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उत्तराखंड में नरभक्षी : कोई शनिवार को करता था शिकार तो कोई 21 तारीख को ही मारता था लोगों को, पढ़िए नरभक्षियों से जुड़े अनसुलझे रहस्य, शिकारी लखपत की जुबानी

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तेजपाल नेगी

हल्द्वानी। उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्से इन दिनों तेंदुओं के खौफ से भयाक्रांत हैं। अल्मोड़ा हो या हल्द्वानी यहां दो तेंदुए नरभक्षी घोषित किए गए हैं। इनमें से एक को शिकारी की गोली भी लग चुकी है। लेकिन अभी तक उसका कोई अता पता नहीं है। इस बीच उत्तराखंड के प्रसिद्ध शिकारी लखपत सिंह रावत ने सीएनई के साथ बातचीत में नरभक्षी बाघों के कुछ ऐसे रहस्यों से पर्दा उठाया है जिनका व्यवहार आज तक शोधकर्ताओं की समझ में नहीं आ सका है।
लखपत 17 जुलाई को कुमाऊं के दौरे पर होंगे। इससे पहले हम आपको बता रहे कुछ ऐसे नरभक्षियों के कहानी जिनका व्यवहार आज तक रहस्य बना हुआ है। सबसे पहले बात सटरडे किलर की। यह ऐसा तेंदुआ था जो सिर्फ शनिवार को ही इंसानी शिकार करता था। वर्ष 2009 में यह तेंदुआ सक्रिय हुआ था और मरने से पहले यह चार लोगों का शिकार कर चुका था। इत्तेफाक देखिए इस नरभक्षी का शिकार भी शनिवार को ही किया गया था। वे बताते हें कि इतिहास में कुछ नरभक्षी ऐसे भी हुए हें जो मंगलवार या शनिवार को ही लोगों की हत्या करते थे। पूछने पर लखपत बताते हैं कि इसका वैज्ञानिक कारण तो नहीं पता चल सका है लेकिन पहाड़ों पर मान्यता है कि तेंदुए या बाघ देवी के वाहन हें और जब उनके मुंह पर इंसानी खून लगता है तो वे और भी आक्रामक हो जाते हैं। यानी उनके अंदर राक्षसी प्रवृत्ति आ जाती है। इसलिए उन्हें मारना और भी कठिन हो जाता है।

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वर्ष 2006—7 में गैरसैंण से पौड़ी तक में एक तेंदुए ने लोगों के दिमाग में ऐसा भय भरा कि लोग शाम ढलते ही अपने घरों में कैद होने लगे। यह नरभक्षी सिर्फ 21 तारीख को ही इंसानों को अपना शिकार बनाता था। गैरसैण से होते हुए इस नरभक्षी ने कर्णप्रयाग और पौड़ी तक अपना साम्राज्य फैला लिया था। इस नरभक्षी का अंत आठ लोगों की मौत के बाद वर्ष 2007 में 23 तारीख को लखपत के हाथों ही हुआ।
एक और नरभक्षी की कहानी जो आत तक किसी की समझ में नहीं आई। वर्ष 2014 में डीडभ्हाट में एक ऐसे नरभक्षी का आतंक फैला जो सिर्फ शराबियों को ही अपना शिकार बनाता था। इस नरभक्षी ने 16 लोगों की हत्या की थी और संयोग देखिए कि सभी शराब पीये हुए थे। इस नरभक्षी के हाथों से एक मात्र आदमी जीवित बचा जो एक फौजी था। जब नरभक्षी ने उस पर हमला किया तो फौजी के परिजनों ने लाठी डंडो से पीट—पीट कर उसे मौत के घाट उतार दिया।
यह नरभक्षी शराबियों की लड़खड़ाती आवाज से पहचानता था। हत्या करने के बाद वह शराबी का पेट फाड़ कर पहले अंदर गई शराब पीता था और फिर उसका मांस खाता था।
चंपावत के मंडलक में वर्ष 2006 में एक साथ शिकार करने वाले नरभक्षियों का जोड़ा सामने आया। अमूमन तेंदुए सूमह में शिकार नहीं करते लेकिन शिकारी लखपत व उनकी टीम को पता चला था कि ग्रामीणों ने दो तेंदुओं को लोगों का पीछा करते हुए देखा था। बाद में इनमें से पहले कम उम्र वाली मादा तेंदुआ मारी गई और फिर बाद में बूढ़ी नरभक्षी तेंदुआ को मारकर शिकारियों ने लोगों को खौफ से राहत दी। लखपत बताते हैं कि दरअसल मां के साथ एक फीमेल तेंदुआ जंगल से बाहर आ गई थी। शिकार न मिलने के कारण उसकी मां ने इंसानों पर हमला करना शुरू कर दिया। बेटी भी वही मांस खाने लगी। धीरे — धीरे वह इंसानी मांस खाने की आदी हो गई। जब मां बूढ़ी हुई तो बेटी शिकार करती और मां का भी पेट भरता रहा। बताते हैं कि बेटी द्वारा किए गए हमले में कोई इंसान बचा नहीं जबकि मां द्वारा घात लगाए जाने के बाद कई लोग जिंदा बच गए। इसका अर्थ यह था कि मां के बूढ़ी हाने के कारण उसके दांतों में पुरानी सी पकड़ नहीं बची थी। बाद में वह पूरी तरह से बेटी द्वारा किए गए शिकार पर ही निर्भर होकर रह गई। शिकारियों ने पहले बेटी को मारा और फिर मां को आसान शिकार बनाया।
लखपत बताते हैं कि बागेश्वर में भी समूह में शिकार करने वाले तेंदुए सक्रिय हुए थे।

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