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सितारगंज न्यूज़ : आर्थिक मंदी के बीच झूलते स्कूल और अभिभावक

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नारायण सिंह रावत

सितारगंज। ‘पृथ्वी गोल है’ अक्सर यह कहावत हम सुनते हैं। अर्थात, घूम फिर कर यदि बात फिर वही आ जाए जहां से चली थी, तो फिर कहना ही होगा कि धरती गोल है। कुछ ऐसा ही उत्तराखंड में निजी स्कूलों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच हो रहा है। स्कूल प्रंबंधन फीस को रो रहे हैं, अभिभावक बेरोजगारी और आर्थिक तंगी को रो रहे हैं तो शिक्षक अपने वेतन को लेकर परेशान हैं। मामला पूरा पैसों पर आ कर टिकता है। यह सब एक दूसरें को तारगेट कर बस अपना उल्लू सीधा करने की​ फिराक में हैं।

जैसा कि विदित ही है कि मार्च से अब तक लॉकडाउन चल रहा है। पूरे देश में आर्थिक मंदी है। करीब करीब सभी काम धंधे बंद हैं। इधर जा कर कुछ शुरू हुए हैं। अलवत्ता मार्च और अप्रैल तथा मई मध्य तक तो बुरा हाल ही था। लोग घरों में कैद रहे ऐसे में रोजगार बंद हो गया। कारखाने व अन्य काम बंद होने से लोगों के समक्ष रोजी रोटी की समस्या खड़ी हुई। यूं तो स्कूल बंद थे लेकिन स्कूल प्रंबंधन ने ऑनलाइन पढ़ाई का सिस्टम निकाल कर अपना काम दूसरे रूप में शुरू कर दिया। शासन और प्रशासन के लाख मना करने के बाद भी स्कूल प्रंबंधन अभिभावकों पर लॉकडाउन के दौरान की न केवल फीस मांग रहा है बल्कि वो जरूरत से भी ज्यादा दबाव बना रहा है।

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स्कूल प्रंबंधन का तर्क है कि उस पर स्कूल स्टाफ आदि का वेतन देना है, आदि आदि। इधर, अभिभावक इसलिए दु:खी है कि वो बच्चों की फीस आखिर लाए तो कहां से लाए? उसके पास तो काम ही नहीं बचा है। ऐसे में वो बच्चों की फीस देने में असमर्थ है और स्कूल प्रंबंधन के तानों का शिकार हो कर अवसाद की स्थिति में आ गया है। इसमें तीसरा पक्ष शिक्षकों का है। शिक्षक बता रहे हैं कि उनको स्कूल प्रबंधन उनका वेतन नहीं दे रहा है। अर्थात तीनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और अपनी अपनी व्यथा को सर्वोपरि मान बता रहे हैं।

अब इस का एक ओर पहलू भी है। वो यह कि करीब करीब जितने भी प्राइवेट स्कूल हैं वो सक्षम भी हैं। जानकार लोगों का कहना है कि वे चाहे तो अपने शिक्षकों को दो तीन माह का वेतन दे सकते हैं। लेकिन यदि स्कूल प्रबंधन ने ऐसा कर दिया तो वो फिर अभिभाकों पर फीस के लिए दबाव नहीं बना पाएंगे। अब रही ऑनलाइन क्लासों की। स्कूल प्रबंधन और शिक्षक ऑनलाइन क्लास देने को पहाड़ जैसा काम बता रहे हैं। ऐसे में छोटे बच्चे कैसे मोबाइल पर यह सब कर पढ़ रहे होंगे और कितना? यह किसी ने भी जानने की जरूरत नहीं समझी।

बच्चों के अभिभावक ऑनलाइन के चक्कर में परेशान हैं उन्हें भी बच्चों के साथ पूरा वक्त देना पड़ रहा है, ऐसे में स्कूल प्रबंधन क्या अभिभावकों को कोई राहत देगा? नहीं, वो कहेगा, बच्चे आपके हैं तो आप समय देगे ही। किन्तु यही बात स्कूल प्रंबंधन से कहे कि जब पूरी फीस मांग रहे हो तो बच्चे की पढ़ाइ की पूरी जिम्मेदारी भी आपकी ही बनती है। एक प्रकार से स्कूल जब आज शिक्षा उद्योग बन गए हैं तो फिर अपने शिक्षकों को दो तीन माह का वेतन यह क्यों नही दे रहे हैं, यह बड़ा सवाल है।

विद्यालय को शिक्षा का मंदिर कहा जाता है और शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, वह राष्ट्रनिर्माता होता है, तो क्या देश के इस बड़े संकट में भी स्कूल स्वामी बच्चों की फीस नहीं छोड़ सकते, जबकि कई कई वर्षो से बच्चा उन्हीं के यहां पढ़ रहा था आखिर यह कौन सा चरित्र है। जब हम देख रहे है कि पूरे देश में दानदाताओं और जरूरतमंदों की सेवा और मदद हो हजारों लाखों हाथ खड़े हो तब ऐसे में स्कूल प्रंबंधन का रवैया समझ से परे हैं।

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