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गुरू पूर्णिमा पर विशेष: जाऩिये इस पर्व का महत्व, गुरु के प्रति समर्पण भाव प्रकट करने से ही पर्व की सार्थकता

अल्मोड़ा। रविवार को गुरु पूर्णिमा का खास पर्व है। इस पर्व का अपना खास महत्व है। इस पर्व को चारों के वेदों के रचियता भगवान वेदव्यास जी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। गुरू के प्रति समर्पण भाव को जागृत करने का माध्यम भी यह पर्व है। इसी उपलक्ष्य में पढ़िये अल्मोड़ा के आचार्य पंडित जगदीश चंद्र जोशी का यह आलेख:-
हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व चारों वेदों के रचयिता, महाभारत एवं श्रीमद् भागवत जैसे महाकाव्यों के रचयिता भगवान वेदव्यास जी की जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। वेदव्यास जी को आदि गुरु भी कहा जाता है। वह संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्होंने चारों वेदों को लिपिबद्ध किया। गुरू पूर्णिमा पर गुरू का पूजन की परम्परा है। इस दिन अपने से बड़ों व गुरुजनों का आशीर्वाद लिया जाता है। गुरु पूर्णिमा को गुरुओं की पूजा करने की परम्परा है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊंचा माना गया है, क्योंकि ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम भी गुरु ही हैं। गुरु शैक्षिक भी हो सकते हैं तथा आध्यात्मिक भी हो सकते हैं। हमें शिक्षा प्राप्त करने के लिए शैक्षिक गुरु आध्यात्मिक विकास करने के लिए आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता होती है।
गुरु पूर्णिमा पर गुरू के प्रति समर्पण भाव ही गुरु पूजा है। यही समर्पण भाव जीवन की सही दृष्टि गुरू के मार्गदर्शन से ही प्राप्त होती है। उदाहरण स्वरूप देवताओं के गुरु वृहस्पति, भगवान श्रीराम के गुरु वशिष्ठ एवं विश्वामित्र, श्री कृष्ण के गुरु संदीपनी, शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास, विवेकानन्द के गुरु रामाकृष्ण परमहंस प्रमुख रुप से एक आदर्श गुरु की श्रेणी में माने गये हैं। इस प्रकार भारतीय संस्कृति में अनेकों गुरु शिष्यों के उदाहरण मिलते हैं। जिन्होंने समाज में एक आदर्श प्रस्तुत किया। गुरु वरतन्तु एवं शिष्य कौत्स, एकलव्य एवं द्रोणाचार्य का वर्णन आता है, जिन्होंने अपना अंगूठा काटकर गुरु दक्षिणा में दे दिया था। गुरु चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
शास्त्रों में गुरु शब्द का अर्थ है अज्ञान रूपी अंधकार को हराकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला। गुरु कृपा के अभाव में कुछ भी सम्भव नहीं है, इसलिए प्राचीनकाल में धौम्य, च्यवन ऋषि, द्रोणाचार्य, संदीपनी, वशिष्ठ, विश्वामित्र, बाल्मीकि, गौतम, भारद्वाज, आदि ऋषियों के आश्रम विश्व विख्यात रहे हैं। बौद्ध काल में बुद्ध, महावीर, और शंकराचार्य की परम्परा से जुडे प्रसिद्ध गुरुकुल थे। जहॉ पर विश्वभर से शिक्षार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे। जहां गणित, ज्योतिष, खगोल ,विज्ञान ,भौतिकी व राजनीति आदि की शिक्षा दी जाती थी।
सन् 1925 में जब डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तो उन्होंने गुरु के महत्व को बहुत सम्मान दिया लेकिन उन्होंने अपने संगठन में किसी व्यक्ति को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था कि वर्तमान समय में व्यक्ति को गुरू बनाने से भविष्य में समस्या उत्पन्न हो सकती है। इससे व्यक्ति में कभी भी विकार आ सकते हैं, वह पतित भी हो सकता है। इसलिए उन्होंने पवित्र भगवा ध्वज को गुरू के रूप में प्रतिष्ठित किया, क्योंकि भगवा ध्वज तपोमय व ज्ञाननिष्ठ भारतीय संस्कृति का पुरातन प्रतीक है। उगते हुये सूर्य के समान ऊर्जा पराक्रमी परम्परा एवं विजयी भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। इसलिए भारतीय संत परम्परा का वेश भी भगवा ही है। गुरू के प्रति समर्पण भाव एवं आदर प्रकट करना ही गुरू पूर्णिमा मनाने की सार्थकता होगी।

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