशी लौटे
— चंदन नेगी —
अल्मोड़ा: जन्म लेते ही एक शिशु ने मशीनों के सहारे जिंदगी और मौत के बीच करीब चार माह संघर्ष झेला और मौत के मुंह से बाहर निकलकर महीनों बाद मां की गोद में किलकारी मारी। यहां राजकीय मेडिकल कालेज अल्मोड़ा के शिशु एवं बाल रोग विभाग के अथक प्रयासों से यह संभव हो सका। यह मामला चर्चा का विषय है और अल्मोड़ा मेडिकल कालेज की बड़ी उपलब्धि है। खास बात यह है कि उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं को तरसते पहाड़ में यह सब हुआ। पैदा होने के बाद यह शिशु 125 दिन वेंटिलेटर में रहा और 151 दिन का यह शिशु स्वस्थ्य होकर अस्पताल से स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हुआ।

दरअसल, अल्मोड़ा जनपद के धौलादेवी ब्लाक अंतर्गत गांव कांडानौला निवासी 22 वर्षीय सपना पत्नी कृष्ण कुमार टम्टा ने 21 फरवरी 2025 समय से पूर्व सात माह में जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। समय पूर्व प्रसव के कारण बेहद कम वजन व अस्वस्थता के कारण एक शिशु जीवित नहीं रह सका, दूसरे शिशु का भी वजन बेहद कम था और उसे सांस लेने में तकलीफ होने के साथ ही अन्य समस्याएं भी थीं। इसके बाद मेडिकल कालेज के शिशु एवं बाल रोग विभाग के गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में भर्ती किया गया और चिकित्सकों की टीम उसे बचाने के प्रयासों में जुट गई।
चिकित्सा अधीक्षक एवं बाल रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. अमित कुमार सिंह ने बताया कि उपचार के लिए शिशु को सघन निगरानी में रखा गया। बीमार शिशु देखभाल इकाई (SNCU) के कंसल्टेंट्स डॉ. बीएल जायसवाल, असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गौरव पांडेय, सीनियर रेजिडेंट डॉ. हर्ष गुप्ता एवं विभाग के समस्त जूनियर रेजिडेंट की टीम ने पूरे मनोयोग के साथ बच्चे का उपचार किया। नर्सिंग इंचार्ज एकता सिंह एवम नीलिमा पीटर के निर्देशन में एसएनसीयू के नर्सिंग अधिकारियों की दिन रात की मेहनत और देखभाल से 125 दिन बाद शिशु को सकुशल जीवन रक्षक उपकरणों से बाहर निकालने में सफलता मिली। इसके बाद 22 जुलाई 2025 को शिशु की हालत बिल्कुल सही पाने के बाद उसे अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया और माता-पिता के सुपुर्द किया गया। अपने आंचल में बच्चे को सुरक्षित पाकर दोनों बेहद प्रसन्न हुए और चिकित्सकों व नर्सिंग स्टाफ का धन्यवाद करते नहीं थके। इसके बाद खुशियों की सवारी से अपने गांव को निकले। वहीं अपनी बड़ी सफलता से गदगद अस्पताल की टीम में शामिल डॉ. उज्मां, स्वास्थ्य शिक्षक प्रियंका बहुगुणा, नर्सिंग अधिकारी दीपा, सीमा, उमा, सुनीता, सुष्मिता, मीनाक्षी, भारती व सहयोगी स्टाफ दया, मेघा आदि की आंखों में खुशी के आसूं छलक आए।
उपचार से वजन तिगुनी वृद्धि हुई
महज अल्मोड़ा मेडिकल कालेज ही नहीं बल्कि पूरे पहाड़ के अस्पतालों में अपने तरह का शायद यह पहला मामला है, जब कोई नवजात शिशु इतनी लंबी अवधि तक वेंटिलेटर में रहने के बाद पूर्णतः स्वस्थ्य हुआ हो। इस शिशु का वजन 800 ग्राम था, जो स्वस्थता के बाद 2500 ग्राम तक पहुंचा। बाल रोग विभाग की इस उपलब्धि पर मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. सीपी भैंसोड़ा ने भरपूर सराहना की है।
गरीब परिवार को मिले संकटमोचक
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि शिशु के माता-पिता गरीब तबके से हैं। इस युवा दम्पति के परिवार में कोई वरिष्ठ सदस्य भी नहीं था। एकल परिवार होने के कारण बच्चे की दवा, दूध और नियमित देखभाल की व्यवस्था विभागाध्यक्ष डॉ. अमित कुमार सिंह की ओर की गई। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण माता-पिता बच्चे का अन्यत्र उपचार कराने की स्थिति में भी नहीं थे। उसकी स्थिति देख अस्पताल के स्टाफ एवं कुछ स्थानीय दान दाताओं के सहयोग से बच्चे का उपचार जारी रखा गया। यहां तक कि परिजनों ने रक्त की व्यवस्था कर पाने में भी असमर्थता जता दी। इसके बाद रक्त कोष ने स्वैच्छिक रक्तदाताओं के माध्यम से पूरी अवधि में 18 बार रक्त उपलब्ध कराया।

